भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल बड़े शहरों, राजमहलों या प्रसिद्ध आंदोलनों तक ही सीमित नहीं था। देश के जंगलों, पहाड़ों और दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में भी स्वाभिमान और सामाजिक न्याय के लिए ऐसे संघर्ष हुए, जिन्होंने इतिहास की दिशा बदल दी। इसी गौरवशाली इतिहास में राजस्थान के बांसवाड़ा स्थित मानगढ़ धाम का नाम विशेष महत्व रखता है, जहां 17 नवंबर 1913 को ब्रिटिश शासन की गोलियों ने 1,500 से अधिक आदिवासियों के प्राण ले लिए थे।
मानगढ़ धाम: केवल एक नरसंहार नहीं, अस्मिता का प्रतीक
मानगढ़ धाम राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में मानगढ़ पहाड़ी पर स्थित है, जो राजस्थान और गुजरात की सीमा पर है। इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक प्रभाव राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के जनजातीय अंचलों तक फैला हुआ है।
इस क्षेत्र में लंबे समय से आदिवासी बेगार, शोषण और अन्यायपूर्ण वसूली का सामना कर रहे थे। ऐसे समय में गोविंद गुरु ने जनजातीय समाज को संगठित किया। उनके नेतृत्व में विकसित ‘संप सभा’ ने आदिवासी समाज में आत्मसम्मान, सुधार और अधिकारों के प्रति जागरूकता की चेतना जगाई। उनकी धूणी आज भी उनके विचारों की स्मृति के रूप में प्रज्वलित है।
17 नवंबर 1913: मानगढ़ का ऐतिहासिक बलिदान
17 नवंबर 1913 को मानगढ़ पहाड़ी पर गोविंद गुरु से प्रेरित होकर करीब डेढ़ लाख भील आदिवासी एकत्रित हुए थे। ब्रिटिश सेना ने इस भीड़ पर अंधाधुंध गोलीबारी की। गजेटियर अभिलेखों के अनुसार, इस घटना में लगभग 1,509 आदिवासी (जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल थे) बलिदान हुए।
जलियांवाला बाग से भी बड़ा और साहसिक था मानगढ़ का संघर्ष
हम जलियांवाला बाग हत्याकांड को तो जानते हैं, लेकिन उससे 6 साल पहले हुए इस बड़े नरसंहार को वह पहचान नहीं मिली। जलियांवाला बाग में गोलीबारी अचानक और धोखे से हुई थी, जबकि मानगढ़ में ब्रिटिश हुकूमत ने पहले ही चेतावनी दे रखी थी। तोपों और हथियारों से लैस अंग्रेजी सेना के सामने हर आदिवासी जानता था कि वह मारा जा सकता है, फिर भी लाखों भील परिवार वहां डटे रहे और सीने पर गोलियां खाईं। इसलिए इसे प्रायः ‘आदिवासी जलियांवाला’ कहा जाता है।
राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की आवश्यकता क्यों?
मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग किसी एक जाति की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कृतज्ञता और ऐतिहासिक न्याय की मांग है। अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने अक्टूबर 2026 में इसके लिए एक प्रस्ताव भी पारित किया है, जिसमें पाठ्यक्रम में मानगढ़ के इतिहास को शामिल करने का भी आग्रह किया गया है।
इसे राष्ट्रीय स्मारक बनाना निम्न कारणों से आवश्यक है:
- आदिवासी बलिदान को राष्ट्रीय इतिहास में उचित स्थान दिलाने के लिए।
- गोविंद गुरु के सामाजिक सुधार के विचारों को आगे बढ़ाने के लिए।
- इतिहास के उपेक्षित प्रसंगों का सही दस्तावेजीकरण करने के लिए।
- राष्ट्रीय एकता, साझा विरासत और जनजातीय समाज के आत्मसम्मान को मजबूत करने के लिए।
जनजाति समुदाय केवल लाभ या आरक्षण पाने वाला समाज नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का सच्चा सहभागी है। यदि मानगढ़ धाम राष्ट्रीय स्मारक बनता है, तो यह भावी पीढ़ियों के लिए एक जीवंत पाठशाला बनेगा। विद्यार्थी इससे सीखेंगे कि स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए हमारे पूर्वजों ने कितनी बड़ी कीमत चुकाई है।
(डॉ. दीपमाला रावत, विषय विशेषज्ञ, जनजातीय प्रकोष्ठ, लोक भवन भोपाल द्वारा लिखित विशेष लेख पर आधारित)