आरटीई में नया पेंच: पार्षद हैं नहीं… बिन हस्ताक्षर फॉर्म अटके, दाखिले के लिए बच्चों से पहले अभिभावकों की हो रही ‘परीक्षा’

जयपुर: शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के तहत गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा दिलाने की पहल इस बार नगर निगम पार्षदों की खाली कुर्सियों की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। बच्चों के दाखिले से पहले ही अभिभावकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। नगर निगम चुनाव लंबित होने के कारण पार्षदों के पद खाली हैं, जिसके कारण आरटीई आवेदनों में निवास और आय प्रमाण पत्रों का सत्यापन (Verification) अटक गया है।

सफाई निरीक्षकों को मिला जिम्मा, लेकिन वो भी ‘गायब’

20 फरवरी से शुरू हुई प्रवेश प्रक्रिया के बीच अभिभावक हस्ताक्षर के लिए वार्ड कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं। प्रशासन ने पार्षदों की जगह ‘सफाई निरीक्षकों’ (Sanitation Inspectors) को सत्यापन के लिए अधिकृत तो कर दिया है, लेकिन उपलब्धता और स्पष्ट निर्देशों के अभाव में यह व्यवस्था भी फेल साबित हो रही है।

  • राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officers) भी इन फॉर्मों पर हस्ताक्षर करने से बच रहे हैं क्योंकि वे फरियादी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते।
  • पूर्व पार्षदों से संपर्क करने पर वे भी अधिकार न होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं।

करीब 1 लाख बच्चों के भविष्य पर लटकी तलवार

आरटीई के तहत निजी स्कूलों की प्री-प्राइमरी या कक्षा पहली में 25% सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित होती हैं।

  • जयपुर में हर वर्ष आरटीई के तहत एक लाख से अधिक आवेदन आते हैं।
  • शिक्षा विभाग के अनुसार शहर में 5 हजार से अधिक निजी स्कूल आरटीई के दायरे में हैं, जिनमें करीब 40 हजार बच्चों को दाखिला मिलता है।
  • समय-सीमा का दबाव: आवेदन करने की समय-सीमा सीमित है। यदि जल्द ही दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ, तो आवेदन अधूरे रह जाने का खतरा है, जिससे बच्चों का भविष्य प्रभावित हो सकता है।

अभिभावकों का दर्द: “दिहाड़ी छोड़कर चक्कर काट रहे हैं”

सिस्टम की इस खामी का सबसे बड़ा खामियाजा गरीब अभिभावकों को भुगतना पड़ रहा है:

  • रवि अरोड़ा (शिप्रा पथ): “तीन दिन से पार्षद कार्यालय के चक्कर लगा रहे हैं, सफाई इंस्पेक्टर मिलते नहीं हैं। सत्यापन नहीं होगा तो फॉर्म कैसे भर पाएंगे?”
  • भगवान सहाय (VKI): “निगम में कोई स्पष्ट सूचना नहीं है। हर काउंटर पर अलग जवाब मिलता है। गरीब आदमी बच्चे के दाखिले के लिए रोज दिहाड़ी छोड़कर भटक रहा है।”
  • अजय जांगिड़ (मानसरोवर): “अधिकारी से हस्ताक्षर कराने गया तो मिले नहीं। दो दिन बाद मिले तो उन्होंने साफ मना कर दिया कि यह उनका काम नहीं है।”
  • संगीता देवी (सीकर रोड): “सरकार अधिकार दे रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर व्यवस्था नहीं है। एक हेल्पडेस्क या कैंप लग जाए तो राहत मिले।”

निगम का आश्वासन

इस पूरे मामले पर नगर निगम आयुक्त गौरव सैनी का कहना है कि, “सफाई निरीक्षकों को हस्ताक्षर के लिए अधिकृत किया है। यदि हस्ताक्षर करने में लोगों को दिक्कत आ रही है तो व्यवस्था बेहतर करेंगे।” अब देखना यह है कि निगम प्रशासन कब तक इस समस्या का समाधान निकालता है।

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