-जनवरी 2025 में आमंत्रित JJM टेंडर प्राइज बिड खुलने के बाद मई 2026 तक भी नहीं हो सका फाइनल
-मुख्यमंत्री के गृह जिले के प्रोजेक्ट्स के ये हैं हाल, तो फिर पूरे प्रदेश में क्या होंगे हालात ?
-बड़ा सवाल ये है कि पीएचईडी में इस गंभीर लापरवाही के लिए किसी की जिम्मेदार तय नहीं ?
जयपुर। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) राजस्थान की कछुआ चाल और टेंडर कार्य प्रणाली एक बार फिर बड़े सवालों के घेरे में है। सरकार जहां ‘हर घर जल’ पहुंचाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रही है, वहीं विभाग के आला अधिकारियों की लापरवाही और सुस्त प्रशासनिक रवैये के कारण भरतपुर जिले का एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले ही दफन हो गया।
‘चम्बल धौलपुर भरतपुर प्रोजेक्ट (पैकेज-3)’ के तहत गांवों में FHTCs (Functional Household Tap Connections) यानी घरेलू नल कनेक्शन देने का 232.30 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट कागजी फाइलों के फेर में फंसकर आधिकारिक तौर पर रद्द (Annul) कर दिया गया है। जनता प्यासी रही और विभाग फाइलों पर कुंडली मारकर बैठा रहा।
क्या है पूरा मामला?
दस्तावेज़ों के मुताबिक, इस मेगा प्रोजेक्ट के लिए जनवरी 2025 में NIT No. 01/2024-25 जारी की गई थी। इस टेंडर प्रक्रिया में कुल 4 बिडर्स (कंपनियों) ने भाग लिया था।
-11 फरवरी 2025: टेक्निकल बिड खोली गई।
-25 जून 2025: तीन बिडर्स को क्वालीफाई किया गया।
-30 जून 2025: प्राइस बिड खोली गई।
-जुलाई 2025: M/s Shree Hari Infra Projects Pvt. Ltd. को सबसे कम बोली लगाने वाला (L1 बिडर) चुना गया। कंपनी ने 259.06 करोड़ की बोली लगाई थी, जिसे वित्त समिति (FC904) ने मंजूरी भी दे दी थी।
ट्विस्ट यहाँ आया: चूंकि बोली टेंडर की मूल लागत (232.30 करोड़) से 11.52% अधिक (टेंडर प्रीमियम) थी, इसलिए नियमानुसार 24 जुलाई 2025 को फाइल वित्त विभाग (Finance Department) को मंजूरी और वर्क ऑर्डर जारी करने की अनुमति के लिए भेजी गई।
लापरवाही का पीक: फाइल घूमती रही, बिड वैलिडिटी खत्म हो गई !
मंजूरी के लिए भेजी गई इस फाइल पर विभाग महीनों तक सोता रहा। नतीजा यह हुआ कि टेंडर प्रक्रिया में शामिल सभी कंपनियों के ‘बिड वैलिडिटी’ (बोली की वैधता अवधि) एक-एक करके खत्म हो गई:
-M/s LNA Infra और M/s Universal MEP की वैलिडिटी 11.07.2025 को ही खत्म हो गई।
–M/s Keystone Infra की वैलिडिटी 31.08.2025 को खत्म हुई।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि एल-1 बिडर (M/s Shree Hari Infra) की बिड वैलिडिटी 14 मार्च 2026 तक थी। विभाग के पास करीब 8 महीने का वक्त था, लेकिन सुस्त कार्यप्रणाली के चलते जब तक फैसला होता, तब तक इस कंपनी ने भी समय सीमा आगे बढ़ाने से साफ मना कर दिया।
परिणाम: सभी कंपनियों की बिड वैलिडिटी समाप्त होने के कारण पूरा टेंडर RTPP Rules, 2013 के नियम 72 के तहत रद्द करना पड़ा। अब दोबारा से नए सिरे (Fresh Bid) से टेंडर आमंत्रित किए जाएंगे, यानि फिर वही पूरी टेंडर प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
PHED की टेंडर कार्यप्रणाली पर 4 बड़े तीखे सवाल:
- 8 महीने तक क्या सोता रहा विभाग?
जब जुलाई 2025 में ही L1 बिडर तय हो चुका था और उसकी बिड वैलिडिटी मार्च 2026 तक थी, तो विभाग 8 महीने तक वित्त विभाग से मंजूरी क्यों नहीं ले पाया? इस देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारी कौन हैं?
- जनता के करोड़ों के नुकसान और वक्त की बर्बादी का जिम्मेदार कौन?
अब जब दोबारा (Fresh Bid) टेंडर आमंत्रित किए जाएंगे, तो पूरी प्रक्रिया में फिर से महीनों का वक्त लगेगा। प्रोजेक्ट की लागत भी बढ़ सकती है। भरतपुर, रूपबास, उच्चैन, कुम्हेर ब्लॉक के जिन ग्रामीणों को अब तक पानी मिल जाना चाहिए था, उन्हें अब और लंबा इंतजार करना होगा। इस लेट-लतीफी का हर्जाना कौन भरेगा?
- कमेटी की नाराजगी सिर्फ कागजी क्यों?
दस्तावेजों के मुताबिक, वित्त समिति (FC) ने इस बात पर ‘कड़ा असंतोष और नाराजगी’ (Displeasure) जताई है कि जिस टेंडर को जुलाई 2025 में मंजूरी दे दी गई थी, उसे आज रद्द करना पड़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ नाराजगी जताने से व्यवस्था सुधरेगी या दोषी अधिकारियों पर कोई बड़ी कार्रवाई भी होगी?
- क्या यह कोई सोची-समझी क्रोनी प्रैक्टिस है?
एक तयशुदा टेंडर को सिर्फ समय सीमा (Bid Validity) खत्म होने की कगार पर पहुंचाकर रद्द करवा देना, क्या किसी खास वेंडर को फायदा पहुंचाने या प्रक्रिया को जानबूझकर लटकाने का हिस्सा है? इसकी उच्च स्तरीय जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
कमेटी का कड़ा रुख, अब मांगी गई ‘देरी की वजह’:-
मामले की गंभीरता को देखते हुए अब उच्च स्तर से CE (SP), PHED जयपुर को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे भविष्य में ऐसे मामलों में समय पर पैरवी (Timely Pursuance) सुनिश्चित करें। साथ ही, SLSSC द्वारा प्रशासनिक एवं वित्तीय (A&F) स्वीकृति मिलने से लेकर टेंडर रद्द होने तक की पूरी टाइमलाइन और देरी के सटीक कारणों की रिपोर्ट मांगी गई है।
लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस पूरे टेंडर की प्रक्रिया में देरी के लिए मुख्य अभियंता स्पेशल प्रोजेक्ट, पीएचईडी ही तो जिम्मेदार है और फायनेंस कमेटी बैठक में प्रमुख शासन सचिव, पीएचईडी द्वारा उन्हीं से इस पूरे प्रकरण में देरी के कारणों की रिपोर्ट मांगी गई है। ऐसे में इस प्रकरण की रिपोर्ट पर अभी से सवाल खड़े हो गए हैं। अब देखना ये है कि क्या PHED के जिम्मेदार अधिकारी इस जांच में बच निकलेंगे, या फिर प्रमुख शासन सचिव, पीएचईडी जल जीवन मिशन के इस बंटाधार पर कोई कड़ा एक्शन लेकर मिसाल कायम करेंगे ?
देखते रहिए Expose Now की यह खास सीरीज…