जलदाय विभाग (PHED) में पिछले कुछ वर्षों में हुए ‘सदी के सबसे बड़े’ भ्रष्टाचार के खेल में रोज नए खुलासे हो रहे हैं। हजारों करोड़ के भ्रष्टाचार के काले कारनामों ने प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही को हिला कर रख दिया है। लेकिन एक नाम ऐसा है जो विभाग के हर गलियारे में गूंज रहा है, पर कानून की फाइलों में अब भी ‘लापता’ है। वह नाम है— अधीक्षण अभियंता (SE) संजय अग्रवाल।
वही संजय अग्रवाल, जिसे कांग्रेस सरकार में तत्कालीन पीएचईडी मंत्री महेश जोशी का ‘दाहिना हाथ’ और उनके खास मित्र संजय बड़ाया की ‘वसूली गैंग’ का ‘असली खिलाड़ी’ और रणनीतिकार माना जाता था। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड संजय अग्रवाल अब भी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की गिरफ्त से बाहर क्यों है?
भ्रष्टाचार का ‘ब्लूप्रिंट’ और संजय अग्रवाल का रोल
सूत्रों और विभाग में चल रही चर्चाओं के अनुसार, 2022 और 2023 में पीएचईडी में जो कुछ भी हुआ, उसकी पटकथा संजय अग्रवाल ने ही लिखी थी। चाहे वह जल जीवन मिशन (JJM) के 20,000 करोड़ रुपये के टेंडरों की पूलिंग हो या फिर तबादलों की ‘रेट लिस्ट’ जारी करना, अग्रवाल का नाम हर फाइल के पीछे दबे स्वर में लिया जाता रहा है। आरोप है कि संजय अग्रवाल ही पूर्व मंत्री महेश जोशी और उनके खास मित्र संजय बड़ाया के साथ मिलकर पीएचईडी में एक ‘वसूली सिंडिकेट’ चलाते थे।
सिंडिकेट के मुख्य कारनामे:
- इंजीनियर्स को ब्लैकमेलिंग: जेईएन (JEN) से लेकर मुख्य अभियंता (CE) स्तर के अधिकारियों से जांच और तबादलों के नाम पर मोटी रकम वसूलना।
- इरकॉन (IRCON) फर्जी सर्टिफिकेट कांड: करोड़ों के टेंडर हासिल करने के लिए इरकॉन के फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों को मैनेज करने और उन्हें सिस्टम में सेट करने की मास्टर प्लानिंग।
- कमीशन की फिक्सिंग: हर छोटे-बड़े टेंडर में कमीशन का प्रतिशत तय करना और उसे ठेकेदारों से वसूलना।
पार्टनर जेल में, मास्टरमाइंड बाहर?
जलदाय विभाग के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि जब संजय अग्रवाल के ‘पार्टनर’ और उन्हें कथित तौर पर संरक्षण देने वाले मुख्य अभियंता दिनेश गोयल को एसीबी गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है, तो फिर अग्रवाल पर अब तक शिकंजा क्यों नहीं कसा गया?
सत्ता परिवर्तन के बाद भी ‘अभयदान’ पर सवाल
प्रदेश में भाजपा की सरकार आने के बाद भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात कही जा रही है। ऐसे में संजय अग्रवाल जैसे दागी अधिकारी का अब तक सलाखों के पीछे न होना सरकार की मंशा पर भी सवाल उठाता है। मामले को लेकर अब तीन बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं:
सवाल 1: क्या संजय अग्रवाल के पास विभाग के कुछ ऐसे ‘सफेदपोशों’ और रसूखदारों के राज दबे हैं, जिसके कारण उन पर हाथ डालने से एजेंसियां कतरा रही हैं?
सवाल 2: क्या पिछली सरकार के ‘भ्रष्टाचार के सिंडिकेट’ ने नई सरकार के सिस्टम में भी पैठ बना ली है? सवाल 3: ईडी, जो जल जीवन मिशन घोटाले में लगातार छापेमारी कर रही है, उसकी रडार से यह ‘मास्टरमाइंड’ कैसे बचा हुआ है?
