राजस्थान में आम जनता के सफर का सबसे भरोसेमंद साथी कही जाने वाली ‘राजस्थान रोडवेज’ (RSRTC) वर्तमान में अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। निगम के बढ़ते घाटे और निजी बसों पर बढ़ती निर्भरता ने राजस्थान रोडवेज के भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। एक समय में जहां निजी बसों की हिस्सेदारी मात्र 5% थी, वह अब बढ़कर करीब 40% तक पहुंच चुकी है।
निजीकरण की ओर बढ़ते कदम
वर्तमान में राजस्थान रोडवेज के पास कुल 3400 बसों का बेड़ा है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनमें से 1300 बसें निजी अनुबंध (Contract) पर संचालित हो रही हैं। निगम ने अपनी नई बसें खरीदने के बजाय निजी ऑपरेटरों पर निर्भरता बढ़ा ली है, जिससे कर्मचारियों में भविष्य को लेकर असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है।
कमाई से ज्यादा खर्च: ₹90 करोड़ का मासिक घाटा
आंकड़ों पर गौर करें तो रोडवेज का गणित पूरी तरह बिगड़ा हुआ है:
- मासिक राजस्व (Income): लगभग ₹150 करोड़
- मासिक खर्च (Expense): लगभग ₹240 करोड़
- मासिक घाटा (Loss): लगभग ₹90 करोड़
इस भारी नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार को सालाना ₹1000 करोड़ से अधिक का अनुदान देना पड़ रहा है, जिससे सरकारी खजाने पर अतिरिक्त भार पड़ रहा है।
कर्मचारियों का अजीब प्रबंधन
निगम के पास संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि प्रबंधन पर सवाल उठ रहे हैं। रोडवेज के पास 4500 परिचालक (Conductors) हैं, लेकिन इनमें से केवल 1900 ही बसों में तैनात हैं। बाकी के 2600 परिचालकों से कार्यालयों में लिपिकीय और बुकिंग का काम लिया जा रहा है। वहीं, 4439 सरकारी चालकों की उपलब्धता के बावजूद करीब 800 चालकों को अनुबंध पर रखा गया है।
नई बसों की खरीद का सूखा
वर्ष 2012 से 2019 तक नियमित अंतराल पर बसों की खरीद हुई, लेकिन पिछले कई वर्षों से यह प्रक्रिया ठप पड़ी थी। वर्ष 2020 से 2024 के बीच कोई नई बस नहीं खरीदी गई। हालांकि, वर्ष 2025 में 500 नई बसें प्रस्तावित हैं, जिनकी खरीद प्रक्रिया वर्तमान में जारी है।
प्रबंधन का पक्ष
रोडवेज प्रबंधन का कहना है कि यात्रियों को बेहतर सुविधा देने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उनका दावा है कि सरकार ने नई बसों की खरीद के साथ-साथ चालक और परिचालकों की भर्ती की दिशा में भी कदम उठाए हैं, ताकि निगम की स्थिति में सुधार लाया जा सके।
