जोधपुर/जयपुर: जोधपुर डिस्कॉम में जनता की गाढ़ी कमाई को पानी की तरह बहाने का एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है। डिस्कॉम के अंतर्गत संचालित ‘स्मार्ट बिलिंग परियोजना’ पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद जमीनी हकीकत बेहद दयनीय है। फील्ड स्तर पर तकनीकी समस्याओं का अंबार लगा हुआ है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मौन साधे बैठे हैं। टेंडर दस्तावेजों के अनुसार प्रत्येक सब-डिवीजन को हाई-टेक उपकरणों से लैस किया जाना था, लेकिन आज फील्ड कर्मचारी कबाड़ हो चुके उपकरणों को लेकर काम करने को मजबूर हैं। कागजों में जो योजना बेहद ‘स्मार्ट’ दिख रही थी, वह धरातल पर पूरी तरह फ्लॉप साबित हो रही है।
करोड़ों का बजट, फिर भी कबाड़ हुए उपकरण
टेंडर शर्तों के अनुसार परियोजना में प्रत्येक नए सब-डिवीजन के लिए 33 एंड्रॉइड स्मार्ट मोबाइल फोन, 33 ब्लूटूथ मोबाइल प्रिंटर, 5 डेस्कटॉप कंप्यूटर, एक मल्टीफंक्शन प्रिंटर और अन्य आवश्यक उपकरण उपलब्ध कराने का कड़ा प्रावधान था। इसके लिए राजस्थान के तीनों डिस्कॉम हेतु लगभग 135 करोड़ रुपये का भारी-भरकम टेंडर जारी किया गया था। अकेले जोधपुर डिस्कॉम के हिस्से की लागत ही 56 करोड़ रुपये से अधिक है, जो लगभग 25 लाख उपभोक्ताओं की जेब से जुड़ी है। लेकिन धरातल पर आलम यह है कि बड़ी संख्या में कर्मचारियों के मोबाइल एप्लीकेशन, प्रिंटर और डेटा अपलोडिंग संबंधी समस्याओं का अंबार लगा हुआ है।
टेंडर में स्वीकृत उपकरणों की चौंकाने वाली कीमतें (प्रति यूनिट):

| उपकरण का नाम | स्वीकृत कीमत (प्रति यूनिट) |
| डेस्कटॉप कंप्यूटर | 58,000/- |
| यूपीएस (UPS) | 28,000 से 38,000/- |
| मल्टीफंक्शन प्रिंटर | 25,000/- |
| एंड्रॉइड स्मार्ट मोबाइल फोन | 9,500/- |
| ब्लूटूथ मोबाइल प्रिंटर | 9,000/- |
| पावर बैंक एवं अन्य एसेसरीज | 2,300/- |
आईटी सपोर्ट के नाम पर लाखों का भुगतान, लेकिन फील्ड पर कर्मचारी बेसहारा
इस महाघोटाले का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि टेंडर में प्रत्येक सब-डिवीजन स्तर पर आईटी सपोर्ट स्टाफ के लिए 35,000 रुपये प्रति माह (जीएसटी अतिरिक्त) और सर्कल स्तर पर 60,000 रुपये प्रति माह (जीएसटी अतिरिक्त) के भारी-भरकम भुगतान का प्रावधान किया गया है। इतनी बड़ी राशि देने के बावजूद फील्ड कर्मचारियों का गंभीर आरोप है कि उन्हें समय पर कोई तकनीकी सहायता नहीं मिलती। जब भी बिलिंग सिस्टम या हार्डवेयर में खराबी आती है, तो कर्मचारी भगवान भरोसे छोड़ दिए जाते हैं। कई जगहों पर कर्मचारी एक-दूसरे के प्रिंटर उधार लेकर काम चलाने को मजबूर हैं।
खराब सॉफ्टवेयर और तकनीकी खामियों का जाल, 5 साल के मेंटेनेंस का दावा हवा-हवाई
कागजों में इस योजना को फुलप्रूफ बनाने के लिए संबंधित एजेंसी को 5 वर्षों तक संचालन और रखरखाव (O&M) की पूरी जिम्मेदारी दी गई थी। इसके अलावा 24×7×365 आधार पर संपूर्ण बिलिंग प्रणाली, मोबाइल एप्लीकेशन और त्वरित तकनीकी सहायता प्रदान करने का अनुबंध था। लेकिन मोबाइल सॉफ्टवेयर में लगातार आ रही कमियों ने कर्मचारियों का जीना मुहाल कर रखा है। कर्मचारियों के अनुसार, मोबाइल एप्लीकेशन में कई महत्वपूर्ण विकल्प सही तरीके से कार्य नहीं कर रहे हैं। डेटा अपलोडिंग में अत्यधिक देरी होना, बार-बार लॉगआउट होना और रिपोर्टिंग मॉड्यूल का ठप रहना अब आम बात हो चुकी है, जिससे उपभोक्ता संबंधी जरूरी सूचनाएं समय पर नहीं मिल पा रही हैं।
श्रमिक संगठनों का फूटा गुस्सा, स्वतंत्र तकनीकी जांच और दंडात्मक कार्रवाई की मांग
इस अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के खिलाफ श्रमिक संगठनों ने अब सीधे तौर पर मोर्चा खोल दिया है। श्रमिक प्रतिनिधियों ने पूरे प्रोजेक्ट की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराने की पुरजोर मांग की है। संगठनों का कहना है कि खराब उपकरणों को तत्काल बदला जाए, सॉफ्टवेयर की कमियां दूर की जाएं और सेवा स्तर समझौते (SLA) के उल्लंघन पर दोषी एजेंसी के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाए। उन्होंने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जाने के बाद भी यदि कर्मचारी इस भीषण तकनीकी अव्यवस्था के बीच काम करने को मजबूर हैं, तो इस परियोजना की गुणवत्ता और मॉनिटरिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठना स्वाभाविक है।
(ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now)