-इंजीनियरों की ‘शतरंज’ में फंसी जनता की प्यास: डेढ़ साल तक कछुआ चाल से चलती रही फाइलें, जब सेटिंग नहीं बैठी तो ‘RTPP एक्ट’ की आड़ लेकर पूरा खेल ही पलट दिया!
-नियमों की धज्जियां उड़ाने वाला ‘पीएचईडी सिंडिकेट’: बिना निविदा प्रकाशन के आगे बढ़ती रहीं करोड़ों की फाइलें, क्या उच्चाधिकारियों की नाक के नीचे चल रहा था टेंडर मैनेज करने का गुप्त मिशन?
-सिर्फ नोटिस का ड्रामा, असली ‘मगरमच्छों’ पर मेहरबानी: पिछले 3 साल से लगातार टेंडर निरस्त होने का रिकॉर्ड, फिर भी किसी दागी इंजीनियर पर नहीं गिरी गाज; आखिर किसका वरदहस्त है इस पूरे नेक्सस पर?
-साजिश या महा-लापरवाही? 6 बड़ी कंपनियों की बिड्स खुलने के बाद याद आई अखबार की कटिंग; अमृत-2.0 के बजट को ठिकाने लगाने की इनसाइड स्टोरी!
जयपुर/कोटा। जनस्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) में जनता के पैसे और सरकारी योजनाओं को किस तरह मखौल बनाया जा रहा है, इसका एक और सनसनीखेज उदाहरण सामने आया है। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘अमृत- 2.0’ योजना के तहत कोटा-साउथ शहरी जलप्रदाय योजना (UWSS) के सुदृढ़ीकरण का 20,895.26 लाख रुपये (करीब 208 करोड़ रुपये) का प्रोजेक्ट इंजीनियरों और ठेकेदारों की कथित मिलीभगत और नियमों को ठेंगे पर रखने की आदत के कारण रद्द करना पड़ा है।
वित्त समिति की 916वीं बैठक में लिए गए फैसले ने पीएचईडी महकमे में चल रहे टेंडर फिक्सिंग और ‘मैनेजमेंट’ के उस काले खेल से पर्दा उठा दिया है, जिसके तहत अधिकारी महिनों तक फाइलों को दबाए रखते हैं और अंत में तकनीकी कमियों का बहाना बनाकर पूरी प्रक्रिया को ही ठप कर देते हैं।
जब टेंडर ‘मैनेज’ नहीं हुआ, तो याद आए नियम:-
वित्त समिति में कोटा-साउथ के इस प्रोजेक्ट के लिए निविदा (NIB No. 11/2025-26) जारी की गई थी, जिसमें 5 साल के संचालन व संधारण (O&M) का काम भी शामिल था। इस निविदा के तहत 12 सितंबर 2025 को तकनीकी बीड्स खोली गईं, जिसमें देश की 6 बड़ी कंपनियों (मैसर्स पी. दास इंफ्रास्ट्रक्चर-यादव कंस्ट्रक्शन JV, मैसर्स GCKC प्रोजेक्ट्स, मैसर्स LCC प्रोजेक्ट्स, मैसर्स LNA आईपीएल-स्यान JV, मैसर्स जुबेरी इंजीनियरिंग और मैसर्स EMS लिमिटेड) ने भाग लिया था।
हैरानी की बात देखिए, सितंबर 2025 में बीड्स खुलने के बाद विभाग के इंजीनियर चैन की नींद सोते रहे। जब दिसंबर 2025 के अंत में बिड इवैल्युएशन कमेटी (BEC) की बैठक हुई, तब जाकर यह ‘अचानक’ पता चला कि इस 208 करोड़ के टेंडर का विज्ञापन कोटा के स्थानीय समाचार पत्र में प्रकाशित ही नहीं हुआ था। यह राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता (RTPP) नियम 2013 के नियम 43 का सीधा उल्लंघन था।
विभाग के भीतर का सबसे बड़ा सच:-
सूत्र बताते हैं कि यह कोई सामान्य भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी है। बिना निविदा और कोरिजेंडम (शुद्धिपत्र 1 से 8 तक) के उचित प्रकाशन के, इंजीनियर पूरी प्रक्रिया को अंतिम चरण तक खींचते रहते हैं। यदि बैकडोर से चहेते ठेकेदार के साथ टेंडर ‘मैनेज’ हो जाता है, तो इन कमियों को फाइलों के नीचे दबा दिया जाता है। लेकिन जैसे ही टेंडर मनमाफिक फर्म को मिलता नहीं दिखता या खेल बिगड़ता है, वैसे ही “नियमों के उल्लंघन” का बहाना बनाकर टेंडर को निरस्त (Annul) करवा दिया जाता है ताकि नए सिरे से चहेतों को मौका दिया जा सके।
8-8 कोरिजेंडम जारी हो गए, पर स्थानीय अखबार में छपवाना ‘भूले’ इंजीनियर:-
मुख्य अभियंता (शहरी एवं एनआरडब्ल्यू) ने समिति को बताया कि निविदा और उसके बाद एक-दो नहीं, बल्कि 8 शुद्धिपत्र (Corrigendum 1 to 8) जारी किए गए। इन सभी को सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (DIPR) को भेजा तो गया, लेकिन धरातल पर इनका प्रकाशन सुनिश्चित नहीं कराया गया। सवाल यह उठता है कि जब करोड़ों रुपये का प्रोजेक्ट दांव पर था, तो संबंधित अधिकारियों ने महीनों तक लाइव बिड्स की ट्रैकिंग और प्रकाशन का सत्यापन क्यों नहीं किया? क्या अधिकारी केवल कागजी घोड़े दौड़ा रहे थे या जानबूझकर नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही थीं ताकि प्रक्रिया को ‘फेत एकम्पली’ (fait accompli – ऐसा काम जो अपरिवर्तनीय हो चुका हो) बनाया जा सके?
समिति ने भी माना—’सालों से चल रहा है यही खेल’:-
वित्त समिति की बैठक में खुद उच्चाधिकारियों ने स्वीकार किया कि पिछले 2 से 3 सालों में पीएचईडी में इसी तरह की ‘लापरवाही’ के कारण कई महत्वपूर्ण टेंडर निरस्त करने पड़े हैं। इसका सीधा मतलब है कि विभाग के भीतर एक ऐसा नेक्सस काम कर रहा है जो टेंडरों को अटकाने, लटकाने और अपनी शर्तों पर निरस्त कराने में माहिर हो चुका है। डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी जनता को पानी पहुंचाने वाली अमृत-2.0 योजना के टेंडर फाइनल नहीं हो पा रहे हैं, जिससे प्रोजेक्ट की लागत बढ़ रही है और जनता प्यासी है।
फैसले के नाम पर खानापूर्ति: आखिर जिम्मेदार कौन?
इस भारी विफलता और भ्रष्टाचार के संदेह के बाद समिति ने निम्नलिखित निर्णय लिए हैं:
-टेंडर निरस्त: RTPP नियम 72 के तहत इस निविदा प्रक्रिया को पूरी तरह रद्द कर दिया गया है।
-नए टेंडर की घोषणा: काम के लिए फिर से फ्रेश बिड्स आमंत्रित की जाएंगी (यानी जनता का समय और पैसा फिर बर्बाद होगा)।
-कारण बताओ नोटिस: जिम्मेदार अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस (Show Cause Notice) जारी करने के निर्देश दिए गए हैं।
-चेकलिस्ट निर्माण: भविष्य में ऐसी ‘गलतियां’ न हों, इसके लिए एक चेकलिस्ट बनाई जाएगी।
पीएचईडी के इस पूरे खेल में आज तक किसी बड़े मगरमच्छ पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? कारण बताओ नोटिस जारी करके फाइलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, जबकि करोड़ों की योजनाओं को पलीता लगाने वाले इंजीनियर मलाईदार पदों पर बने रहते हैं। कोटा की जनता को बूंद-बूंद पानी के लिए तरसाने वाले और सरकार के खजाने को चूना लगाने वाले इन इंजीनियरों की जवाबदेही तय करने का साहस आखिर कौन दिखाएगा?
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now