Expose Now विशेष रिपोर्ट: PHED की ‘पीस-मील’ नीति, सिरोही की पेयजल व्यवस्था एक्सटेंशन के भरोसे, क्या इंजीनियर्स की सुस्ती के कारण रेंग रही हैं योजनाएं?

-शहरी जलप्रदाय योजना के संचालन और रखरखाव का कार्य मार्च, 2025 में पूरा हो गया था ठेका, लेकिन 14 महिने से 'एक्सटेंशन' के भरोसे चल रही है योजना

जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) में समय पर फैसले न लेने और निविदाओं को लटकाए रखने की पुरानी बीमारी एक बार फिर उजागर हुई है। मामला सिरोही शहरी जल प्रदाय योजना (UWSS) के संचालन और रखरखाव (O&M) से जुड़ा है, जिसे लेकर हाल ही में हुई फाइनेंस कमेटी (FC-916) की बैठक में जो सच सामने आया, उसने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।कमेटी ने सिरोही की पेयजल व्यवस्था को ठप होने से बचाने के लिए मजबूरी में मौजूदा कांट्रेक्टर मेसर्स शिवम बोरवेल (भीलवाड़ा) का कार्यकाल 9 महीने (12.12.2025 से 11.09.2026 तक) के लिए बढ़ा तो दिया है, लेकिन टुकड़ों-टुकड़ों में एक्सटेंशन देने (Piece-meal extension) की रवायत पर अफसरों को कड़ी फटकार भी लगाई है।

टुकड़ों में ‘एक्सटेंशन’ का खेल, क्यों समय रहते नहीं चेते PHED के आला अधिकारी?

सिरोही की पेयजल व्यवस्था का मूल ठेका 3 साल के लिए 2,42,03,188.44 का था, जो 12 मार्च 2025 को ही खत्म हो चुका था। इसके बाद विभाग को नई क्लस्टर निविदाएं जारी करनी चाहिए थीं, लेकिन अफसरों की सुस्ती का आलम देखिए:

  • पहले अतिरिक्त मुख्य अभियंता (ACE) ने 3 महीने का एक्सटेंशन दिया।
  • फिर मुख्य अभियंता (CE) ने दो बार में 6 महीने का एक्सटेंशन और दे दिया।
  • और अब, तीसरी बार फाइनेंस कमेटी के सामने 9 महीने का और एक्सटेंशन देने का प्रस्ताव लाया गया।
  • फाइनेंस कमेटी ने इस ‘पीस-मील’ (टुकड़े-टुकड़े में) सेवा विस्तार की नीति पर सख्त ऐतराज जताते हुए इसे ‘खराब कार्यप्रणाली’ (Not a good practice) करार दिया है और भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी है।

L&T की लेटलतीफी और नई निविदाओं में देरी, जनता भुगत रही है खामियाजा?

कागजों के मुताबिक, सिरोही की जल प्रदाय योजना के पुनर्गठन (Re-organization) का काम आरयूआईडीपी (RUIDP) के जरिए मेसर्स लार्सन एंड टुब्रो (L&T) को दिया गया था। लेकिन एलएंडटी का यह काम तय वक्त से काफी पिछड़ चुका है और इसे पूरा होने में अभी कम से कम 12 महीने और लगेंगे। दूसरी तरफ, जिला स्तर पर ओएंडएम (O&M) के लिए क्लस्टर पैकेज बनाने की प्रक्रिया इतनी धीमी है कि नई एजेंसी तय होने का दूर-दूर तक अता-पता नहीं है। सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों के प्रोजेक्ट्स लेट होते हैं, तो क्या अधिकारियों की कोई जवाबदेही तय नहीं होती? क्यों हर बार जनता की मजबूरी का हवाला देकर पुराने ठेकों को ही खींचते रहने का शॉर्टकट अपनाया जाता है?

कमेटी का अल्टीमेटम, ठेका खत्म होने से 6 महीने पहले निकालो टेंडर:-

इस पूरे ढर्रे से नाराज होकर फाइनेंस कमेटी ने अब पीएचईडी को कड़े निर्देश जारी किए हैं:

  • 6 महीने पहले टेंडर: भविष्य में मौजूदा ओएंडएम ठेका खत्म होने से कम से कम 6 महीने पहले नई आउटसोर्सिंग एजेंसी के लिए निविदाएं जारी करनी होंगी, ताकि नया कॉन्ट्रैक्ट समय पर लाइव हो सके।
  • बजट की सीमा: नया एक्सटेंशन आरटीपीपी रूल्स, 2013 के नियम 73(3) के तहत इस शर्त पर दिया गया है कि एक्सटेंशन की राशि मूल ठेके के 50% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।
  • आईटी टूल/अलार्म मैकेनिज्म: विभाग में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो, इसके लिए एक ऐसा आईटी टूल या अलार्म मैकेनिज्म विकसित करने को कहा गया है जो ठेका खत्म होने से पहले ही अधिकारियों को सचेत कर दे।

इसके साथ ही, संबंधित मुख्य अभियंता को निर्देश दिए गए हैं कि वे ESCO मोड सहित राज्य के सभी चल रहे और विस्तारित ओएंडएम अनुबंधों की सूची एक्सपायरी डेट के साथ अगली बैठक में पेश करें।

Expose Now का सवाल: क्या सिर्फ ‘अलार्म टूल’ बना देने से अफसरों की सुस्ती दूर हो जाएगी, या फिर समय पर टेंडर न करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों की सैलरी और एसीआर (ACR) से इस लापरवाही को जोड़ा जाएगा?

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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