-सियासी रसूख की जंग: सांसद को ‘हल्के’ में लेना पड़ा महंगा, मंत्री को रात भर नहीं आई नींद, इंजीनियर्स के बजाय सीधे निशाने पर रहे कन्हैयालाल
जयपुर/ झालावाड़। राजनीति में भौगोलिक दूरियां तो नक्शे से तय होती हैं, लेकिन सियासी दूरियां ईगो और प्रोटोकॉल से। झालावाड़ में हाल ही में हुई पेयजल समीक्षा बैठक केवल पानी की किल्लत दूर करने का जरिया नहीं रही, बल्कि इसने सत्ता के गलियारों में यह संदेश दे दिया कि ‘झालावाड़ के रसूख’ को नजरअंदाज करना किसी भी मंत्री को किस कदर भारी पड़ सकता है।
विवाद की जड़, कोटा से ही क्यों लौट गए मंत्री?
पूरा मामला उस वक्त शुरू हुआ जब पीएचईडी मंत्री कन्हैयालाल चौधरी का कोटा दौरा तय हुआ था। तय कार्यक्रम के अनुसार कोटा के बाद उन्हें झालावाड़ में भी अधिकारियों की बैठक लेनी थी। लेकिन मंत्री अन्य कार्यक्रमों में व्यस्त रहे और फिर झालावाड़ का कार्यक्रम रद्द कर वापस लौट गए।
जब झालावाड़ सांसद दुष्यंत सिंह ने दोबारा मंत्री को बुलाया, तो मंत्री ने कथित तौर पर ‘बहाना’ बना दिया और कह दिया कि— “एसीई को बोल दिया है, वो आपके निर्देशानुसार काम कर देंगे।” बस, यही वो ‘दूरी’ थी जिसने सांसद के ईगो को हर्ट कर दिया। उन्हें लगा कि एक कैबिनेट मंत्री उन्हें और उनके क्षेत्र को हल्के में ले रहा है।

जब ‘माता’ के दरबार में लगी हाजिरी:-
सांसद दुष्यंत सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी अपनी माता और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को दी। राजे का एक इशारा ही काफी था। आनन-फानन में 10 मई का दिन बैठक के लिए तय हुआ। मामला हाथ से निकलता देख मंत्री कन्हैयालाल चौधरी बैकफुट पर आए और अपनी ‘इंजीनियर्स की फौज’ (सीई शहरी, ग्रामीण, जेजेएम और स्पेशल प्रोजेक्ट) को 9 मई की शाम को ही झालावाड़ पहुँचने के निर्देश दे दिए।

9 बजे का इंतजार और ‘पॉलिटिकल वेटिंग’:-
झालावाड़ पहुँचने के बाद भी मंत्री की मुश्किलें कम नहीं हुईं। पूरे दिन बैठक का समय बदलता रहा। शाम 6 बजे का समय तय हुआ, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे रात 9 बजे बैठक में पहुँचीं। तब तक मंत्री और प्रदेश के सबसे बड़े तकनीकी अधिकारी पूरे दिन हाथ बांधे इंतजार करते रहे। यह ‘वेटिंग पीरियड’ मंत्री के लिए किसी मानसिक दबाव से कम नहीं था।
बैठक में ‘वॉटर सप्लाई’ से ज्यादा ‘पॉलिटिकल प्रेशर’:-
रात 9 बजे जब बैठक शुरू हुई, तो नजारा बदला हुआ था। अमूमन ऐसी बैठकों में सांसद अधिकारियों को फटकारते हैं, लेकिन यहाँ निशाने पर सीधे मंत्री कन्हैयालाल चौधरी थे। सांसद दुष्यंत सिंह ने कई बार मंत्री को आड़े हाथों लिया। उनके तेवर इतने सख्त थे कि कई बार वसुंधरा राजे को बीच-बचाव कर मामले को वापस पेयजल मुद्दों पर लाना पड़ा। जो मंत्री अक्सर जिम्मेदारी लेने से बचने के लिए जाने जाते हैं, वे यहाँ ‘मौके की नजाकत’ को देखते हुए ज्यादातर समय चुप रहे या आश्वासन देते नजर आए। बैठक में विभाग के चीफ इंजीनियर्स, जो अक्सर ऐसी बैठकों में पसीने छोड़ते हैं, इस बार राहत में थे क्योंकि सारा ‘टारगेट’ उनके मंत्री जी ही बने हुए थे।

आज भी ‘झालावाड़’ का अपना एक अलग प्रोटोकॉल:-
रात 11 बजे जब बैठक खत्म हुई, तो मंत्री ने राहत की सांस तो ली, लेकिन उनके चेहरे पर दिनभर की थकान और सांसद की तल्खी साफ दिख रही थी। चर्चा है कि बैठक खत्म होने के बाद भी मंत्री काफी देर तक खुद से कुछ बुदबुदाते रहे और उन्हें पूरी रात नींद नहीं आई। इस बैठक से सांसद का ‘ईगो’ तो संतुष्ट हो गया, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि राजस्थान की राजनीति में आज भी ‘झालावाड़’ का अपना एक अलग प्रोटोकॉल है, जिसे तोड़ना किसी भी मंत्री की सेहत के लिए ठीक नहीं है।
