-दो समितियों में ही 15 करोड़ से ज्यादा की सेंधमारी, नांगलपुरोहितान और रोजदा बने गबन का केंद्र
-अपलेखन की आड़ में जनता के पैसे पर पर्दा डालने का खेल, मौत के इंतजार में अटकी फाइलें
-126 करोड़ के सालाना फसली ऋण के बीच चौपट होता निगरानी तंत्र, ढण्ढ जैसी समितियां हुईं बंद
-लाखों रुपये के प्रमाणित गबन के एवज में वसूली के नाम पर महज 200 रुपये (चंदवाजी) और 350 रुपये (कस्बा आमेर) जैसी हास्यास्पद राशि ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज
जयपुर। किसानों की तरक्की और कृषि संबल के नाम पर चल रहे सहकारिता तंत्र में भ्रष्टाचार की जड़ें पाताल तक पहुंच चुकी हैं। किसानों के पसीने की कमाई और सरकारी खजाने पर ग्राम सेवा सहकारी समितियों (GSS) के कर्ता-धर्ताओं ने ऐसा डाका डाला है कि आंकड़े देखकर रोंगटे खड़े हो जाएं। एक्सक्लूसिव आंतरिक जांच दस्तावेजों से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि अकेले एक ही इलाके में 15 करोड़ 39 लाख 24 हजार रुपये से अधिक के संगठित गबन पर सहकारिता विभाग के आला अधिकारी कुंडली मारकर बैठे हैं। सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि वर्ष 2001 (25 साल पहले) और 2010 के गबन मामलों में भी विभाग आज तक धेले भर की वसूली नहीं कर पाया है और फाइलों में महज एक ही घिसा-पिटा जवाब दर्ज है—’वसूली की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है’।
- नांगलपुरोहितान और रोजदा में महाघोटाला, 2 समितियों में 15 करोड़ से ज्यादा की सेंधमारी:-
विभागीय अधिनियम की धारा 57(2) के तहत जारी अंतिम अदालती व जांच निर्णयों के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्राथमिक कृषि ऋण ढांचे को लूट का अड्डा बना दिया गया है:
–नांगलपुरोहितान GSS: इस अकेली समिति में भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा देखिए। पूर्व व्यवस्थापक स्व. गुलाब चंद जाट के खिलाफ 9,33,02,908 (9.33 करोड़ रु.) और दूसरे पूर्व व्यवस्थापक ग्यारसी लाल यादव के खिलाफ 2,18,60,047 (2.18 करोड़ रु.) के गबन का फैसला पारित हुआ। इसी समिति के पूर्व व्यवस्थापक रामदेव जाट पर 20,02,022 का गबन वर्ष 2017 में साबित हुआ था। यानी सिर्फ नांगलपुरोहितान समिति में 11.71 करोड़ रुपये से अधिक का घोटाला हुआ।
–रोजदा GSS: पूर्व व्यवस्थापक स्व. बालचंद यादव के खिलाफ उप रजिस्ट्रार न्यायालय द्वारा 3,66,88,448 (3.67 करोड़ रु.) के गबन का निर्णय पारित किया गया। लेकिन इस मामले में भी विभाग ने महज एक मांग पत्र थमाकर इतिश्री कर ली।

–चंदवाजी, राधाकिशनपुरा व अन्य: कस्बा आमेर, राधाकिशनपुरा, चंदवाजी और खोराश्यामदास समितियों में भी लाखों के गबन प्रमाणित हो चुके हैं।
सहकारिता विभाग, गबन एवं वसूली की स्थिति:
-नांगलपुरोहितान GSS: पूर्व व्यवस्थापक स्व. गुलाब चंद जाट के खिलाफ 9,33,02,908 की राशि निर्णित हुई।
-नांगलपुरोहितान GSS: पूर्व व्यवस्थापक ग्यारसी लाल यादव के खिलाफ 2,18,60,047 की राशि निर्णित हुई।
-रोजदा GSS: पूर्व व्यवस्थापक स्व. बालचंद यादव के खिलाफ 3,66,88,448 की राशि निर्णित हुई।
-नांगलपुरोहितान GSS: पूर्व व्यवस्थापक रामदेव जाट के खिलाफ 20,02,022.26 की राशि निर्णित हुई।
-चंदवाजी GSS: पूर्व व्यवस्थापक बद्री प्रसाद जाट के खिलाफ 1,45,181.40 की राशि निर्णित हुई।
-कस्बा आमेर GSS: पूर्व व्यवस्थापक सुरेश बिहारी सक्सेना के खिलाफ 92,181.00 की राशि निर्णित हुई।
-राधाकिशनपुरा GSS: सहायक व्यवस्थापक हजारी लाल शर्मा के खिलाफ 57,631.51 की राशि निर्णित हुई।
–नांगलपुरोहितान GSS: पूर्व व्यवस्थापक बनवारी लाल शर्मा के खिलाफ 44,099.95 की राशि निर्णित हुई।
-खोराश्यामदास GSS: पूर्व व्यवस्थापक स्व. कल्याण सहाय शर्मा के खिलाफ 28,004.00 की राशि निर्णित हुई।
-कुल प्रमाणित गबन राशि: 15,39,24,242.12 (लगभग 15.39 करोड़ रुपये)।
- अफसरों का ‘प्रक्रियाधीन’ सिंडिकेट, 25 साल बीते, वसूली सिर्फ 200 और 350 रुपये:-
सहकारिता विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत और लीपापोती का नंगा नाच इन आंकड़ों से उजागर होता है:
-राधाकिशनपुरा समिति (25 साल से लंबित): सहायक व्यवस्थापक हजारी लाल शर्मा के खिलाफ 14 अगस्त 2001 को गबन का निर्णय आया था। आज 2026 तक यानी पूरे ढाई दशक बीत जाने के बाद भी विभाग फाइल पर यही लिख रहा है कि ‘संपत्ति कुर्क, वसूली प्रक्रियाधीन’।
-कस्बा आमेर समिति (16 साल से लंबित): सुरेश बिहारी सक्सेना के खिलाफ संयुक्त रजिस्ट्रार न्यायालय ने 31 अगस्त 2010 को निर्णय दिया था। 92 हजार रुपये के गबन में 16 साल में वसूली के नाम पर विभाग महज 350 जमा करवा सका!
-चंदवाजी समिति: पूर्व व्यवस्थापक बद्री प्रसाद जाट पर 1.45 लाख का गबन साबित हुआ, जिसमें वसूली के नाम पर केवल 200 जमा दिखाए गए हैं।
-मौत का इंतजार और बट्टे खाते की तैयारी: व्यवस्थापकों के जीवित रहते सख्त कुर्की और जेल की कार्रवाई नहीं की जाती। खोराश्यामदास के मामले में तो साफ लिख दिया गया कि व्यवस्थापक की मौत हो गई, कोई वारिस नहीं है, इसलिए अब रकम को अपलेखन (राइट-ऑफ/बट्टे खाते) में डालने की तैयारी है, यानी जनता का पैसा साफ डकार लिया गया।
- सालाना 126 करोड़ का कर्ज वितरण, लेकिन भ्रष्टाचार के दीमक से खोखला हुआ सिस्टम:-
आंकड़ों के अनुसार, क्षेत्र में वर्ष 2022-23 में 99.31 करोड़, 2023-24 में 113.96 करोड़ और वर्ष 2024-25 में 19,575 किसानों को 126.13 करोड़ का अल्पकालीन फसली ऋण बांटा गया। लेकिन जिस तेजी से ऋण का वॉल्यूम बढ़ रहा है, उसी अनुपात में समितियों में निगरानी तंत्र को पूरी तरह पंगु बना दिया गया है:
-समितियां हो रहीं बर्बाद: भ्रष्टाचार और अंधेरगर्दी का आलम यह है कि ढण्ढ ग्राम सेवा सहकारी समिति जैसी कई समितियां घोटालों और अव्यवस्था के चलते पूरी तरह निष्क्रिय व बंद हो चुकी हैं, जिससे सैकड़ों स्थानीय किसान फसली ऋण और खाद-बीज के लिए मोहताज हैं।
-खाद-बीज संकट से हाथ खींचे: एक तरफ जहां समितियों के पैसे लूटे जा रहे हैं, वहीं जिला उपभोक्ता होलसेल भंडारों ने खाद-बीज व्यवसाय से ही पल्ला झाड़ रखा है, जिससे किसान सीधे तौर पर निजी माफियाओं के चंगुल में फंस रहे हैं।
- Expose Now के तीखे सवाल, सहकारिता की लूट पर कब चलेगा कानून का हंटर?
-क्या जानबूझकर दी गई गबनकर्ताओं को ढील?
-जब 9 से 11 करोड़ रुपये के गबन वर्षों से चल रहे थे, तब ऑडिटर्स, इंस्पेक्टर्स और नोडल बैंक के सतर्कता अधिकारी क्या कमीशनखोरी में व्यस्त थे?
-25 साल में भी वसूली शून्य क्यों?
-साल 2001 और 2010 के मामलों में अफसरों ने संपत्ति बेचकर सरकारी खजाने में पैसा जमा क्यों नहीं कराया? क्या दोषी कार्मिकों को बचाकर मामले को उनकी मृत्यु तक खींचने का षड्यंत्र रचा जाता है?
-सिर्फ निचले प्यादों पर कागजी कार्रवाई क्यों?
-गबन प्रमाणित होने के बावजूद शीर्ष जिम्मेदार अधिकारियों और बैंक के सतर्कता प्रबंधकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जेल भेजने की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
सहकारिता के नाम पर करोड़ों की इस संगठित लूट और दशकों से जारी विभागीय लीपापोती ने पूरे तंत्र की साख पर गहरा बट्टा लगाया है। जब तक 15.39 करोड़ रुपये के गबन में केवल निचले स्तर के मृत या सेवानिवृत्त कार्मिकों के नाम पर खानापूर्ति बंद कर, फाइलों को दबाने वाले उच्चाधिकारियों और बैंक के निगरानी तंत्र की आपराधिक जवाबदेही तय नहीं होती, तब तक किसानों के हक पर यह डाका यूं ही जारी रहेगा। पूरे विभाग में यदि निष्पक्ष न्यायिक या ईडी स्तर की जांच हो, तो सहकारिता की आड़ में चल रहा हजारों करोड़ का संगठित सिंडिकेट बेनकाब होगा।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now