राजस्थान सरकार के नशा मुक्ति अभियान को जिले में चिकित्सा विभाग की अनदेखी का सामना करना पड़ रहा है। पिछले डेढ़ महीने से नशा मुक्ति के लिए आवश्यक दवाओं की खेप जिले को नहीं मिली है, जिससे नशे की लत छोड़ने की कोशिश कर रहे युवाओं को भारी निराशा हाथ लग रही है। विभाग द्वारा कई बार मांग भेजे जाने के बावजूद न तो आपूर्ति हुई है और न ही स्थानीय स्तर पर पीएमओ (PMO) या सीएमएचओ (CMHO) द्वारा दवाओं की खरीद की गई है।
उजाला क्लिनिक: बिना दवा लौट रहे मरीज
जिला चिकित्सालय स्थित उजाला क्लिनिक में युवाओं को नशे से मुक्ति दिलाने के लिए काउंसलिंग और दवाओं की सुविधा दी जाती है। क्लिनिक की स्थिति वर्तमान में काफी चिंताजनक है:
- प्रतिदिन 8 से 10 नए रोगी दवा के लिए क्लिनिक पहुंच रहे हैं।
- दवा उपलब्ध न होने के कारण मरीजों को केवल समझाइश देकर वापस लौटाया जा रहा है।
- दवाओं के साथ-साथ जागरूकता के लिए इस्तेमाल होने वाले ब्रोशर भी खत्म हो चुके हैं।
बढ़ रहे हैं रोगी, स्क्रीनिंग में देरी
चिकित्सा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि नशे के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं:
- वर्ष 2025: जिले में 3317 टीबी (TB) रोगी चिह्नित किए गए थे, जिनमें से 486 की स्क्रीनिंग नहीं हो सकी।
- मार्च 2026 तक: इस वर्ष अब तक 828 रोगी चिह्नित हुए हैं, जिनमें से 320 की स्क्रीनिंग लंबित है।
- तम्बाकू का प्रभाव: वर्ष 2025 में टीबी के मरीजों में 621 तम्बाकू का सेवन करने वाले थे, जबकि मार्च 2026 तक यह संख्या 138 दर्ज की गई है।
6 साल से बंद है फेफड़ों की जांच (स्पाइरोमीटर)
क्लिनिक प्रभारी मोनिका स्वामी के अनुसार, वर्ष 2020 से अस्पताल में स्पाइरोमीटर मशीन बंद पड़ी है।
- इस मशीन का उपयोग फेफड़ों की कार्यक्षमता और सांस की गति मापने के लिए किया जाता है।
- यह अस्थमा और श्वसन रोगों की निगरानी के लिए अनिवार्य है।
- मशीन खराब होने से मरीजों को अपने फेफड़ों की वास्तविक स्थिति का पता नहीं चल पा रहा है।
क्या कहते हैं जिम्मेदार?
“फरवरी माह से दवाओं की आपूर्ति नहीं हो रही है। हमने कई बार मांग भेजी है और प्रमुख चिकित्सा अधिकारी को भी अवगत कराया है।” — डॉ. दौलतराम, मनोचिकित्सक एवं नोडल इंचार्ज, उजाला क्लिनिक
“फरवरी में नए वित्तीय सत्र के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है, लेकिन आपूर्ति अभी बाकी है। दवा मिलते ही सभी केंद्रों पर भेज दी जाएगी।” — डॉ. प्रदीप शर्मा, सीएमएचओ (हेल्थ)
