-अरबों के क्वार्टजाइट को ‘कौड़ियों के दाम’ लुटाने वाले खनि अभियंताओं (ME) पर मेहरबानी क्यों? अफसरों को बचाने के लिए विभाग ने चली ‘जांच प्रक्रियाधीन’ की चाल
जयपुर/निम्बाहेड़ा। चित्तौड़गढ़ जिले की बड़ी सादडी के निकुम्भ क्षेत्र में अरबों रुपये के बेसकीमती ‘क्वार्टजाइट’ खनिज को मामूली ‘चुनाई पत्थर’ (मैसेनरी स्टोन) बताकर चहेते रसूखदारों को बांटने का खेल तो पकड़ा गया, लेकिन अब इस खेल के पीछे बैठे असली मोहरों—यानी विभागीय खनि अभियंताओं (Mining Engineers) और भू-वैज्ञानिकों को बचाने का एक और बड़ा प्रशासनिक खेल शुरू हो चुका है। सरकार ने यह तो मान लिया कि धांधली हुई थी और दिनांक 01.11.2025 को आनन-फानन में नीलामी व मंशा पत्रों (LOI) को निरस्त कर दिया गया, लेकिन जब बात गुनाहगार अफसरों पर कार्रवाई की आई, तो विभाग ने ‘जांच प्रक्रियाधीन है’ का पुराना ढर्रा अपनाकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। इस पूरे प्रकरण की जांच 8 महिने से चल रही है, जिसकी अभी तक न जो जांच पूरी हुई है और न ही दोषियों पर कार्रवाई हुई है।
मिलीभगत का पूरा क्रोनोलॉजी, आँखों पर पट्टी या जेबों में ‘मलाई’:-
यह कोई लिपिकीय त्रुटि या तकनीकी चूक नहीं थी, बल्कि विभागीय खनि अभियंताओं और भू-वैज्ञानिकों की सोची-समझी मिलीभगत का नतीजा था।
-जमीन पर सच कुछ, फाइल पर कुछ: निकुम्भ के खसरा नंबर 4497, 3377, 4495 और 3581 की जिस जमीन की गहराई में हाई-क्वालिटी ‘ब्लॉकेबल क्वार्टजाइट’ का अकूत भंडार था, उसे खनि अभियंताओं ने महज ‘सतही और टूटा-फूटा’ (वेदर्ड एवं फ्रेक्चर्ड) बताकर साधारण पत्थर की कैटेगरी में डाल दिया।
-खनन ठेकेदारों से ‘गठजोड़’: सूत्रों की मानें तो खनि अभियंताओं ने कुछ चुनिंदा माइनिंग कंपनियों और खनन ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए यह खेल रचा था ताकि उन्हें क्वार्टजाइट जैसी कीमती धातु पर लगने वाली भारी-भरकम रॉयल्टी और प्रीमियम राशि न चुकानी पड़े।
-अचानक बढ़ी बोलियां खोल रही पोल: अगर यह सिर्फ साधारण चुनाई पत्थर था, तो फिर कंपनियों ने इसके लिए 2.50 करोड़ (प्रभु स्पोन्ज प्रा. लि.) और 1.78 करोड़ (माता दधीमती मेटल्स) जैसी आसमान छूती बोलियां क्यों लगाईं? ठेकेदार जानते थे कि भीतर क्या छिपा है, और खनि अभियंताओं ने इस राज को फाइलों में दफन रखा था।
पर्दाफाश के बाद अब ‘बचाओ खेल’, ठंडे बस्ते में जांच:-
जब यह घोटाला उजागर हुआ और शासन के आदेश पर अक्टूबर-नवंबर 2025 में पूरी नीलामी निरस्त करनी पड़ी, तो कायदे से दोषी खनि अभियंताओं को तुरंत निलंबित कर उनके खिलाफ चार्जशीट फाइल होनी चाहिए थी। लेकिन विभाग का मौजूदा रवैया हैरान करने वाला है:
-‘नो लॉस’ थ्योरी का अजीब बहाना: सहायक खनि अभियंता कार्यालय (निम्बाहेड़ा) ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिख दिया कि “चूंकि बोलियां निरस्त कर दी गई हैं, अतः राजस्व का नुकसान नहीं हुआ है।” विभाग इस लूपहोल का इस्तेमाल कर अपने चहेते इंजीनियरों को क्लीन चिट देने की जमीन तैयार कर रहा है। सवाल यह है कि यदि समय रहते यह मामला न खुलता, तो सरकार को जो अरबों का चूना लगता, उसका जिम्मेदार कौन होता?
-कार्रवाई के नाम पर सिर्फ तारीखें: अफसरों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर विभाग ने विधानसभा में लिखित जवाब दिया कि “अधिकारियों/कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई के संबंध में जांच प्रक्रियाधीन है।” सचिवालय और निदेशालय के गलियारों में चर्चा है कि इस ‘प्रक्रियाधीन’ शब्द की आड़ में फाइल को इतनी धीमी गति से चलाया जा रहा है ताकि वक्त बीतने के साथ मामला शांत हो जाए और आरोपी इंजीनियर बिना किसी आंच के बच निकलें।
Expose Now के सवाल—जिनका जवाब महकमे के पास नहीं:-

सवाल नंबर 1: जब वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक और क्षेत्रीय खनि अभियंता की देखरेख में सर्वे हुआ, तो उन्हें सतह के नीचे छिपे ‘क्वार्टजाइट’ की भनक क्यों नहीं लगी? क्या उनकी योग्यता पर शक किया जाए या उनकी नीयत पर?
सवाल नंबर 2: जब 16 अक्टूबर 2025 को ही शासन ने मान लिया था कि खनिज की उपलब्धता छिपाकर राजस्व को हानि पहुँचाने की कोशिश हुई, तो दोषी अधिकारियों पर एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं की गई?
सवाल नंबर 3: क्या सरकार की जीरो-टॉलरेंस नीति सिर्फ छोटे कर्मचारियों के लिए है? इतने बड़े पैमाने पर माइनिंग माफिया से हाथ मिलाने वाले बड़े तकनीकी अधिकारियों को किसके संरक्षण में बचाया जा रहा है?
राजस्व का नुकसान ‘नहीं हुआ’ क्योंकि चोरी पकड़ी गई। लेकिन चोरी की नीयत से तिजोरी की चाबी सौंपने वाले खनि अभियंताओं का खुलेआम घूमना और जांच के नाम पर फाइलों का रेंगना यह साबित करता है कि खान विभाग में ‘मलाई’ का हिस्सा बहुत ऊपर तक गया है। ‘Expose Now’ इस पूरे खेल की जांच और जांच के नाम पर चल रहे खेल का भी जल्द ही पर्दाफाश करेगा।
