-सचिवालय से लेकर संकुल तक कमीशन का खेल; धरातल पर न दफ्तर, न ठिकाना… फिर भी बाहरी कंपनियों पर बरस रही सरकारी तिजोरी
-14 महीने का सूखा: बच्चों को हुनर सिखाने वाले खुद दाने-दाने को मोहताज, CMO-PMO तक गूंजी चीख तो खुली अफसरों की नींद
जयपुर। प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में ‘व्यावसायिक शिक्षा’ (Vocational Education) के नाम पर एक ऐसा मकड़जाल बुना जा चुका है, जिसकी परतें अगर पूरी तरह खुलें तो सचिवालय से लेकर शिक्षा संकुल तक हड़कंप मच जाए। युवाओं को हुनरमंद बनाने के नाम पर राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद् (RCSE) ने जिन 21 बड़ी कंपनियों को करोड़ों रुपये के ठेके बांट रखे हैं, उनकी हकीकत जानकर आप दंग रह जाएंगे। आरोप है कि इनमें से अधिकांश कंपनियों का राजस्थान के धरातल पर कोई वजूद यानी कोई स्थाई ऑफिस तक नहीं है। ये कंपनियां केवल फाइलों और शिक्षा संकुल की बंद कमरों की बैठकों में ज़िंदा हैं, लेकिन इनके बैंक खातों में सरकार हर महीने करोड़ों रुपये का ‘कमीशन’ पानी की तरह बहा रही है। वहीं दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में बच्चों का भविष्य संवारने वाले सैकड़ों व्यावसायिक शिक्षक (Vocational Trainers) पिछले 5 से लेकर 14 महीनों से मानदेय के लिए तरस रहे हैं।
बिना ऑफिस करोड़ों का टेंडर, आखिर मेहरबानी किस पर?
सूत्रों के मुताबिक, जिन 21 वोकेशनल ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स (VTPs) को ब्लैकलिस्ट करने या उन पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय हर साल करोड़ों के टेंडर थमा दिए जाते हैं, उनमें से कई कंपनियों का प्रदेश में कोई मुख्य प्रशासनिक ढांचा ही नहीं है। शिक्षक अपनी फरियाद लेकर कहां जाएं, उन्हें समझ नहीं आता। जब इन कंपनियों का राज्य में कोई वजूद और ऑफिस ही नहीं है, तो इन्हें करोड़ों का टेंडर और भारी-भरकम कमीशन किस आधार पर दिया जा रहा है? क्या विभागीय अफसरों की मिलीभगत से यह पूरा सिंडिकेट चल रहा है?
शिक्षा परिषद् का नोटिस साबित करता है ‘अंदर की सड़ांध’:_
हाल ही में राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद् के राज्य परियोजना निदेशक एवं आयुक्त अशोक कुमार मीणा के हस्ताक्षरों से जारी एक आधिकारिक पत्र (पत्रांक: रास्कूशिप/जय/व्या.शि./2026-27/) ने इस पूरे फर्जीवाड़े और शोषण की पोल खुद खोल दी है। विभाग ने Indian Institute of Skill Development (IISD), LNJ Institute, Mind Leaders, Human Welfare Organisation, iDaksha और ICA Edu Skills जैसी कंपनियों को कड़ी फटकार लगाते हुए अल्टीमेटम जारी किया है।
इस पत्र में साफ तौर पर स्वीकार किया गया है कि ये कंपनियां पिछले कई महीनों से व्यावसायिक शिक्षकों का मानदेय डकार कर बैठी हैं। वेतन न मिलने से जिला स्तर पर योजना संचालन में भारी बाधा आ रही है। पीड़ित शिक्षकों के पत्र, ईमेल और शिकायतों के बाद मामला मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंच चुका है, जिससे विभाग की छवि पूरी तरह धूमिल हो रही है।
7 दिन का अल्टीमेटम दिया, लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई:-
परिषद् ने इन डिफॉल्टर कंपनियों को अप्रैल 2026 तक का बकाया मानदेय 07 दिवस में भुगतान करने का कड़ा निर्देश दिया है, ऐसा न करने पर ‘एकपक्षीय अनुशासनात्मक कार्रवाई’ की चेतावनी दी गई है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह महज एक कागज़ी खानापूर्ति है? व्यावसायिक शिक्षकों का आरोप है कि ये कंपनियां हर बार इसी तरह की घुड़की के बाद थोड़ा-बहुत भुगतान करके मामला रफा-दफा कर देती हैं और विभाग फिर से इन पर मेहरबान हो जाता है।
Expose Now के तीखे सवाल, जिनका जवाब विभाग को देना ही होगा:
सवाल 1: ब्लैकलिस्ट करने से परहेज़ क्यों? जो कंपनियां 5 से लेकर 14-14 महीने तक शिक्षकों का वेतन रोककर बैठती हैं और अनुबंध की शर्तों का खुला उल्लंघन करती हैं, उनका टेंडर तत्काल प्रभाव से निरस्त कर उन्हें ब्लैकलिस्ट (Blacklist) क्यों नहीं किया गया? आखिर इन पर इतनी मेहरबानी क्यों?
सवाल 2: बिना ऑफिस के टेंडर कैसे पास हुआ? जिन कंपनियों का राजस्थान के धरातल पर कोई वजूद या स्थाई प्रशासनिक कार्यालय (Office) तक नहीं है, उनका भौतिक सत्यापन (Physical Verification) किस अधिकारी ने किया? बिना स्थानीय पते के इन्हें करोड़ों के टेंडर की क्लीन चिट कैसे मिल गई?
सवाल 3: करोड़ों का ‘कमीशन’ किस बात का? जब सारा काम, मैनेजमेंट और मॉनिटरिंग जिला स्तर पर सरकारी तंत्र (ADPC और स्कूल प्रशासन) को ही देखना पड़ता है, तो इन बाहरी कंपनियों को बीच में रखकर करोड़ों रुपए का भारी-भरकम ‘कमीशन’ क्यों दिया जा रहा है? यह सीधे तौर पर जनता के पैसे की बर्बादी नहीं है?
सवाल 4: सरकार से बजट उठा लिया, तो पैसा गया कहां? जब सरकार और शिक्षा परिषद् द्वारा इन कंपनियों को बजट समय पर जारी कर दिया जाता है, तो कंपनियों द्वारा शिक्षकों का पैसा दबाकर बैठना क्या सीधे तौर पर वित्तीय धोखाधड़ी (Fraud/420) का मामला नहीं है? विभाग इन कंपनियों के खिलाफ पुलिस में FIR दर्ज क्यों नहीं करवाता?
सवाल 5: सीएमओ-पीएमओ की शिकायतों को क्यों दबाया गया? शिक्षकों के शोषण का यह मामला मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) तक पहुंच चुका है। विभाग को कई महीनों से इसकी जानकारी थी, तो फिर आयुक्त स्तर से सख्त आदेश जारी करने में मई 2026 तक का इतना लंबा वक्त क्यों लगा? क्या नीचे के अधिकारी इस मामले को दबा रहे थे?
सवाल 6: संरक्षण देने वाले ‘मगरमच्छ’ कौन हैं? कमीशनखोरी और फर्जीवाड़े के इस पूरे सिंडिकेट में शिक्षा संकुल और सचिवालय में बैठे वो कौन से रसूखदार ‘मगरमच्छ’ हैं, जो इन कागज़ी कंपनियों को लगातार प्रशासनिक संरक्षण दे रहे हैं? क्या इन अधिकारियों के बैंक खातों और संपत्ति की जांच होगी?
युवाओं के भविष्य और हक पर डाका:-
एक तरफ सरकार बेरोज़गारी दूर करने के लिए व्यावसायिक शिक्षा का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ इस व्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले शिक्षकों का मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है। ‘एक्सपोज नाउ’ इस पूरे घोटाले पर पैनी नज़र बनाए हुए है। जब तक हर एक शिक्षक के खून-पसीने की कमाई का एक-एक पैसा नहीं मिल जाता और इन फर्जी कंपनियों के आका बेनकाब नहीं हो जाते, यह मुहिम जारी रहेगी।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now