Expose Now स्पेशल: मेडिकल माफिया की खुली ‘लूट’, 370 की कैंसर दवा 9762 में बेच रहे अस्पताल, मरीजों की लाशों पर मुनाफे का खेल!

-सुप्रीम कोर्ट की फटकार बेअसर, कॉर्पोरेट अस्पतालों और दवा कंपनियों की मिलीभगत से सरेआम चल रही है डकैती

-डिस्ट्रीब्यूटर से लेकर अस्पताल तक फैला है लूट का जाल, 788 रुपये का इंजेक्शन 9000 में बेचकर काट रहे हैं मरीजों की जेब

-स्वास्थ्य महकमा मौन, कमीशनखोरी के लालच में डॉक्टर और कंपनियां तय कर रहे हैं मरीजों की मौत का सौदा

जयपुर। कैंसर—एक ऐसी बीमारी जिसका नाम सुनते ही रूह कांप जाती है। मरीज और उसका परिवार इस जानलेवा बीमारी से तो लड़ता ही है, लेकिन उससे भी बड़ी और खौफनाक लड़ाई उन्हें ‘मेडिकल माफिया’ से लड़नी पड़ती है। सफेद कोट में छिपे ये वो सफेदपोश डकैत हैं, जिनके लिए मरीज का दर्द सिर्फ मुनाफा कमाने का एक जरिया है। ‘Expose Now’ की इस विस्तृत और खोजी रिसर्च रिपोर्ट में आज हम उस खूनी नेक्सस (Nexus) का पर्दाफाश कर रहे हैं, जिसने स्वास्थ्य सेवा जैसे पवित्र पेशे को कसाईखाने में तब्दील कर दिया है। यह कहानी नहीं, बल्कि उन आंकड़ों और तथ्यों का काला सच है जो साबित करते हैं कि दवा कंपनियां, डिस्ट्रीब्यूटर और कॉर्पोरेट अस्पताल मिलकर कैंसर के मरीजों का खून किस बेदर्दी से चूस रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं पर 10 गुना तक मुनाफा कमाने को ‘डकैती और नरसंहार’ के समान बताया है। लेकिन इसके बावजूद, मुनाफाखोरी का यह नंगा नाच बेरोकटोक जारी है। हमारी पड़ताल में यह खौफनाक सच सामने आया है कि कैंसर की दवाओं पर डिस्ट्रीब्यूटर से लेकर मरीज तक पहुंचने के सफर में 1100% से लेकर 2538% तक का अकल्पनीय मार्जिन वसूला जा रहा है।

मुनाफे का खौफनाक गणित, 370 की दवा, 9762 में बिक्री:-

जब एक आम इंसान कैंसर का शिकार होता है, तो उसकी जिंदगी बचाने के लिए परिवार अपनी जीवनभर की पूंजी लगा देता है, खेत और पुश्तैनी जमीनें तक बिक जाती हैं। लेकिन यह पैसा इलाज पर नहीं, बल्कि मेडिकल माफिया की तिजोरियां भरने में जाता है। एक्सपोज नाउ की रिसर्च में सामने आए ये आंकड़े चिकित्सा महकमे की नींद उड़ाने के लिए काफी हैं:

-डोसीटेक्सेल इंजेक्शन (80 एमजी): ब्रेस्ट और लंग्स कैंसर की कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाले इस इंजेक्शन की कंपनी रेट मात्र 277.5 रुपये है। डिस्ट्रीब्यूटर को यह 370 रुपये में मिलता है। लेकिन इसके डिब्बे पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 11570 रुपये छापा जाता है। अंततः मरीज को यह दवा 9762 रुपये में बेची जाती है, यानी सीधा 2538% का राक्षसी मार्जिन।

-पैक्लीटैक्सेल 260 एमजी इंजेक्शन: कीमोथेरेपी के इस इंजेक्शन की कंपनी रेट 590 रुपये है और डिस्ट्रीब्यूटर रेट 788 रुपये है। इसकी MRP 10500 रुपये तय की जाती है और कॉर्पोरेट अस्पताल इसे मरीजों को 9000 रुपये में बेचते हैं। यह 1142% का मुनाफा है।

-एबिराटेरोन एसीटेट 250 एमजी टैबलेट: प्रोस्टेट कैंसर के काम आने वाली इस दवा की कंपनी रेट 2750 रुपये है। डिस्ट्रीब्यूटर को यह 3666 रुपये में मिलती है, जबकि इसकी MRP 29500 रुपये अंकित की जाती है। मरीजों को यह 26550 रुपये में थमाई जाती है (624% मार्जिन)।

-जेमसीटाबीन इंजेक्शन (1000 एमजी): कीमोथेरेपी के इस इंजेक्शन की कंपनी कीमत 352.5 रुपये, डिस्ट्रीब्यूटर रेट 470 रुपये और MRP 6013 रुपये है। मरीज को यह 5412 रुपये में मिलता है, जो 1051% का मार्जिन दर्शाता है।

सिंडिकेट का ‘मार-जन’ (Margin): कैसे काम करता है यह नेक्सस:-

यह लूट कोई एकाएक होने वाली घटना नहीं है, बल्कि एक बेहद सुनियोजित ‘सिंडिकेट’ का हिस्सा है। इस लूट को अंजाम देने के लिए दवा कंपनियों, अस्पताल संचालकों और डॉक्टरों के बीच एक अघोषित समझौता होता है। ‘Expose Now’ आपको बताता है कि यह सिंडिकेट कैसे काम करता है:

-अस्पताल और कंपनियों की साठगांठ: दवा कंपनियां सीधे अस्पताल संचालकों से संपर्क करती हैं और मार्जिन तय करती हैं। बदले में अस्पताल इन कंपनियों को अपनी इन-हाउस फार्मेसी (दवा की दुकान) पर एकाधिकार दे देते हैं।

-कमीशन पर बिकता जमीर: दवा कंपनियां डॉक्टरों से भी सीधे तौर पर मिलती हैं और भारी-भरकम कमीशन तय करती हैं। इसके बाद, कई डॉक्टर पर्चे पर वही महंगी ब्रांडेड दवाएं लिखते हैं, जिससे उन्हें और अस्पताल को सबसे ज्यादा आर्थिक फायदा या कमीशन मिलता है।

-मरीजों को बंधक बनाने की रणनीति: कॉर्पोरेट अस्पताल अक्सर सिर्फ भर्ती (Admit) मरीजों को ही अपनी फार्मेसी से दवा देते हैं। अगर कोई मरीज का रिश्तेदार बाहर से सस्ती या जेनेरिक दवा लाने की कोशिश करता है, तो अस्पताल प्रशासन और डॉक्टर उसे चढ़ाने या इस्तेमाल करने से साफ मना कर देते हैं। मरीज मजबूरी में उसी अस्पताल की फार्मेसी से कई गुना महंगी दवा खरीदने को विवश हो जाता है।

स्वास्थ्य महकमा मौन, दवा नियंत्रक सिर्फ दर्शक:-

इस पूरे खेल में सबसे बड़ा सवाल चिकित्सा महकमे, ड्रग कंट्रोलर और सरकारी तंत्र पर उठता है। जब सुप्रीम कोर्ट इस पूरे सिस्टम को नरसंहार करार दे रहा है, तब स्वास्थ्य विभाग कुंभकर्णी नींद क्यों सो रहा है?

केंद्र सरकार का तर्क है कि उन्होंने कैंसर-रोधी दवाओं के व्यापारिक लाभ (ट्रेड मार्जिन) को MRP के 30% तक सीमित (कैप) कर दिया है और एक कमेटी दवाओं की लिस्टिंग कर रही है जिससे दाम 20% से 70% तक घटेंगे। इसके तहत 131 कैंसर दवाएं प्राइस कंट्रोल में थीं और अब 110 नई ब्रांडेड, जेनेरिक और इंपोर्टेड दवाएं भी इसमें शामिल की गई हैं। सरकार यह भी कहती है कि एनपीपीए (NPPA) ने नॉन-शेड्यूल कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30% कैप कर दिया है।

लेकिन जमीनी हकीकत इन सरकारी दावों की धज्जियां उड़ा रही है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने कड़े शब्दों में पूछा था कि 2700 रुपये की कैंसर की दवा पर 27,000 रुपये MRP क्यों है और सारी दवाओं पर एक जैसा 16% का यूनिफॉर्म मार्जिन क्यों नहीं रखा जाता?

सवाल, जो जवाब मांगते हैं:-

-MRP तय करने का अधिकार किसके पास है? अगर 277.5 रुपये की दवा पर 11570 रुपये की MRP छप रही है, तो इसे मंजूरी देने वाला प्राधिकरण (Authority) कौन है? क्या दवा कंपनियों को मनमाने दाम छापने की खुली छूट दे दी गई है?

-सरकारी चेकिंग कहां है? जब डिस्ट्रीब्यूटर 788 रुपये की दवा अस्पताल को देता है और अस्पताल उसे 9000 रुपये में बेचता है, तो क्या ड्रग इंस्पेक्टरों और स्वास्थ्य विभाग के ऑडिटरों को यह वित्तीय अनियमितता नजर नहीं आती? या फिर कमीशन का हिस्सा ऊपर तक पहुंच रहा है?

-जेनेरिक दवाओं पर पाबंदी क्यों? एमसीआई (MCI) और एनएमसी (NMC) के नियमों के अनुसार मरीज कहीं से भी दवा ले सकता है। फिर कॉर्पोरेट अस्पतालों को बाहर की दवाएं बैन करने का अधिकार किसने दिया? मरीजों को जेनेरिक ब्रांड्स का पता करने का अधिकार है, लेकिन डर के माहौल में कोई भी तीमारदार डॉक्टर के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं कर पाता।

मरीजों की बेबसी और व्यवस्था का पतन:-

कैंसर का इलाज कराने में घर-जमीन-जायदाद क्यों बिक जाते हैं? इस सवाल का जवाब एक्सपोज नाउ की इस रिपोर्ट में साफ है। यह कैंसर का इलाज नहीं है, बल्कि एक संगठित लूट का तंत्र है। एक गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार जब अपने प्रियजन को लेकर कॉर्पोरेट अस्पताल की चौखट पर पहुंचता है, तो उसे उम्मीद होती है कि उसे जीवनदान मिलेगा। लेकिन वहां बैठे मेडिकल माफिया उन्हें एक ‘ग्राहक’ (Client) और उनकी बीमारी को एक ‘अवसर’ (Opportunity) के रूप में देखते हैं। जब तक सरकार दवाओं की बेस प्राइस (Base Price) और अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच के अंतर को कानूनी रूप से 15-20% तक सीमित करने के लिए कोई ठोस कानून नहीं लाती, तब तक यह डकैती रुकने वाली नहीं है। यह समय है जब आम जनता को जागरूक होना होगा, डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए बाध्य करना होगा और अस्पतालों की दादागिरी के खिलाफ आवाज उठानी होगी।

चिकित्सा क्षेत्र को भारत में हमेशा से भगवान का दूसरा रूप माना गया है, लेकिन आज यही तंत्र मुनाफे की अंधी दौड़ में दानव बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बावजूद दवा कंपनियों और कॉर्पोरेट अस्पतालों की यह मनमानी साबित करती है कि मेडिकल माफिया का रसूख कानून और सरकारी नियंत्रण से कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है। जब तक मुनाफाखोरी के इस जहर को कड़े कानूनी चाबुक से नहीं रोका जाएगा, तब तक कैंसर से कम और इस महंगी चिकित्सा व्यवस्था से ज्यादा लोग दम तोड़ते रहेंगे। ‘Expose Now‘ इस मुद्दे को तब तक उठाता रहेगा, जब तक सरकार इस नरसंहार को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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