राजस्थान में बिक रहा बचपन: मानव तस्करों के आसान निशाने बने मासूम, गुजरात से गोवा तक फैला नेटवर्क

भयावह तस्वीर: राजस्थान में बिक रहा बचपन! मानव तस्करों के आसान निशाने बने मासूम, गुजरात से गोवा तक फैला नेटवर्क
मुफ्त पढ़ाई, नौकरी और बेहतर जिंदगी का झांसा देकर बच्चों को घरों से निकालते हैं दलाल; रेलवे स्टेशन बन रहे तस्करी के रास्ते, रेस्क्यू ऑपरेशन ने खोली गिरोहों की परतें

जयपुर। राजस्थान में बच्चों की तस्करी का नेटवर्क एक बार फिर चिंता बढ़ा रहा है। गरीब परिवार, आदिवासी इलाके और आर्थिक संकट से जूझ रहे घर मानव तस्करों के सबसे आसान निशाने बन रहे हैं। कहीं मुफ्त पढ़ाई और अच्छे भविष्य का सपना दिखाया जा रहा है तो कहीं नौकरी और अच्छी कमाई का लालच देकर बच्चों को दूसरे राज्यों तक पहुंचाया जा रहा है। रेलवे स्टेशन और ट्रेनें इस अंतरराज्यीय नेटवर्क के लिए प्रमुख रास्ते बन रहे हैं।
राजस्थान से गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा और देश के दूसरे हिस्सों तक बच्चों को ले जाने के मामले सामने आ चुके हैं। कई मामलों में बच्चों को मजदूरी में धकेलने की कोशिश हुई तो कुछ मामलों में नाबालिग लड़कियों की तस्करी का संबंध यौन शोषण और जबरन शादी जैसे गंभीर अपराधों से सामने आया है।
‘मुफ्त पढ़ाई’ का झांसा और फिर गायब हो जाता है बचपन
तस्कर और बिचौलिए ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे परिवारों को निशाना बनाते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर होती है। बच्चों के माता-पिता को बड़े शहर में मुफ्त शिक्षा, रहने-खाने और बेहतर भविष्य का भरोसा दिया जाता है। परिवार विश्वास में आकर बच्चे उनके साथ भेज देते हैं, लेकिन कई मामलों में यही सफर शोषण की शुरुआत बन जाता है।
बच्चों को खेतों, ईंट-भट्टों, कारखानों, कैटरिंग और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम कराने के मामले सामने आए हैं। दिसंबर 2025 में डूंगरपुर रेलवे स्टेशन पर RPF, चाइल्डलाइन और सहयोगी संस्था की कार्रवाई में 22 नाबालिगों को गुजरात ले जाने की कथित कोशिश रोकी गई थी। पुलिस के अनुसार बच्चों को गुजरात में काम के लिए ले जाया जा रहा था और तीन लोगों को हिरासत में लिया गया था।

रेलवे स्टेशन बने तस्करी के ‘ट्रांजिट पॉइंट’

मानव तस्करी के मामलों में रेलवे नेटवर्क की भूमिका लगातार सामने आ रही है। RPF के अभियान ‘ऑपरेशन आहट’ और ‘ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते‘ के जरिए बड़ी संख्या में बच्चों को ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों से सुरक्षित निकाला गया है। केंद्र सरकार के अनुसार 2024 में नवंबर तक RPF ने ‘ऑपरेशन नन्हे फरिश्ते’ के तहत देशभर में 13,717 बच्चों को रेस्क्यू किया था। वहीं 2024-25 में ‘ऑपरेशन आहट’ के तहत 929 पीड़ितों को बचाया गया, जिनमें 874 बच्चे शामिल थे।
राजस्थान में भी रेलवे पुलिस की सतर्कता से लगातार ऐसे मामले पकड़े जा रहे हैं। नवंबर 2024 तक पश्चिम मध्य रेलवे के कोटा मंडल में ही 435 से ज्यादा बच्चों को सुरक्षित रेस्क्यू किए जाने की जानकारी सामने आई थी।

डूंगरपुर से गुजरात जा रहे थे 22 बच्चे

दिसंबर 2025 का डूंगरपुर मामला इस नेटवर्क की कार्यप्रणाली की बड़ी तस्वीर दिखाता है। अलग-अलग गांवों से बच्चों को जुटाकर उन्हें गुजरात ले जाने की तैयारी थी। बच्चे ट्रेन पकड़ने के लिए डूंगरपुर स्टेशन पहुंचे थे, तभी RPF और चाइल्डलाइन की टीम ने उन्हें रोक लिया। पूछताछ में बच्चों ने कथित तौर पर बताया कि उन्हें काम के लिए ले जाया जा रहा था।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें बच्चों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने के लिए स्थानीय स्तर पर बिचौलियों की भूमिका सामने आई। यानी नेटवर्क केवल बड़े शहरों में बैठे लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि गांव से लेकर रेलवे स्टेशन और दूसरे राज्य के गंतव्य तक कड़ियां जुड़ी हो सकती हैं।

गोवा कनेक्शन ने बढ़ाई चिंता

जुलाई 2026 में उदयपुर क्षेत्र से सात बच्चों को कथित रूप से मुफ्त शिक्षा के नाम पर गोवा ले जाने का मामला सामने आया। गोवा रेलवे पुलिस ने बच्चों को रेस्क्यू किया। इस मामले में बच्चों को आगे तमिलनाडु ले जाने की आशंका भी जताई गई थी। धर्मांतरण के आरोपों को लेकर भी जांच की मांग सामने आई, हालांकि ऐसे आरोपों की पुष्टि जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही मानी जानी चाहिए।
यही मामला बताता है कि बच्चों को राजस्थान से बाहर ले जाने के लिए तस्कर शिक्षा, नौकरी या धार्मिक संस्थानों से जुड़े वादों का इस्तेमाल करने की कोशिश कर सकते हैं।

झुंझुनूं में पांच साल के बच्चे को दिल्ली से लाने का मामला

जून 2026 में झुंझुनूं में RPF ने पांच वर्षीय बच्चे को सुरक्षित बरामद किया था। बच्चे को दिल्ली से जयपुर लाए जाने की बात सामने आई और आरोपी उमाशंकर शर्मा को गिरफ्तार किया गया। इस तरह के मामले बताते हैं कि तस्करी हमेशा बड़े समूहों में ही नहीं होती; कई बार एक अकेला बच्चा भी अपराधियों के निशाने पर होता है।

राजस्थान में नाबालिग लड़कियों की तस्करी का खतरनाक चेहरा

मानव तस्करी का सबसे भयावह पहलू नाबालिग लड़कियों का शोषण है। जून 2026 में झालावाड़ पुलिस ने अंतरराज्यीय नेटवर्क का खुलासा करते हुए 10 लड़कियों को रेस्क्यू किया और आरोपियों को गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार गिरोह कथित तौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को निशाना बनाता था और लड़कियों को दूसरे शहरों में भेजता था। जांच में फर्जी आधार कार्ड के जरिए नाबालिगों को बालिग दिखाने का आरोप भी सामने आया।
इसी तरह अजमेर में जून 2026 में 14 वर्षीय लड़की को कथित तौर पर शादी के बहाने ले जाकर बेचने और उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म का मामला सामने आया। पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया और नाबालिग को चूरू जिले से बरामद किया।

होटल से लेकर महानगरों तक फैला शोषण का जाल

श्रीगंगानगर में जून 2026 में सामने आया नाबालिग लड़की की तस्करी का मामला इस अपराध के दूसरे खतरनाक रूप को उजागर करता है। पुलिस जांच में आरोप सामने आया कि लड़की को कई होटलों में रखा गया और ग्राहकों को पैसे लेकर उपलब्ध कराया गया। मामले में 21 लोगों की गिरफ्तारी और कई आरोपियों के फरार होने की जानकारी जांच एजेंसियों ने दी।
झालावाड़ के मामले में पुलिस ने यह भी पाया कि नाबालिग लड़कियों को मुंबई, नागपुर और दूसरे महानगरों तक भेजे जाने का कथित नेटवर्क था।

राजस्थान से बाहर भी पहुंचता है नेटवर्क

बाल तस्करी का नेटवर्क दोतरफा भी दिखाई देता है। जुलाई 2025 में बिहार के छह बच्चों को राजस्थान में मजदूरी के लिए ले जाने की कथित कोशिश को RPF और GRP ने नाकाम किया था। बच्चों को जोधपुर ले जाने की बात सामने आई थी। इससे साफ है कि राजस्थान केवल बच्चों को बाहर भेजे जाने वाला राज्य नहीं है, बल्कि दूसरे राज्यों से भी बच्चों को मजदूरी और शोषण के लिए यहां लाए जाने की आशंका वाले मामले सामने आते रहे हैं।

आरपीएफ का रेस्क्यू अभियान..

समय / वर्ष | रेस्क्यू किए गए बच्चों की कुल संख्या

वर्ष 2024 (देशभर में) 10,914 बच्चे
वर्ष 2025 (केवल जून माह तक) 6,088 बच्चे
राजस्थान का औसत (सालाना) 600 से 700 बच्चे

2 साल में 1600 बच्चे किए रेस्क्यू

साल 2023 में एक एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट जारी की। जिसके अनुसार दो साल में प्रदेश के प्रमुख रेलवे स्टेशनों से पूर्व के वर्षों में 1600 से अधिक बच्चों को सुरक्षित मुक्त कराया गया था।

राजस्थान की ताजा घटनाएं

18 जुलाई 2026: गोवा में रेलवे पुलिस ने राजस्थान के 7 बच्चों को मुक्त कराया। बच्चों को कथित रूप से मुफ्त शिक्षा का लालच देकर ले जाया जा रहा था। तमिलनाडू जाने से पहले ही बच्चों का रेस्क्यू कर लिया गया।

जून 2026: झुंझुनू में आरपीएफ ने पांच वर्षीय बच्चे को सुरक्षित बचा लिया। आरोपी उमाशंकर शर्मा को गिरफ्तार कर लिया, जो ट्रेनों में भीख मांगकर गुजारा करता है। वह बच्चे को दिल्ली से अगवा कर जयपुर ला रहा था।

सबसे बड़ा सवाल—बचपन की सुरक्षा कौन करेगा?

बाल तस्करी के पीछे गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, कर्ज और परिवारों की आर्थिक मजबूरी बड़ी वजहें बनती हैं। तस्कर इसी कमजोरी को अपना हथियार बनाते हैं। आंकड़ों में हर रेस्क्यू एक संख्या है, लेकिन उसके पीछे एक बच्चे का छिना हुआ बचपन, परिवार की टूटती उम्मीद और शोषण की कहानी छिपी होती है।
राजस्थान में सालाना 600 से 700 बच्चों के रेस्क्यू और दो साल में करीब 1600 बच्चों को मुक्त कराने के जो आंकड़े दिए जा रहे हैं, उनकी स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अलग-अलग स्रोतों से करना जरूरी है। इसी तरह बच्चों को 70-80 प्रतिशत बंधुआ मजदूरी, 10-15 प्रतिशत भिक्षावृत्ति/घरेलू काम और 5-10 प्रतिशत धर्मांतरण से जोड़ने वाले प्रतिशत को अनुमानित आंकड़ों के रूप में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जब तक किसी सरकारी या अधिकृत अध्ययन में इनका स्पष्ट आधार उपलब्ध न हो।
लेकिन सामने आ रहे मामले खतरे की गंभीरता पर कोई संदेह नहीं छोड़ते। डूंगरपुर के 22 बच्चों से लेकर गोवा में रेस्क्यू किए गए सात बच्चों और झालावाड़ की 10 नाबालिग लड़कियों तक—हर केस एक ही चेतावनी दे रहा है: तस्करों के लिए बच्चे सिर्फ आसान शिकार नहीं, बल्कि एक ऐसा ‘माल’ बनते जा रहे हैं जिसे राज्य की सीमाओं के पार ले जाकर अलग-अलग रूपों में शोषित किया जाता है।
बचपन को बचाने की लड़ाई अब सिर्फ पुलिस की नहीं, बल्कि परिवार, स्कूल, रेलवे, ग्राम स्तर की व्यवस्था और पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।


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