भारत के लिए 9 जनवरी की तारीख केवल कैलेंडर का एक पन्ना नहीं है, बल्कि यह उस ‘सॉफ्ट पावर’ (Soft Power) के जश्न का दिन है, जिसने पूरी दुनिया में भारत का डंका बजा रखा है। हर साल 9 जनवरी को मनाया जाने वाला ‘प्रवासी भारतीय दिवस’ (Pravasi Bharatiya Divas) असल में उन 3.2 करोड़ से अधिक भारतीयों को समर्पित है, जो सात समंदर पार रहकर भी दिल से हिंदुस्तानी हैं।
इस दिवस को मनाने के पीछे न केवल एक ऐतिहासिक विरासत छिपी है, बल्कि एक मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक रणनीति भी काम करती है। EXPOSE NOW की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए कि आखिर 9 जनवरी को ही क्यों चुना गया और कैसे अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी तक ने इस दिन को भारत की शक्ति का माध्यम बना दिया।
इतिहास के पन्नों से: 9 जनवरी का गांधी कनेक्शन इस तारीख का चुनाव किसी संयोग से नहीं हुआ था। इसके तार भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे बड़े महानायक से जुड़े हैं।
- 9 जनवरी 1915: यही वह ऐतिहासिक दिन था जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से वकालत और सत्याग्रह का लंबा अनुभव लेकर हमेशा के लिए भारत लौटे थे।
- गांधी जी एक ‘प्रवासी’ के रूप में भारत आए थे, लेकिन उन्होंने यहां आकर स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा बदल दी।
- गांधी जी की इसी ‘घर वापसी’ को यादगार बनाने और विदेशों में बसे भारतीयों को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए 2003 में इस तारीख को ‘प्रवासी भारतीय दिवस’ के रूप में चुना गया।
सिंघवी समिति और वाजपेयी का विजन प्रवासी भारतीय दिवस की नींव साल 2000 में रखी गई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने महसूस किया कि विदेशों में बसे भारतीय (Indian Diaspora) भारत के लिए एक बड़ी संपत्ति साबित हो सकते हैं।
- सरकार ने न्यायविद और सांसद एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया।
- सिंघवी समिति ने अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की कि प्रवासियों के योगदान को मान्यता देने के लिए एक विशेष दिवस मनाया जाना चाहिए।
- इसी सिफारिश के आधार पर 2003 में पहला प्रवासी भारतीय दिवस नई दिल्ली में आयोजित किया गया।
‘ब्रेन ड्रेन’ को ‘ब्रेन गेन’ में बदलने की रणनीति लंबे समय तक भारत से विदेश जाने वाले लोगों को ‘ब्रेन ड्रेन’ (प्रतिभा पलायन) के नकारात्मक नजरिए से देखा जाता था। आलोचक कहते थे कि भारत अपनी प्रतिभा खो रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में भारतीय विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘ब्रेन ड्रेन’ नहीं बल्कि ‘ब्रेन गेन’ (Brain Gain) का नाम दिया।
सरकार का मानना है कि ये प्रवासी भारतीय विदेशों में भारत के अघोषित राजदूत (Ambassadors) हैं।
- आर्थिक शक्ति: विश्व बैंक की रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत दुनिया में सबसे ज्यादा ‘रेमिटेंस’ (विदेश से भेजा गया पैसा) प्राप्त करने वाला देश है। यह राशि 100 अरब डॉलर के पार जा चुकी है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।
- राजनीतिक रसूख: अमेरिका की कमला हैरिस से लेकर ब्रिटेन के ऋषि सुनक तक, भारतीय मूल के लोग दुनिया की सत्ता के शीर्ष पर बैठे हैं, जो भारत के वैश्विक प्रभाव को बढ़ाता है।
2015 के बाद बदला स्वरूप शुरुआत में (2003 से 2015 तक) यह दिवस हर साल मनाया जाता था। लेकिन विदेश मंत्रालय ने 2015 में इसके प्रारूप में बदलाव किया। अब यह द्विवार्षिक (हर दो साल में एक बार) आयोजित किया जाता है। इसका उद्देश्य आयोजनों की भीड़ बढ़ाने के बजाय प्रवासी भारतीयों के साथ ठोस संवाद स्थापित करना और उनकी समस्याओं का समाधान करना है। बीच के वर्षों में विषय-आधारित (Theme-based) सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं।
निष्कर्ष: यह जड़ों की पुकार है प्रवासी भारतीय दिवस महज एक सरकारी रस्म नहीं है। यह एक ऐसा मंच है जो दुनिया के किसी भी कोने में बसे भारतीय को यह अहसास दिलाता है कि उसकी मिट्टी उसे नहीं भूली है। यह दिवस भारत सरकार और प्रवासी समुदाय के बीच एक ‘लिविंग ब्रिज’ (Living Bridge) का काम करता है, जो राष्ट्र निर्माण में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करता है।
