जयपुर। राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की कार्रवाई जारी है, लेकिन ‘Expose Now’ के हाथ लगे दस्तावेज और जानकारियां एक चौंकाने वाला सवाल खड़ा कर रही हैं। क्या जांच एजेंसियां सिर्फ मोहरों तक सीमित रह गई हैं? जेजेएम के इस महाघोटाले में तत्कालीन मंत्री और एसीएस के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले तीन ऐसे नाम हैं, जो इस पूरे खेल के असली सूत्रधार थे, लेकिन अपनी रसूखदारी और ‘सियासी ढाल’ के चलते आज भी जांच के रडार से बाहर हैं।
- गोपाल सिंह: रसूख की ढाल और ‘इरकॉन’ फाइल को दबाने का खेल
तत्कालीन उप शासन सचिव (PHED) गोपाल सिंह की भूमिका इस पूरे प्रकरण में सबसे संदिग्ध रही है।
फर्जीवाड़ा दबाने का आरोप: जब इरकॉन (IRCON) के नाम पर फर्जी सर्टिफिकेट का मामला सामने आया, तो गोपाल सिंह ने तत्कालीन एसीएस सुबोध अग्रवाल के साथ मिलकर करीब दो महीने तक इस फाइल को दबाए रखा।
जांच को भटकाया: कार्रवाई करने के बजाय गोपाल सिंह ने इरकॉन के अधिकारियों पर ही सवाल दाग दिए और उन्हीं से सबूत मांगकर मामले को उलझा दिया।
भुगतान का रास्ता साफ किया: आरोप है कि इसी देरी का फायदा उठाकर फर्जीवाड़े में लिप्त ‘मैसर्स श्याम ट्यूबवैल’ और ‘मैसर्स गणपति ट्यूबवैल’ को करोड़ों का भुगतान करवा दिया गया।
सियासी रसूख: चर्चा है कि बानसूर से भाजपा विधायक देवीसिंह के छोटे भाई होने के कारण गोपाल सिंह पर अब तक आंच नहीं आई है।
- के.सी.कुमावत: नियमों के रक्षक ही बने ‘भक्षक’
तत्कालीन वित्तीय सलाहकार एवं मुख्य लेखाधिकारी (FA & CAO), के.सी.कुमावत वित्त विभाग के प्रतिनिधि के रूप में तैनात थे। उनकी जिम्मेदारी आरटीपीपी (RTPP) एक्ट और वित्तीय अनुशासन बनाए रखना था।
नियमों की बलि: कुमावत की नाक के नीचे पूलिंग और ‘साइट विजिट’ जैसी फर्जी शर्तें टेंडरों में जोड़ी गईं, ताकि चुनिंदा फर्मों को फायदा पहुंचाया जा सके।
कमीशन का खेल: यदि कुमावत अपनी कलम का ईमानदारी से उपयोग करते, तो यह घोटाला संभव ही नहीं था। आरोप है कि मोटे कमीशन के बदले उन्होंने हर वित्तीय अनियमितता पर अपनी आंखें मूंद लीं और फर्जीवाड़े को ‘वैधानिक’ जामा पहनाया।
- संजय अग्रवाल: भ्रष्टाचार की बिसात का असली ‘चाणक्य’
तत्कालीन पीएचईडी मंत्री के ओएसडी और एक्सईएन (XEN) संजय अग्रवाल को विभाग में ‘पावर सेंटर’ माना जाता था।
पूलिंग का मास्टरमाइंड: 20 हजार करोड़ के टेंडरों को पूलिंग के जरिए मैनेज करना हो या 5 से 10 प्रतिशत कमीशन की सौदेबाजी, सारा ब्लूप्रिंट संजय अग्रवाल के दिमाग की उपज था।
इंजीनियर्स का ‘बॉस’: रसूख ऐसा था कि चीफ इंजीनियर (CE) स्तर के अधिकारी भी उन्हें ‘सर’ कहकर संबोधित करते थे। मंत्री के करीबी संजय बड़ाया और दिनेश गोयल के साथ मिलकर उन्होंने विभाग में वसूली का ऐसा तंत्र खड़ा किया जिसने ठेका कंपनियों को 25 से 35 प्रतिशत ऊंची दरों पर काम दिलवाए।
अवैध वसूली: 2022 और 2023 के दौरान जांच के नाम पर ठेकेदारों को डराकर करोड़ों की वसूली करने का मास्टर प्लान भी इन्हीं के द्वारा तैयार किया गया था।
गंभीर सवाल: कब टूटेगा गठजोड़?
पीएचईडी के गलियारों में चर्चा है कि जब तक गोपाल सिंह, के.सी.कुमावत और संजय अग्रवाल जैसे ‘मगरमच्छों’ पर शिकंजा नहीं कसा जाता, तब तक जेजेएम घोटाले की जांच अधूरी ही रहेगी। ये वो लोग हैं जिनके पास इस महाघोटाले के हर लेन-देन और फाइल की बारीकी का हिसाब है।
‘Expose Now’ पूछता है:
क्या जांच एजेंसियां इन रसूखदारों के ‘पॉलिटिकल कनेक्शन’ से दबाव में हैं?
नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले वित्तीय सलाहकार कुमावत से पूछताछ क्यों नहीं हुई?
विभाग के ‘मास्टरमाइंड’ संजय अग्रवाल की संपत्तियों और उनकी भूमिका की फाइलें ठंडे बस्ते में क्यों हैं?
