Expose Now Exclusive Report: राइजिंग राजस्थान का ‘गुब्बारा’ फूटा, 35 लाख करोड़ के दावों की खुली पोल, 77 फीसदी निवेश कागजों में कैद, अकेले एनर्जी सेक्टर की बैसाखियों पर टिकी सरकार की साख

-आंकड़ों की बाजीगरी का पर्दाफाश, कुल प्रस्तावित 35.30 लाख करोड़ में से 27.29 लाख करोड़ के निवेश का धरातल पर नामोनिशान नहीं

-ऊर्जा विभाग ने बचाई लाज: कुल 8.01 लाख करोड़ के तथाकथित काम में 6.16 लाख करोड़ (करीब 77%) सिर्फ एनर्जी सेक्टर के, कोर इंडस्ट्रीज और मैन्युफैक्चरिंग पूरी तरह हाशिए पर

-रोजगार देने वाले बुनियादी सेक्टर बेहाल: पर्यटन, कृषि, उद्योग और शिक्षा जैसे विभागों में ग्राउंड ब्रेकिंग का आंकड़ा बेहद शर्मनाक, युवाओं को मिला सिर्फ छलावा

-हजारों कंपनियों ने मोड़ा मुंह: 11,013 में से 7,118 प्रोजेक्ट्स का काम शुरू ही नहीं हुआ, वैश्विक मंदी, वित्त और बाजार का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ते जिम्मेदार

जयपुर। राजस्थान की सत्ता में बैठे हुक्मरानों ने ‘राइजिंग राजस्थान’ के नाम पर प्रदेश की जनता को सुनहरे सपने दिखाए थे। मंचों से गरज-गरज कर दावे किए गए थे कि प्रदेश में औद्योगिक क्रांति आने वाली है और लाखों करोड़ रुपये की बारिश से हर हाथ को काम मिलेगा। लेकिन ‘Expose Now’ की इस एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में सामने आए आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों ने इन दावों की परतें उधेड़ कर रख दी हैं। कागजों पर जो तस्वीर पेश की जा रही है, वह नीति-निर्माताओं के मुंह पर करारा तमाचा है। दस्तावेजों से साफ जाहिर होता है कि राइजिंग राजस्थान के तहत कुल 11,013 MOU (समझौता पत्र) साइन किए गए थे, जिनके माध्यम से कुल 35,30,502.78 करोड़ (करीब 35.30 लाख करोड़) रुपये के निवेश का भारी-भरकम सपना दिखाया गया था।
परंतु जब धरातल पर कार्य प्रारंभ यानी ‘ग्राउंड ब्रेकिंग’ की असलियत जांची गई, तो यह पूरा ढांचा ताश के पत्तों की तरह ढहता नजर आया। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, अब तक कुल 3,895 प्रोजेक्ट्स में महज 8,01,048 करोड़ रुपये की ही ग्राउंड ब्रेकिंग हो पाई है। इसका सीधा और कड़वा गणित यह है कि सरकार के कुल विज्ञापित निवेश का 77 फीसदी से अधिक हिस्सा आज भी फाइलों की धूल फांक रहा है और केवल कागजी मुगालता बनकर रह गया है। प्रदेश में 27 लाख 29 हजार करोड़ रुपये का निवेश किस अंधेरे कुएं में गायब हो गया, इसका कोई ठोस जवाब सरकारी तंत्र के पास नहीं है। सरकार ने अपनी विफलता पर पर्दा डालने के लिए औपचारिक तौर पर यह कहकर पल्ला झाड़ लिया है कि निवेश का आना वैश्विक और राष्ट्रीय आर्थिक परिदृश्यों, वित्त की उपलब्धता और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। सवाल उठता है कि जब परिस्थितियां अनुकूल नहीं थीं, तो जनता के पैसों से करोड़ों के सरकारी इवेंट आयोजित कर 35 लाख करोड़ का मिथ्या जाल क्यों बुना गया?

अकेले एनर्जी और सोलर MOU ने बचाई सरकार की डूबती साख:-

यदि इस पूरे रिपोर्ट कार्ड का बारीक विश्लेषण किया जाए, तो साफ हो जाता है कि सरकार की लाज केवल और केवल एनर्जी (सौर व नवकरणीय ऊर्जा) विभाग के बूते बच पाई है। अगर एनर्जी सेक्टर के आंकड़ों को इस सूची से बाहर निकाल दिया जाए, तो राइजिंग राजस्थान पूरी तरह फ्लॉप शो साबित होता है। Expose Now के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि कुल 35.30 लाख करोड़ रुपये के MOU में से अकेले एनर्जी विभाग के नाम पर 28,27,421.39 करोड़ (करीब 28.27 लाख करोड़) रुपये के 812 MOU साइन किए गए थे। यानी पूरे आयोजन के कुल निवेश का 80 फीसदी हिस्सा अकेले सौर और पवन ऊर्जा से जुड़ा था।
हैरानी की बात यह है कि तथाकथित ग्राउंड ब्रेकिंग के नाम पर जो 8,01,048 करोड़ रुपये की उपलब्धि सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए गिना रही है, उसमें से शेर का हिस्सा यानी 6,15,995 करोड़ रुपये (करीब 77 प्रतिशत) केवल एनर्जी सेक्टर के 472 MOU का है, जो कि प्रदेश में राइजिंग राजस्थान का आयोजन करने से पहले ही सोलर सेक्टर के कार्यों में रूचि दिखा रहे थे, लेकिन एनर्जी के अधिकारियों द्वारा इन्हें राइजिंग राजस्थान के नाम पर जमीनों का प्रलोभन देकर उनसे एमओयू करवाए गए। इसका सीधा मतलब यह है कि एनर्जी सेक्टर के विशाल सोलर प्रोजेक्ट्स को हटा दिया जाए, तो शेष समूचे राजस्थान के 30 से ज्यादा विभागों के खाते में कुल मिलाकर महज 1.85 लाख करोड़ रुपये का ही जमीनी काम आया है। सोलर प्लांट अमूमन बंजर जमीनों पर स्थापित होने वाले कैपिटल-इंटेंसिव प्रोजेक्ट होते हैं, जिनमें स्थानीय युवाओं के लिए नियमित और स्थायी रोजगार के अवसर बेहद सीमित होते हैं। ऐसे में सोलर प्रोजेक्ट्स के भारी-भरकम पूंजीगत आंकड़ों के सहारे सरकार अपनी नाकामी छुपाने की कोशिश कर रही है। ऊर्जा विभाग की इस बैसाखी के बिना सरकार का यह औद्योगिक उत्सव पहले ही दिन औंधे मुंह गिर चुका होता।

रोजगार देने वाले बुनियादी सेक्टरों की रीढ़ टूटी: उद्योग, पर्यटन, माइंस और कृषि में भारी वादाखिलाफी:-

किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था की वास्तविक रीढ़ और आम जनता को सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले क्षेत्र मैन्युफैक्चरिंग, रीको इंडस्ट्रियल एरिया, पर्यटन, खान और कृषि होते हैं। ‘Expose Now’ की पड़ताल में इन विभागों के आंकड़े बेहद चौंकाने वाले और चिंताजनक मिले हैं। सबसे पहले उद्योग और रीको (RIICO) की स्थिति देखिए—रीको के तहत 1,08,291.15 करोड़ रुपये के 2,255 एमओयू किए गए थे, लेकिन ग्राउंड ब्रेकिंग की सूची में रीको का नामोनिशान तक स्पष्ट नहीं दिख रहा और इंडस्ट्रीज विभाग के 1,894 एमओयू (प्रस्तावित 16,578.31 करोड़) के सामने मात्र 76,080 करोड़ की उपलब्धि दर्ज दिखाई गई है, जो प्राथमिक दावों की विसंगतियों को उजागर करती है।

राजस्थान की पहचान और लाखों परिवारों की आजीविका के साधन पर्यटन विभाग की हालत तो और भी दयनीय है। राइजिंग राजस्थान में पर्यटन को पंख लगाने के नाम पर 1,245 एमओयू साइन कर 91,518.63 करोड़ रुपये के निवेश का ढिंढोरा पीटा गया था। लेकिन हकीकत यह है कि केवल 285 एमओयू में 10,033 करोड़ रुपये की ही ग्राउंड ब्रेकिंग हो सकी। यानी पर्यटन का 81,000 करोड़ से ज्यादा का निवेश गायब है।

यही हाल खनन (Mines) विभाग का है, जहां 99,586.82 करोड़ के 293 एमओयू किए गए, मगर धरातल पर केवल 33 प्रोजेक्ट्स में 34,237 करोड़ का काम शुरू हो सका—65 हजार करोड़ का निवेश सिरे ही नहीं चढ़ा।
किसानों और पशुपालकों की आय दोगुनी करने के नाम पर कृषि क्षेत्र में 42,041.92 करोड़ के 2,350 एमओयू साइन किए गए थे, जिनमें से महज 8,149 करोड़ रुपये (716 एमओयू) का काम जमीन पर उतरा। पशुपालन में 932 करोड़ के दावों के मुकाबले सिर्फ 210 करोड़ और गोपालन में 279 करोड़ के प्रस्तावों के मुकाबले शून्य प्रगति नजर आई। यह स्थिति चीख-चीख कर कह रही है कि जमीनी उत्पादकता और स्थानीय रोजगार पूरी तरह उपेक्षित हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और जनहितैषी सेवाओं के साथ क्रूर मजाक:-

प्रदेश के युवाओं को बेहतर शिक्षा, आधुनिक तकनीकी प्रशिक्षण और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के दावे भी हवा-हवाई साबित हुए हैं। एक्सपोज नाउ द्वारा जुटाए गए आंकड़े बताते हैं कि स्कूल शिक्षा में 210 एमओयू के जरिए 14,206.10 करोड़ रुपये के निवेश का वादा किया गया था, लेकिन जमीन पर सिर्फ 54 एमओयू के तहत 1,011 करोड़ रुपये की ही शुरुआत हो पाई।

हायर और टेक्निकल एजुकेशन (उच्च एवं तकनीकी शिक्षा) का हाल तो शर्म से सिर झुकाने वाला है। टेक्निकल एजुकेशन में जहां 5,218.10 करोड़ और हायर एजुकेशन में 15,178 करोड़ के एमओयू हुए थे, वहां ग्राउंड ब्रेकिंग के नाम पर महज 56 करोड़ रुपये (206 एमओयू) ही दर्ज किए जा सके हैं। लाखों छात्रों के तकनीकी विकास के नाम पर 56 करोड़ का निवेश किसी क्रूर मजाक से कम नहीं है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी जनता को केवल छला गया है। मेडिकल एजुकेशन में 20,612.37 करोड़ के 47 एमओयू के मुकाबले केवल 15 एमओयू में 6,305 करोड़ का काम शुरू हुआ। मेडिकल एंड हेल्थ (M&H) विभाग में 20,965.49 करोड़ के 284 एमओयू के सामने मात्र 4,803 करोड़ (74 एमओयू) ही धरातल पर आ सके। युवाओं के खेल विकास के लिए स्पोर्ट्स एंड यूथ विभाग में 7,584.50 करोड़ के 29 एमओयू हुए थे, लेकिन उपलब्धि के नाम पर सिर्फ 1 एमओयू और 90 करोड़ रुपये की खानापूर्ति की गई। आईटी और साइंस टेक्नोलॉजी जैसे आधुनिक क्षेत्रों में 10,000 करोड़ से अधिक के एमओयू के सामने महज 1,012 करोड़ का काम होना यह साबित करता है कि सरकार युवाओं को रोजगारपरक भविष्य देने में पूरी तरह नाकाम रही है।

राइजिंग राजस्थान: विभागवार कुल एमओयू बनाम वास्तविक स्थिति (ग्राउंड ब्रेकिंग)


विदेशी-स्वदेशी निवेशकों का टूटा भरोसा: लालफीताशाही और अफसरों की लापरवाही ने डुबोई नैया:-

Expose Now की गहन तफ्तीश में यह बड़ा सवाल सामने आया है कि आखिर निवेशक MOU साइन करने के बाद राजस्थान से पैर क्यों खींच रहे हैं? सरकारी दस्तावेजों में यह स्पष्ट स्वीकारोक्ति है कि 11,013 में से 7,118 कंपनियां या औद्योगिक समूह धरातल पर काम शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। प्रदेश में निवेश का माहौल तैयार करने के लिए ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टमेंट प्रमोशन (BIP) बनाया गया था, जिसके जिम्मे 93,244.98 करोड़ के 165 बड़े MOU थे। मगर ग्राउंड ब्रेकिंग रिपोर्ट में इसका स्वतंत्र रूप से कोई बड़ा प्रभाव नहीं दिखाई देता।

उद्योग जगत से जुड़े अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि सरकार ने इवेंट के दौरान हेडलाइंस बटोरने के लिए बिना किसी ड्यू-डिलिजेंस और व्यवहार्यता जांच के कंपनियों से अंधाधुंध कागजों पर दस्तखत करवा लिए। जब निवेशकों ने जमीन अधिग्रहण, सिंगल विंडो क्लीयरेंस, बिजली कनेक्शन, पानी और स्थानीय प्रशासनिक अनुमतियों के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने शुरू किए, तो उन्हें वही पुरानी लालफीताशाही, भ्रष्टाचार और नौकरशाही की ढिलाई का सामना करना पड़ा। सरकार की औद्योगिक नीतियां और प्रोत्साहन केवल विज्ञापनों तक सीमित रह गए। नतीजतन, सैकड़ों निवेशकों ने अपने प्रोजेक्ट्स को पड़ोसी राज्यों जैसे गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की ओर मोड़ना शुरू कर दिया, जहां उन्हें बेहतर बुनियादी ढांचा और त्वरित स्वीकृतियां मिल रही हैं।

जनता के पैसों की बर्बादी और खोखली वाहवाही: जवाबदेही से भागता सरकारी तंत्र:-

राइजिंग राजस्थान जैसे मेगा इवेंट्स के आयोजन पर जनता की गाढ़ी कमाई के सैकड़ों करोड़ रुपये विज्ञापनों, लक्जरी होटलों, विदेशी दौरों और पीआर एजेंसियों पर पानी की तरह बहा दिए गए। सरकार ने अपनी वाहवाही लूटने के लिए जो प्रचार तंत्र खड़ा किया, उसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं निकला। 35.30 लाख करोड़ के निवेश का 77 फीसदी हिस्सा हवा में लटकना यह साफ दर्शाता है कि सरकार के पास कोई ठोस रोडमैप और मॉनिटरिंग मैकेनिज्म नहीं था।

सरकार की इस विफलता का सबसे बड़ा खामियाजा प्रदेश के उन लाखों बेरोजगार युवाओं को भुगतना पड़ रहा है, जो इन घोषणाओं के बाद रोजगार की उम्मीद लगाए बैठे थे। अगर एनर्जी विभाग के सोलर प्रोजेक्ट्स की एकमुश्त 6.16 लाख करोड़ की राशि न होती, तो सरकार जनता को दिखाने लायक मुंह भी नहीं बचा पाती। सरकारी आंकड़ों के इस आईने ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘राइजिंग राजस्थान’ औद्योगिक क्रांति लाने में नाकाम रहा है और केवल आंकड़ों की बाजीगरी बनकर सिमट गया है। अब देखना यह है कि इवेंट मैनेजमेंट की खुमारी से बाहर निकलकर सरकार जमीन पर अटके 27 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट्स को शुरू कराने के लिए कोई ठोस कदम उठाती है या फिर यह नाकामी भी फाइलों के नीचे दबा दी जाएगी।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose now


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