RGHS में बड़ा बदलाव: अब ‘बीमा मॉडल’ पर चलेगी योजना; 14 लाख सरकारी कर्मचारियों-पेंशनर्स पर सीधा असर

राजस्थान के करीब 14 लाख सरकारी कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के मोर्चे पर एक बड़ी खबर है। राज्य सरकार अपनी महत्वाकांक्षी योजना राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (RGHS) के मौजूदा स्वरूप को पूरी तरह बदलने की तैयारी कर रही है। अब इस योजना को ‘ट्रस्ट मॉडल’ से हटाकर ‘बीमा (इंश्योरेंस) मॉडल’ पर ले जाने का प्रस्ताव तैयार किया गया है। यदि यह फैसला लागू होता है, तो प्रदेश में सरकारी कर्मियों के इलाज का पूरा ढांचा ही बदल जाएगा।

क्यों पड़ी इस बड़े बदलाव की ज़रूरत?

वर्तमान व्यवस्था के तहत सरकार सीधे अस्पतालों और दवा स्टोरों को भुगतान करती है। हालांकि, पिछले लंबे समय से भुगतान में होने वाली देरी सरकार और निजी अस्पतालों के बीच टकराव का मुख्य कारण बनी हुई है। निजी अस्पतालों का आरोप है कि उनका करोड़ों रुपया महीनों से बकाया है, जिससे वे आर्थिक संकट में हैं। इसी समस्या के स्थाई समाधान के रूप में सरकार ‘बीमा मॉडल’ को देख रही है। इसमें सरकार एक तय प्रीमियम बीमा कंपनी को देगी और कंपनी ही अस्पतालों के क्लेम का निपटारा करेगी। सरकार का मानना है कि इससे भुगतान प्रक्रिया में तेजी आएगी और अस्पतालों का योजना पर भरोसा बढ़ेगा।

सरकार का पक्ष: पारदर्शिता और फर्जीवाड़े पर नकेल

चिकित्सा विभाग का तर्क है कि इंश्योरेंस मॉडल पर आने से न केवल भुगतान समय पर होगा, बल्कि सिस्टम में होने वाली गड़बड़ियों पर भी लगाम लगेगी।

  • फर्जी बिलिंग पर रोक: सरकार का मानना है कि बीमा कंपनियों का अपना ऑडिट सिस्टम होता है, जिससे फर्जी बिलिंग और गड़बड़ी पकड़ी जा सकेगी।
  • खर्च का अनुमान: बीमा मॉडल से सरकार को अपने स्वास्थ्य बजट के खर्च का बेहतर और सटीक अनुमान मिल सकेगा।
  • बेहतर कवरेज: गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए कर्मचारियों को बेहतर कवरेज और जल्द क्लेम पास होने की सुविधा मिल सकेगी।

कर्मचारियों के मन में संशय: क्या बढ़ेगी ‘कागजी सिरदर्दी’?

एक तरफ जहाँ सरकार इसे सुधार बता रही है, वहीं कर्मचारी संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। कर्मचारियों की मुख्य आशंकाएं इस प्रकार हैं:

  1. क्लेम रिजेक्शन का डर: कर्मचारियों को डर है कि निजी बीमा कंपनियां मुनाफे के चक्कर में कई क्लेम रिजेक्ट कर सकती हैं।
  2. जटिल प्रक्रिया: अभी कैशलेस इलाज की प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से सरल है, लेकिन बीमा मॉडल में कागजी कार्यवाही और शर्तों का बोझ बढ़ सकता है।
  3. इलाज पर लिमिट: आशंका जताई जा रही है कि बीमा कंपनियां इलाज पर सख्त लिमिट तय कर सकती हैं, जिससे मरीजों को हर बार अप्रूवल के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ सकता है।

दो चरणों में लागू होगी योजना

इस बदलाव को अचानक लागू करने के बजाय सरकार इसे दो चरणों में क्रियान्वित करेगी। पहले चरण में पेंशनर्स को इस बीमा मॉडल के दायरे में लाया जाएगा। पेंशनर्स की प्रतिक्रिया और सिस्टम की सफलता को परखने के बाद ही इसे सेवारत कर्मचारियों पर लागू किया जाएगा। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वे हर महीने अपनी सैलरी से इस योजना में अंशदान देते हैं, ऐसे में इसे निजी कंपनियों के हाथों में सौंपना तर्कसंगत नहीं है।

चिकित्सा मंत्री का बड़ा बयान

इस पूरे मामले पर चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने योजना की सफलता का दावा किया है। उन्होंने कहा:

“हमने आरजीएचएस का घाटा 700 करोड़ रुपए कम कर दिया है। अब योजना को इंश्योरेंस मोड पर लाएंगे ताकि फर्जीवाड़ा पूरी तरह बंद हो सके। हमारा लक्ष्य है कि अगले 6-8 महीने में सारा घाटा खत्म कर दिया जाए और सिस्टम को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए।”

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