मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने तमिलनाडु में चल रहे एक बड़े फर्जी ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) घोटाले की जांच CBI को सौंपने का आदेश दिया है । यह मामला पेट्रोलियम रिटेल आउटलेट्स और LPG स्टेशनों को स्थापित करने के लिए चेन्नई पुलिस कमिश्नर के नाम पर फर्जी सील और दस्तखत के जरिए जाली NOC जारी करने से जुड़ा है ।
क्या है पूरा मामला?
जांच में सामने आया कि आरोपियों ने कंप्यूटर, स्कैनर और प्रिंटर जैसे डिजिटल उपकरणों का उपयोग करके मूल NOC की स्कैन की गई छवियों से जाली दस्तावेज तैयार किए । मुख्य आरोपी सी. जयप्रकाश (A1) ने MS Paint सॉफ्टवेयर के जरिए सील को क्रॉप किया और प्रकाश (Bright Light) के माध्यम से हस्ताक्षरों की ट्रेसिंग करके हूबहू जाली दस्तावेज बनाए । इस रैकेट ने विभिन्न पेट्रोलियम एजेंसियों से मोटी रकम वसूल कर उन्हें लगभग 75 से 97 जाली NOC थमा दिए ।
CBI को जांच सौंपने की वजह
अदालत ने पाया कि हालांकि स्थानीय पुलिस (CCB-1) और बाद में CBCID मेट्रो ने इस मामले में FIR दर्ज की थी, लेकिन उनकी जांच केवल जाली दस्तावेज बनाने वालों तक सीमित रही । हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि उन ‘लाभार्थियों’ (Beneficiaries) के खिलाफ कोई निष्पक्ष जांच नहीं की गई, जिन्होंने लाखों रुपए देकर ये जाली प्रमाण पत्र खरीदे और पेट्रोल पंप संचालित कर रहे हैं ।
अदालत ने माना कि बार-बार निर्देश देने के बावजूद स्थानीय एजेंसियां मुख्य षड्यंत्रकारियों और लाभार्थियों की भूमिका की जांच करने में विफल रहीं । इसी आधार पर जांच को पारदर्शी बनाने और जनता का विश्वास बहाल करने के लिए इसे CBI को हस्तांतरित कर दिया गया है ।
मुख्य आरोपी और वर्तमान स्थिति
इस मामले में अब तक सी. जयप्रकाश (A1), रमेश बाबू (A2) और सुरेश (A3) जैसे मुख्य आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए जा चुके हैं । कोर्ट के आदेशानुसार, अब CBCID को जांच से जुड़े सभी दस्तावेज तुरंत CBI को सौंपने होंगे ।
