Expose Now का महा-खुलासा: राजस्थान में मासूम बच्चियों के साथ दरिंदगी का खौफनाक सच, 2 सालों में 5163 मासूम बनीं हवस का शिकार!

-इंसाफ का क्रूर मज़ाक: 3854 मामलों में हुआ चालान, लेकिन 1239 फाइलों पर पुलिस ने लगा दी ‘एफआर’ (FR)

-बढ़ता अपराध का ग्राफ: अलवर, बीकानेर और श्रीगंगानगर बने ‘क्राइम कैपिटल’, राजधानी जयपुर की कानून-व्यवस्था भी तार-तार

-‘Expose Now’ की इन्वेस्टिगेशन में पुलिस की लापरवाही उजागर: दौसा और बालोतरा के पुलिस अधिकारियों पर 17 सीसीए के तहत गिरी गाज

जयपुर। राजस्थान की शांत, रंगीली और गौरवशाली धरती के नीचे एक ऐसा खौफनाक सच पनप रहा है, जो किसी भी सभ्य समाज की रूह कंपा देने के लिए काफी है। ‘Expose Now’ की इस विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में एक ऐसा सनसनीखेज और झकझोर देने वाला खुलासा हुआ है, जो राज्य की कानून व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा और गंभीर सवालिया निशान खड़ा करता है। हम दावों की नहीं, बल्कि उन सरकारी और पुलिसिया आंकड़ों की बात कर रहे हैं, जो फाइलों में दबे रहते हैं। जब इन आंकड़ों की परतों को ‘Expose Now’ की टीम ने उधेड़ा, तो जो तस्वीर सामने आई, वह बेहद डरावनी है।

आंकड़े चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि प्रदेश में मासूम बच्चियां अपने ही घरों, मोहल्लों और शहरों में महफूज नहीं हैं। दिसम्बर 2023 से लेकर दिसम्बर 2025 तक, महज दो सालों के इस छोटे से अंतराल में, प्रदेश भर में नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाली यौन हिंसा और पोक्सो (POCSO) एक्ट के तहत कुल 5163 प्रकरण दर्ज किये गये हैं। यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि राजस्थान में हर रोज औसतन 7 से 8 मासूम बच्चियों का बचपन दरिंदों द्वारा रौंदा जा रहा है।

कानूनी प्रक्रिया या खानापूर्ति? 1239 मामलों में ‘FR’ का काला सच:-

जब कोई पीड़ित परिवार हिम्मत जुटाकर पुलिस के पास पहुंचता है, तो उसे न्याय की आस होती है। लेकिन ‘Expose Now’ की पड़ताल में जो आंकड़े सामने आए हैं, वे न्याय प्रणाली की एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। कुल दर्ज 5163 मामलों में से पुलिस ने केवल 3854 प्रकरणों में ही चालान (चार्जशीट) न्यायालय में पेश किया है। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला और संदेह पैदा करने वाला आंकड़ा यह है कि पुलिस ने 1239 मामलों में एफ.आर. (Final Report) लगा दी है। पोक्सो जैसे गंभीर और संवेदनशील मामलों में इतनी बड़ी संख्या में एफ.आर. लगना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरे सवाल खड़े करता है। क्या ये सभी 1239 मामले झूठे थे? या फिर पुलिस के अनुसंधान (Investigation) में वह गंभीरता और पेशेवर रवैया नहीं था, जो सबूतों को जुटाकर दरिंदों को सलाखों के पीछे पहुंचा सके? एफ.आर. का सीधा मतलब है कि केस बंद कर दिया गया। इसका अर्थ यह है कि सैकड़ों मामलों में पीड़ित बच्चियों को कभी न्याय ही नहीं मिल पाएगा। इसके अलावा, अभी भी 70 प्रकरण ऐसे हैं जो अनुसंधान (Investigation) में लम्बित हैं, यानी उन पर पुलिस की जांच कछुआ चाल से चल रही है।

जिलों का खौफनाक रिपोर्ट कार्ड:-

‘Expose Now’ ने राज्य के अलग-अलग जिलों के आंकड़ों का जब तुलनात्मक अध्ययन किया, तो पाया कि कुछ जिले मासूमों के लिए ‘रेड जोन’ (Red Zone) बन चुके हैं।

-बीकानेर: पश्चिमी राजस्थान का यह जिला अपराध के मामले में भयावह स्थिति में है। बीकानेर में वर्ष 2024 में पोक्सो एक्ट के 95 मामले दर्ज हुए थे, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 106 हो गए।

-श्रीगंगानगर: सीमावर्ती जिले श्रीगंगानगर की स्थिति और भी ज्यादा चिंताजनक है। यहां वर्ष 2024 में 68 मामले दर्ज किए गए थे, लेकिन 2025 में यह आंकड़ा उछाल मारकर 106 तक पहुंच गया।

-अलवर: एनसीआर (NCR) से सटा यह जिला अपराध का नया गढ़ बन चुका है। अलवर में वर्ष 2024 में 96 मासूम बच्चियों से दरिंदगी के मामले सामने आए, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 107 हो गई।

-सीकर और झुंझुनूं (शेखावाटी की शर्मनाक तस्वीर): शिक्षा के हब के रूप में पहचान बनाने वाले सीकर जिले में वर्ष 2024 में 56 प्रकरण दर्ज हुए, जो 2025 में लगभग दोगुने होकर 97 तक पहुंच गए। वहीं झुंझुनूं में भी यह आंकड़ा 36 (वर्ष 2024) से बढ़कर सीधे 66 (वर्ष 2025) हो गया।

राजधानी जयपुर का हाल भी बेहाल:-

सत्ता के गलियारों से घिरी राजधानी जयपुर, जहां पुलिस का सबसे बड़ा अमला और आला अधिकारी बैठते हैं, वहां की स्थिति भी बेहद शर्मनाक है। जयपुर के अलग-अलग पुलिस जिलों के आंकड़े राजधानी की कानून-व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं। जयपुर पूर्व में 2024 में 43 केस थे, जो 2025 में बढ़कर 73 हो गए। जयपुर पश्चिम में यह आंकड़ा 41 से बढ़कर 62 हो गया। जयपुर दक्षिण में 37 मामले (2024) बढ़कर 51 (2025) हो गए, जबकि जयपुर ग्रामीण में 2024 में 46 और 2025 में 56 मामले दर्ज किए गए। राजधानी में ही सैकड़ों बच्चियां हैवानियत का शिकार हो रही हैं, जो पुलिस की ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ (Smart Policing) और ‘सुरक्षित शहर’ के दावों की धज्जियां उड़ाता है।

मेवाड़ और हाड़ौती भी सुरक्षित नहीं:-

झीलों की नगरी उदयपुर में वर्ष 2024 में 62 मामले दर्ज हुए, जो अगले ही साल 2025 में बढ़कर 80 हो गए। वस्त्र नगरी भीलवाड़ा में यह ग्राफ 67 (2024) से बढ़कर 85 (2025) तक पहुंच गया। एजुकेशन सिटी कोटा में भी हालात खराब हैं, जहां कोटा शहर में 2024 में 61 और 2025 में 67 मामले दर्ज हुए। इसी तरह अजमेर जैसे महत्वपूर्ण जिले में 2024 में 77 और 2025 में 90 मामले दर्ज किए गए। यह सभी आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पूरे प्रदेश में दरिंदों के हौसले बुलंद हैं। वर्ष 2024 के मुकाबले 2025 में लगभग हर बड़े जिले में पोक्सो और नाबालिग यौन उत्पीड़न के मामलों में भारी इज़ाफ़ा हुआ है। यह वृद्धि केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों मासूम जिंदगियों की चीखें हैं जिन्हें समाज और सिस्टम बचाने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ है।

सिस्टम की लापरवाही, लापरवाह पुलिस अफसरों पर गिरी गाज:-

इन्वेस्टिगेशन में केवल अपराध के आंकड़े ही नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र की लापरवाही का भी बड़ा खुलासा हुआ है। पोक्सो एक्ट के तहत नियम है कि मामलों की जांच तय समय सीमा में पूरी करके न्यायालय में चालान पेश किया जाना चाहिए ताकि अपराधियों को त्वरित सजा मिल सके। लेकिन ‘Expose Now’ की इन्वेस्टिगेशन में सामने आया है कि कई मामलों में पुलिस अधिकारियों ने घोर लापरवाही बरती है, जिसके चलते सरकार को उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही करनी पड़ी है। सरकार द्वारा चालान पेश नहीं करने वाले जांच अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं। दौसा जिले में कोतवाली थाने के थानाधिकारी (पु.नि.) भगवान सहाय के खिलाफ विभागीय कार्यवाही अमल में लाई जा रही है। प्रकरण संख्या 596/2025 (दिनांक 21.12.2025) में नियत समय में न्यायालय में चालान पेश नहीं करने पर उनके विरुद्ध 17 सीसीए (CCA) रुल्स के तहत आरोप पत्र जारी किया गया है।

इसी प्रकार, बालोतरा जिले में भी एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। वर्ष 2025 के रिकॉर्ड में दर्शाए गए सिवाना थाने के अभियोग संख्या 194/2023 (दिनांक 13.07.2023) के मामले में तत्कालीन पुलिस वृत्ताधिकारी (CO) नीरज कुमारी शर्मा (RPS) पर गाज गिरी है। समय पर जांच पूरी कर चालान पेश न करने के कारण उनके विरुद्ध 17 सीसीए के तहत प्रारुप आरोप पत्र तैयार कर राज्य सरकार को प्रेषित किये गए हैं। ये कार्यवाहियां साबित करती हैं कि सिस्टम में बैठे कुछ लोग किस कदर संवेदनहीन हो चुके हैं। जब रक्षक ही भक्षक के खिलाफ समय पर सबूत पेश नहीं करेंगे, तो उन पीड़ित परिवारों को न्याय कैसे मिलेगा जिनकी दुनिया ही इन दरिंदों ने उजाड़ दी है?

कानून सख्त, लेकिन पुलिसिंग पस्त:-

पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस) कानून को देश के सबसे सख्त कानूनों में से एक माना जाता है। इसमें फांसी तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन कानून तभी प्रभावी होता है जब उसे लागू करने वाली एजेंसियां मुस्तैद हों। 5163 मुकदमों का दर्दनाक आंकड़ा और उनमें से 1239 मुकदमों में एफ.आर. लगना यह स्पष्ट करता है कि अपराधियों में पुलिस या कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है। 70 पेंडिंग मामले यह बताते हैं कि फाइलों को महीनों तक दबा कर रखा जाता है, जिससे सबूत मिटने और गवाहों के टूटने का खतरा बढ़ जाता है। यह इन्वेस्टिगेशन इस बात की मांग करती है कि पुलिस महकमे में ऊपर से नीचे तक एक बड़ी ‘सर्जरी’ की जरूरत है। महिला और बाल सुरक्षा को लेकर सिर्फ कागजी नीतियां और सेमिनार नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर ऐसे पुलिस अधिकारियों की तैनाती होनी चाहिए जो इस तरह के मामलों में जीरो टॉलरेंस (Zero Tolerance) की नीति अपनाएं। इसके अलावा फास्ट ट्रैक कोर्ट्स की संख्या बढ़ाकर इन मामलों की सुनवाई डे-टू-डे बेसिस पर होनी चाहिए ताकि अपराधियों को जल्द से जल्द फांसी के फंदे तक पहुंचाया जा सके।

आखिर कब तक ‘आंकड़ों’ में दबती रहेंगी मासूमों की चीखें?

यह 5163 का आंकड़ा सिर्फ एक गणितीय संख्या नहीं है। यह 5163 परिवारों की बर्बाद होती उम्मीदें हैं। यह उन 5163 बच्चियों का बचपन है, जिसे दरिंदों ने एक ही झटके में छीन लिया। ‘Expose Now’ की यह रिपोर्ट सरकार और पुलिस प्रशासन से सीधा सवाल करती है कि क्या हमारी बच्चियां सिर्फ सरकारी फाइलों का एक डाटा बनकर रह जाएंगी? जब दौसा और बालोतरा जैसे मामलों में पुलिस अधिकारी ही लापरवाही बरतेंगे, तो आम आदमी न्याय मांगने कहां जाएगा? जरूरत है कि सरकार इस मुद्दे पर श्वेत पत्र जारी करे और पुलिस महकमे की जवाबदेही तय करे। अगर अब भी सिस्टम नहीं जागा, तो शायद आने वाले समय में ये आंकड़े इससे भी ज्यादा खौफनाक और शर्मनाक होंगे। मासूमों को सुरक्षा का वातावरण देना सरकार का पहला दायित्व है और इस दायित्व में किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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