सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्देश: ‘तारीख पर तारीख’ अब और नहीं, हाईकोर्ट को सुरक्षित रखने के 3 महीने के भीतर सुनाना होगा फैसला

नई दिल्ली। देश की अदालतों में फैसलों में होने वाली देरी पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने बेहद सख्त रुख अपनाया है । शुक्रवार (29 मई 2026) को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि अदालतों में ‘तारीख पर तारीख’ का सिलसिला अब और नहीं चलेगा । मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने एक ऐतिहासिक निर्देश जारी करते हुए देश भर के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) के लिए 12 कड़े दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) लागू किए हैं ।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्याय में अत्यधिक देरी नागरिकों के त्वरित सुनवाई के मूल अधिकार (संविधान के अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन है । कोर्ट ने टिप्पणी की कि फैसलों में देरी से याचिकाकर्ताओं को अपूरणीय क्षति हो सकती है । नए निर्देशों के तहत, हाईकोर्ट को फैसला सुरक्षित रखने के तीन महीने के अंदर हर हाल में अपना निर्णय सुनाना होगा

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी प्रमुख दिशा-निर्देश (Guidelines)

सुप्रीम कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, फैसले की समय-सीमा और पारदर्शिता को लेकर विस्तृत नियम तय किए हैं:

श्रेणियांजारी किए गए सख्त निर्देश
व्यक्तिगत स्वतंत्रता व जमानत• निजी स्वतंत्रता से जुड़े मामलों (रेगुलर बेल, अग्रिम जमानत) में हाईकोर्ट को तेजी दिखानी होगी
• जमानत याचिकाओं पर आदेश उसी दिन या अगले दिन सुनाया और अपलोड किया जाना चाहिए
• यदि ऑर्डर रिजर्व रखा जाता है, तो उसे अगले दिन हर हाल में सुनाया जाए
जेल प्रशासन व रिहाई• जमानत या सजा पर रोक के आदेश की सूचना जेल प्रशासन को तुरंत भेजी जाए
• आरोपी/दोषी को उसी दिन या अधिकतम अगले दिन रिहा किया जाए (बशर्ते वह किसी अन्य केस में वॉन्टेड न हो)
फैसले की समय-सीमा व स्पष्टीकरण• आपराधिक/फांसी की सजा से जुड़े मामलों में जज फैसला सुरक्षित रखने के 7 दिन के भीतर दोनों पक्षों से स्पष्टीकरण मांग सकते हैं
• बाकी मामलों में फैसला रिजर्व रखने के 1 महीने के बाद कोर्ट कोई भी सफाई या दलीलें नहीं मांग सकता है
विस्तृत आदेश में देरी• यदि फैसले का ऑपरेटिव भाग सुनाया गया हो और 15 दिन तक विस्तृत फैसला अपलोड न हो, तो रजिस्ट्रार जनरल चीफ जस्टिस को बताएंगे । अगले 2 दिन में संबंधित बेंच को सूचित किया जाएगा
3 से 4 महीने की सीमा3 महीने तक फैसला न आने पर कोई भी पक्षकार आवेदन दे सकता है, जिस पर 2 दिन के अंदर सुनवाई होगी
• यदि अवधि 4 महीने (3 महीने + 1 माह) हो जाए, तो पक्षकार चीफ जस्टिस से मामले को दूसरी बेंच को सौंपने की अपील कर सकता है
निगरानी, पारदर्शिता व डिजिटल सूचना• हर महीने हाईकोर्ट की वेबसाइट से चीफ जस्टिस और संबंधित बेंच को ऑटोमैटिक ई-मेल भेजा जाएगा, जिसमें रिजर्व रखे गए मामलों की पूरी जानकारी होगी
• सर्टिफाइड कॉपी में फैसला सुरक्षित रखने, सुनाने और वेबसाइट पर अपलोड करने की तारीख स्पष्ट लिखी होनी चाहिए
• वेबसाइट पर केस स्टेटस में ये तीनों तारीखें लाइव दिखनी चाहिए
• फैसला अपलोड होने पर पक्षकारों और वकीलों को ई-मेल से तुरंत जानकारी दी जाए

नियमों में बदलाव कर जल्द लागू करने के निर्देश

सर्वोच्च न्यायालय ने सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया है कि वे इन दिशानिर्देशों को अपने चीफ जस्टिस के समक्ष पेश करें । इसके पीछे का उद्देश्य यह है कि अदालत के नियमों में आवश्यक बदलाव कर इन गाइडलाइंस को जल्द से जल्द औपचारिक रूप से लागू किया जा सके

इस फैसले को देश की न्यायिक व्यवस्था में एक बड़े और सकारात्मक सुधार के रूप में देखा जा रहा है, जिससे वर्षों तक फैसलों का इंतजार करने वाले वादियों को बड़ी राहत मिलेगी।

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