Expose Now स्पेशल इन्वेस्टिगेशन: राजस्थान में ‘सिस्टम’ लाचार और दबंग बेखौफ, 3 साल में 3500 सरकारी कर्मचारियों का बहा खून!

-सवाई माधोपुर, अलवर और करौली में सबसे ज्यादा खौफ, ड्यूटी पर तैनात कर्मियों को बनाया जा रहा निशाना

-कागजों में घटते आंकड़े, लेकिन धरातल पर सच्चाई डरावनी, जानिए प्रदेश के किस जिले में क्या हैं हालात

जयपुर। “अरे बाबोसा, अठे तो राज रो काम करणो ही भारी पड़ ग्यो है… काम करो तो मार खाओ, ना करो तो नोटिस पाओ।” राजस्थान के ग्रामीण और शहरी अंचलों में आज हर उस सरकारी कर्मचारी की जुबान पर यही दर्द है, जो फील्ड में अपनी ड्यूटी निभाने जाता है। राजस्थान की माटी वीरों और शूरवीरों की रही है, लेकिन वर्तमान में यह माटी उन सरकारी नुमाइंदों के पसीने से नहीं, बल्कि उनके खून से लाल हो रही है। चाहे जल जीवन मिशन (जेजेएम) के तहत गांवों में पानी के कनेक्शन की जांच करने गए पीएचईडी के इंजीनियर हों, अवैध खनन रोकने गए खनिज विभाग के अधिकारी हों, या फिर राजस्व महकमे के पटवारी और ग्राम विकास अधिकारी—दबंगों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे सरेआम सरकारी मुलाजिमों पर हमला करने से नहीं चूकते। ‘Expose Now’ की इस स्पेशल इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में जो तथ्य सामने आए हैं, वे सुशासन के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए काफी हैं। प्रदेश में पिछले तीन सालों में राजकार्य के दौरान सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ मारपीट तथा राजकार्य में बाधा डालने के करीब साढ़े तीन हजार मामले सामने आ चुके हैं।

दहशत का बढ़ता ग्राफ और खौफनाक जमीनी हकीकत:-

सरकारी दस्तावेजों में भले ही यह दावा किया जा रहा हो कि अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ मारपीट और राजकार्य में बाधा डालने की घटनाओं में निरंतर कमी आ रही है। आंकड़ों के लिहाज से वर्ष 2023 में 1248, वर्ष 2024 में 1182, और वर्ष 2025 में 1035 प्रकरण दर्ज हुए हैं। इन तीन सालों का कुल योग 3465 बैठता है। यानी लगभग साढ़े तीन हजार बार राज्य के उन कर्मचारियों को पीटा गया, अपमानित किया गया और खदेड़ा गया, जो सरकार के आदेशों की पालना करवाने फील्ड में गए थे। यह आंकड़े सिर्फ थानों की चौखट तक पहुंचे मुकदमों के हैं। हकीकत यह है कि राजनीतिक रसूख और स्थानीय दबंगई के चलते सैकड़ों मामले तो दर्ज ही नहीं हो पाते।

प्रशासनिक ढांचे की यह कैसी विडंबना है कि जो सरकार आमजन की सुरक्षा का जिम्मा उठाती है, उसी सरकार के नुमाइंदे खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। जब रक्षक ही खुद की रक्षा के लिए मोहताज हो जाएं, तो आम आदमी न्याय की उम्मीद किससे करे?

सर्वाधिक खौफ वाले टॉप-5 जिले: जहां ‘कानून’ का नहीं, ‘दबंगों’ का राज:-

Expose Now ने सरकारी आंकड़ों की गहराई से पड़ताल की, तो कुछ जिलों की स्थिति बेहद डरावनी नजर आई। ये वो जिले हैं जहां सरकारी कर्मचारी पोस्टिंग लेने से भी कतराते हैं। पिछले तीन वर्षों (2023 से 2025) के आंकड़ों के आधार पर सबसे ज्यादा मारपीट वाले टॉप 5 जिले इस प्रकार हैं:

-सवाई माधोपुर (151 मामले): रणथंभौर के इस जिले में सरकारी कर्मचारियों पर मानों दबंगों ने धावा बोल रखा है। यहाँ 2023 में 59, 2024 में 50 और 2025 में 42 मामले दर्ज हुए।

-अलवर (140 मामले): यहां 2023 में 46, 2024 में 47 और 2025 में 47 मुकदमों के साथ हालात जस के तस तनावपूर्ण बने हुए हैं।

-करौली (137 मामले): डांग क्षेत्र के इस जिले में कर्मचारियों से हाथापाई आम बात हो गई है (2023 में 50, 2024 में 52, 2025 में 35 मामले)।

-सीकर (136 मामले): शेखावाटी के इस अहम जिले में भी सरकारी आदेशों की पालना कराने वालों पर जमकर कहर बरपा (2023 में 40, 2024 में 58, 2025 में 38)।

-भीलवाड़ा (132 मामले): टेक्सटाइल सिटी में भी प्रशासन का खौफ नहीं के बराबर है। (2023 में 40, 2024 में 56, 2025 में 36)।

शांति के टापू, सबसे कम मारपीट वाले टॉप-5 स्थान:-

वहीं दूसरी ओर, कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां कर्मचारियों के साथ मारपीट की घटनाएं नगण्य या बेहद कम रही हैं। पिछले तीन वर्षों के कुल आंकड़ों के अनुसार सबसे सुरक्षित टॉप 5 स्थान:

-डीग और पुलिस आयुक्तालय जयपुर (0 मामले): इन दोनों ही स्थानों पर तीनों वर्षों में मारपीट या राजकार्य में बाधा का एक भी मुकदमा दर्ज नहीं हुआ।

-बांसवाड़ा (20 मामले): वागड़ अंचल के इस जिले में अपेक्षाकृत शांति रही (2023 में 6, 2024 में 4, 2025 में 10)।

-सलूम्बर (22 मामले): (2023 में 12, 2024 में 8, 2025 में 2)।

-खैरथल-तिजारा (29 मामले): (2023 में 8, 2024 में 12, 2025 में 9)।

-प्रतापगढ़ (31 मामले): (2023 में 10, 2024 में 4, 2025 में 17)।

कानून का इकबाल या फाइलों में सिमटती कार्रवाई:-

बड़ा सवाल यह है कि आखिर चालान कितने मामलों में हुआ और कितने मामलों में एफआर (FR) लगाकर फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया? जब किसी अधिकारी या कर्मचारी पर हमला होता है, तो पूरा महकमा हड़ताल पर चला जाता है। आश्वासन मिलते हैं, गिरफ्तारियां होती हैं, लेकिन अंत में लचर पैरवी और रसूखदार दखलंदाजी के कारण मामले रफा-दफा हो जाते हैं। यही वजह है कि मनबढ़ अपराधियों के मन में ‘सिस्टम’ का कोई खौफ नहीं बचा है।

राजस्थान राज्य में सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ राजकार्य करने के दौरान मारपीट व राजकार्य में बाधा डालने के दर्ज प्रकरणों का विगत तीन वर्षों का विवरण इस प्रकार है:

कठोर कदमों की दरकार:

यह केवल आंकड़े नहीं हैं, यह उन हजारों परिवारों की पीड़ा है जिनके सदस्य सुबह घर से यह सोचकर निकलते हैं कि वे राज्य के विकास और प्रशासन का पहिया घुमाने जा रहे हैं, लेकिन शाम को अस्पताल के बिस्तर पर लहूलुहान मिलते हैं। सरकार को केवल फाइलों में मुकदमों की गिरती संख्या बताकर अपनी पीठ नहीं थपथपानी चाहिए, बल्कि धरातल पर ऐसे कठोर और त्वरित कदम उठाने चाहिए कि किसी भी सरकारी सेवक पर हाथ उठाने से पहले अपराधी सौ बार सोचे।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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