नागौर। केन्द्र सरकार के अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की ओर से संचालित होने वाली प्रतिष्ठित छात्रवृत्ति योजनाओं में फर्जी विद्यार्थियों के नाम पर करोड़ों रुपए की छात्रवृत्ति उठाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। साइबर ठगों और शातिर बदमाशों ने छात्रवृत्ति के आवेदन ऑनलाइन भरवाने के लिए तैयार किए गए ‘नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल’ (NSP) की गंभीर तकनीकी खामियों का फायदा उठाकर राजस्थान सहित देश के आठ राज्यों में इस बड़े घोटाले को अंजाम दिया है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा फर्जीवाड़ा वर्ष 2021-22 के दौरान किया गया था, जिसकी भनक केंद्रीय मंत्रालय को तीन साल बाद वर्ष 2025 में लगी। अब छात्रवृत्ति की इस भारी-भरकम राशि को री-कवर करने और दोषियों पर कार्रवाई के लिए पिछले करीब एक साल से प्रशासनिक अधिकारी केवल एक-दूसरे को पत्र लिखने में जुटे हुए हैं।
राजस्थान के 35 जिलों में अलर्ट, जांच के लिए पुलिस को निर्देश
इस महा-फर्जीवाड़े को लेकर राजस्थान सरकार के अल्पसंख्यक मामलात विभाग (निदेशालय), जयपुर के अतिरिक्त मुख्य सचिव (ACS) अश्विनी भगत ने हाल ही में 22 मई को प्रदेश के सभी जिला कलक्टरों एवं पुलिस अधीक्षकों को एक बेहद कड़ा पत्र लिखा है। पत्र में छात्रवृत्ति योजनाओं में हुए इस घोटाले को लेकर संबंधित स्थानीय अधिकारियों से गहन जांच करवाने तथा संदिग्ध व फर्जी पाए गए प्रकरणों में तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं।
इसके बाद विभाग के निदेशक एमडी मीना ने 26 मई को प्रदेश के बारां, बाड़मेर, बूंदी, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ एवं सिरोही को छोड़कर बाकी सभी जिलों के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारियों को और 28 मई को माध्यमिक शिक्षा विभाग बीकानेर के निदेशक को पत्र भेजकर मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
अकेले नागौर जिले में 43 लाख का फर्जीवाड़ा
अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की ओर से देशभर के अल्पसंख्यक वर्ग के छात्र-छात्राओं को प्री-मैट्रिक, उत्तर मैट्रिक और मेरिट कम मीन्स छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। इस योजना के तहत अकेले नागौर (डीडवाना-कुचामन सहित) जिले में कुल 357 विद्यार्थियों (207 नागौर और 150 डीडवाना-कुचामन) के नाम से पूरी तरह फर्जी आवेदन पत्र जमा किए गए और करीब 43 लाख रुपए की राशि उठा ली गई। पूरे राजस्थान की बात करें तो यह आंकड़ा हजारों में है और प्रदेश के 35 जिलों में यह खेल खेला गया है। जांच में सामने आया है कि इस प्रकार फर्जी तरीके से राजस्थान के कोटे की छात्रवृत्ति उठाने वाले ज्यादातर शातिर तत्व और तथाकथित विद्यार्थी पश्चिम बंगाल व बिहार के रहने वाले हैं।
पोर्टल की तकनीकी चूक ने ठगों के लिए खोला रास्ता
मंत्रालय ने जिस निजी कंपनी से नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल तैयार करवाया था, उसमें कोडिंग और सुरक्षा के स्तर पर कई बड़ी खामियां छोड़ दी गई थीं। साइबर अपराधियों ने इसी लूपहोल का फायदा उठाया। सामान्य प्रक्रिया के तहत संस्थान की ऑनलाइन आईडी बनाने के लिए डाइस कोड और संस्था प्रधान के पहचान दस्तावेजों की आवश्यकता होती थी। ठगों ने पोर्टल को हैक करके शैक्षणिक संस्थानों की हूबहू फर्जी आईडी तैयार कर ली और फिर उन्हीं आईडी का इस्तेमाल कर हजारों फर्जी छात्रों के नाम से आवेदन सबमिट कर दिए।
छात्र से लेकर संस्था तक सब फर्जी, वेरिफिकेशन का भी अनोखा खेल
अब तक की विभागीय जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद हैरान करने वाले हैं। आवेदन करने वाले ज्यादातर लड़के-लड़कियां पश्चिम बंगाल व बिहार के हैं, जिन्हें नागौर सहित राजस्थान के अलग-अलग जिलों के स्कूलों और कॉलेजों में नियमित अध्ययनरत दिखाकर फर्जी दस्तावेज अपलोड किए गए थे। ठगों ने नागौर व डीडवाना-कुचामन में कुल 77 संस्थाओं की फर्जी प्रोफाइल (आईडी) बनाई।
इस पोर्टल की सबसे बड़ी खामी यह थी कि शैक्षणिक संस्थान चाहे देश के किसी भी कोने में स्थित हो, आवेदन करने वाला छात्र जहां का मूल निवासी दर्शाया जाएगा, उसके वेरिफिकेशन (सत्यापन) का ऑनलाइन लिंक भी उसी जिले के अधिकारी के पास स्वतः ट्रांसफर हो जाता था। ठगों ने फर्जी आईडी के जरिए छात्रों का वेरिफिकेशन भी अपने स्तर पर ही खुद कर लिया।
बैंक खातों में ‘नागौर का आईएफएससी’ और ‘बिहार-बंगाल के खाते’
अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की आंतरिक जांच में एक और बड़ा तकनीकी संशय और वित्तीय गड़बड़ी सामने आई है। जिन तथाकथित विद्यार्थियों के खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए स्कॉलरशिप की राशि ट्रांसफर हुई है, वे सारे बैंक खाते वास्तविक रूप से बिहार और पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में संचालित हैं। जबकि, ऑनलाइन ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड में इंडियन फाइनेंशियल सिस्टम कोड (IFSC) नागौर शहर की स्थानीय बैंक शाखाओं के दर्ज हैं।
बैंकिंग नियमों के अनुसार, यदि बैंक खाता किसी अन्य राज्य का हो और आईएफएससी कोड किसी दूसरे शहर का, तो ऑनलाइन फंड ट्रांसफर होना व्यावहारिक रूप से असंभव है; लेकिन इसके बावजूद डिजिटल सिस्टम को चकमा देकर लाखों रुपए की राशि पार कर दी गई। इसके तुरंत बाद ठगों ने इन अधिकांश बैंक खातों को स्थाई रूप से बंद भी कर दिया।
जांच अधिकारी का बयान: “अल्पसंख्यक छात्रवृत्ति योजना में हुए इस बड़े फर्जीवाड़े की जांच बहुत बारीकी से चल रही है। विभाग की ओर से इस मामले में एफआईआर तो काफी पहले दर्ज करवा दी गई थी, लेकिन संदिग्ध विद्यार्थियों का विस्तृत रिकॉर्ड और डेटा अब जाकर पुलिस को उपलब्ध कराया गया है। अब हमारी विशेष टीमें संबंधित राज्यों (पश्चिम बंगाल और बिहार) में जाकर जमीनी स्तर पर इन खातों और छात्रों का वेरिफिकेशन करेंगी।”
— धरम पूनिया, डीएसपी, साइबर थाना, नागौर
