भरतपुर। यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शुमार विश्वविख्यात केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी विहार (घना) इस समय अस्तित्व के गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। मानसून की बेरुखी और करौली स्थित पांचना बांध से आवश्यकतानुसार पानी नहीं छोड़े जाने के कारण इस ‘पक्षियों के स्वर्ग’ में आशियाने उजड़ने की नौबत आ गई है। स्थिति यह है कि प्रजनन और नीड़ निर्माण (घोंसला बनाने) के महत्वपूर्ण दौर में पानी न मिलने से कई दुर्लभ और स्थानीय प्रजातियों के पक्षियों ने उद्यान से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है।
पानी का गणित: 200 MCFT पानी की भारी कमी
घना की नमभूमि (वेटलैंड) और पारिस्थितिकी तंत्र को जीवित रखने के लिए हर सीजन में कम से कम 550 मिलियन क्यूबिक फीट (MCFT) पानी की दरकार होती है। वर्तमान में पार्क को केवल 350 MCFT पानी ही मिल सका है, यानी घना अभी भी लगभग 200 MCFT पानी की भारी किल्लत से जूझ रहा है। जल स्तर पर्याप्त न होने के कारण उद्यान के प्रमुख ब्लॉक और वेटलैंड सूखे पड़े हैं, जिससे जलीय वनस्पति और मछलियों का उत्पादन ठप हो गया है।
नीड़ निर्माण और प्रजनन चक्र बाधित
अगस्त से अक्टूबर का समय पक्षियों के लिए ‘ब्रीडिंग सीजन’ माना जाता है। पेंटेड स्टॉर्क (चित्रित बगुला), ओपनबिल स्टॉर्क, डार्टर, स्पूनबिल और जलकौवे जैसे पक्षी पानी के बीच खड़े बबूल और कदंब के पेड़ों पर अपने घोंसले बनाते हैं।
- पानी का भराव कम होने से घोंसले जमीन के बेहद करीब रह जाते हैं, जिससे अंडों और चूजों पर सियार, जंगली बिल्ली और शिकारी जीवों का खतरा बढ़ जाता है।
- पर्याप्त पानी न होने से जलीय खाद्य श्रृंखला (मछलियां, घोंघे, मेंढक) नष्ट हो रही है, जिससे भोजन की अनुपलब्धता के चलते कई प्रजातियां आसपास के अन्य जलाशयों व नहरों की ओर पलायन कर रही हैं।
पांचना बांध और अजान बांध से उम्मीदें
केवलादेव का पारंपरिक जल स्रोत अजान बांध और पांचना बांध रहा है। इस बार कैचमेंट एरिया में सामान्य से कम बारिश और अंतर-जिला जल वितरण की नीतिगत उलझनों के चलते पांचना बांध से घना के हिस्से का पानी समय पर नहीं मिल सका। हालांकि गोवर्धन ड्रेन और अन्य माध्यमों से कुछ जल आपूर्ति की कोशिशें की गईं, लेकिन वे पार्क की विशाल जैव विविधता की प्यास बुझाने के लिए नाकाफी साबित हुईं।
शीतकालीन प्रवास पर भी मंडराता खतरा
अगर अगले कुछ दिनों में जल संकट का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो इसका सीधा असर सर्दियों में मध्य एशिया, साइबेरिया और यूरोप से आने वाले हजारों विदेशी प्रवासी पक्षियों (रॉडी शेल्डक, नार्दर्न पिंटेल, कॉमन टील आदि) के आगमन पर पड़ेगा। पक्षी विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि पर्याप्त जलभराव न होने की स्थिति में इस बार घना का अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और पारिस्थितिक संतुलन दोनों बड़े स्तर पर प्रभावित होंगे।