जयपुर: राजस्थान के बहुचर्चित जल जीवन मिशन (JJM) घोटाले में एक ऐसा मोड़ आया है जिसने पूरी जांच एजेंसी और सरकार को हैरान कर दिया है। जिस ‘विजय शंकर’ नाम के रहस्यमयी अधिकारी की तलाश में ACB (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) महीनों से खाक छान रही थी, उसका सच किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है।
जांच में खुलासा हुआ है कि ‘विजय शंकर’ कोई हाड़-मांस का इंसान नहीं, बल्कि एक ‘काल्पनिक किरदार’ था।राजस्थान में जल जीवन मिशन (JJM) के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई के 960 करोड़ रुपये डकारने वाले सिंडिकेट का सबसे बड़ा राज अब सबके के सामने है। एक तरफ पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल की फरारी और दूसरी तरफ 10 गिरफ्तारियों ने इस मामले को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इस पूरे घोटाले की धुरी बना एक नाम— ‘विजय शंकर’।

जानिए कैसे ठेकेदारों, इंजीनियरों और दलालों ने मिलकर एक ‘काल्पनिक किरदार’ रचा और कैसे ACB ने इस साजिश की एक-एक परत को उधेड़ दियाः-
फर्जी सर्टिफिकेट और ‘विजय शंकर’ की एंट्री
घोटाले की शुरुआत हुई उन टेंडरों से, जिन्हें हासिल करने के लिए श्रीगणपति ट्यूबवेल कंपनी और श्रीश्याम ट्यूबवेल कंपनी ने जाली दस्तावेजों का सहारा लिया। इन कंपनियों ने इरकॉन इंटरनेशनल (Ircon International) कंपनी के नाम पर एक अनुभव प्रमाण पत्र लगाया, जिसमें दावा किया गया कि इन्होंने केरल में वाटर प्रोजेक्ट्स को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इन सर्टिफिकेट्स पर एक ही व्यक्ति के हस्ताक्षर थे, और वो था ‘विजय शंकर’।
ACB के लिए चुनौती बनीं हुई थी विजय शंकर के नाम की पहेली
इरकॉन कम्पनी के सर्टिफिकेट पर ‘विजय शंकर’ के साइन थे। ACB इस व्यक्ति तक पहुंचना चाहती थी। वहीं ठेका लेने वाली कम्पनी के मालिक, दलाल और इंजीनियर नहीं चाहते थे कि ACB के सामने कभी ‘विजय शंकर’ का राज खुले। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, साजिशों की पूरी परत खुलती चली गई और ‘विजय शंकर’ का वो राज सामने आ गया जिसने सबको हैरान कर दिया।
कौन है यह रहस्यमयी ‘विजय शंकर’?
ठेके लेने वाली दो कम्पनियों ने इरकॉन इंटरनेशनल कम्पनी के केरल में चले वाटर प्रोजेक्ट को पूरा करने के फर्जी सर्टिफिकेट लगाए थे। इसी फर्जी सर्टिफिकेट के आधार पर इन कम्पनियों को यहां ठेके दिए गए। ACB ने 2023 में जब मामला दर्ज किया तो एक नाम ने पूरी जांच एजेंसी को सबसे ज्यादा परेशान किया— ‘विजय शंकर’।इरकॉन कम्पनी के सर्टिफिकेट पर ‘विजय शंकर’ के साइन थे। ACB इस व्यक्ति तक पहुंचना चाहती थी। वहीं ठेका लेने वाली कम्पनी के मालिक, दलाल और इंजीनियर नहीं चाहते थे कि ACB के सामने कभी ‘विजय शंकर’ का राज खुले। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, साजिशों की पूरी परत खुलती चली गई और ‘विजय शंकर’ का वो राज सामने आ गया जिसने सबको हैरान कर दिया।
शिकायतों के बावजूद मलाई बांटता सिस्टम

जल जीवन मिशन में घोटाले की शिकायतें 2023 की शुरुआत से ही पिछली सरकार, ACB और विभाग के सामने आने लगी थीं। इसके बावजूद मई 2023 में पीएचईडी की वित्तीय समिति ने टेंडर पास कर दिए और कंपनी को करोड़ों के काम करने की स्वीकृति दे दी। इस बीच शिकायतों के आधार पर ACB ने अपना जाल बिछाना शुरू किया। ठेके लेने वाले श्रीगणपति ट्यूबवेल कंपनी के मालिक महेश मित्तल, श्रीश्याम ट्यूबवेल कंपनी के मालिक पदमचन्द जैन, दलाल मुकेश पाठक सहित अन्य संदिग्ध इंजीनियरों की एक-एक एक्टिविटी पर नजर रखी गई और उनके फोन सर्विलांस पर लिए गए।
फोन सर्विलांस: “विजय शंकर के बारे में पता चला तो दिक्कत हो जाएगी” महेश, पदमचंद और दलाल मुकेश को पता था कि फर्जी सर्टिफिकेट वाली बात खुल सकती है। ACB की सर्विलांस में इनके और इंजीनियरों के बीच लेन-देन साफ जाहिर हो चुका था। इनकी बातचीत में पकड़े जाने का डर और बचाव के रास्तों पर चर्चा होती थी।बातचीत में बार-बार ‘विजय शंकर’ का नाम आता था।
महेश और मुकेश आपस में कहते थे—
“ACB को विजय शंकर के बारे में पता नहीं लगना चाहिए। यदि उसे पता चल गया, तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी।”
महेश ने दलाल मुकेश को निर्देश दिए थे कि वह इरकॉन कंपनी के ऑफिस जाकर अधिकारियों को ‘मैनेज’ करे और पैसे देने पड़ें तो दे दे, बस यह फर्जी सर्टिफिकेट की बात दब जाए। मुकेश ने भी आश्वासन दिया था कि वह मैटर दबाने के लिए इरकॉन ऑफिस के चक्कर काट रहा है।
इंजीनियर का ‘केरल वाला नाटक’
ACB ने 17 फरवरी को दलाल मुकेश पाठक सहित 10 अफसरों को गिरफ्तार किया। इनमें तत्कालीन अधिशाषी अभियंता (XEN) विशाल सक्सेना का भी नाम है। विशाल सक्सेना की जांच रिपोर्ट ने ही ‘विजय शंकर’ की पहचान को छुपाए रखा और ACB को गुमराह किया। दरअसल, जब विभाग पर दबाव बढ़ा तो दिखावे के लिए जांच विशाल सक्सेना को सौंपी गई। उन्हें केरल जाकर इरकॉन कंपनी के प्रोजेक्ट्स को वेरिफाई करना था। विभाग के संदिग्ध आला अधिकारियों ने जानबूझकर अपने ‘पसंद’ के अफसर सक्सेना को भेजा। 4 अप्रैल 2023 को सक्सेना केरल पहुंचे, 5 दिन वहां रहे और 9 अप्रैल को लौट आए। 13 अप्रैल को उन्होंने रिपोर्ट दी कि ‘विजय शंकर’ के दस्तखत वाले सर्टिफिकेट बिल्कुल सही (Verified) हैं। उन्होंने यह भी जांच नहीं की कि विजय शंकर किस पोस्ट पर है।
IAS सुबोध अग्रवाल और पूर्व मंत्री पर गंभीर आरोप
पूर्व IAS सुबोध अग्रवाल पर आरोप है कि उन्हें जानकारी थी कि विशाल सक्सेना की रिपोर्ट में गड़बड़ी है, फिर भी उन्होंने टेंडर प्रक्रिया नहीं रोकी और करोड़ों के वर्क ऑर्डर जारी होने दिए। वहीं, इस मामले में ED ने पूर्व मंत्री महेश जोशी को भी अप्रैल 2025 में गिरफ्तार किया जा चुका है।
ईमेल का ‘डिजिटल जाल’ और सच का धमाका
ACB ने जब सीधे इरकॉन इंटरनेशनल को पत्र लिखकर ‘विजय शंकर’ के बारे में पूछा, तो असली विस्फोट हुआ। इरकॉन ने स्पष्ट किया कि:
- उनके यहाँ ‘विजय शंकर’ नाम का कोई व्यक्ति नहीं है।
- कंपनी ने ऐसा कोई सर्टिफिकेट जारी नहीं किया।• जलदाय विभाग को कोई वेरिफिकेशन ईमेल इरकॉन की तरफ से नहीं भेजा गया।
असली सच यह था: दलाल मुकेश पाठक ने ‘विजय शंकर’ के नाम से एक फर्जी ईमेल आईडी बनाई थी। जब भी विभाग से वेरिफिकेशन के लिए मेल जाता, मुकेश खुद इरकॉन का अधिकारी बनकर उसका जवाब दे देता था। उसने यह पूरा फर्जीवाड़ा महज 15 लाख रुपये में सेट किया था।
कैसे खुला 960 करोड़ का राज?

इस महाघोटाले की नींव 6 अगस्त 2023 को हुई एक ट्रैप कार्रवाई से हिली। जयपुर के होटल पोलो विक्ट्री के पास से मायालाल सैनी (बहरोड़) और जेईएन प्रदीप (नीमराना) को 2.20 लाख रुपये की रिश्वत लेते रंगा हाथ पकड़ा गया। ये पैसे श्रीश्याम ट्यूबवेल कंपनी के बकाया बिल पास करने के बदले लिए जा रहे थे। इस एक गिरफ्तारी और मोबाइल सर्विलांस ने 960 करोड़ के इस सिंडिकेट का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया।
EXPOSE NOW का सवाल: क्या सिस्टम में बैठे अन्य ‘विजय शंकर’ भी अब बेनकाब होंगे?
