-सरकारी खजाने पर भारी पड़ेगा मोलभाव का ढोंग, आकलन दर से 12.54% तक महंगी दरों पर आया सिंगल टेंडर
-अफसरों की लापरवाही या मिलीभगत? बिना फाइनेंस कमेटी की मंजूरी के ही खोल दी गई थी टेक्निकल और प्राइस बिड
-जनता की मजबूरी का हवाला देकर बचाया, 15 करोड़ की सीमा तक पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट पर ही आर्डर जारी करने की अनुमति
जयपुर। पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (PHED) में सिंगल टेंडर के नाम पर चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने और नियमों को ताक पर रखने का एक बड़ा खेल सामने आया है। फाइनेंस कमेटी (FC) की बैठक में पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड (PAC) की खरीद से जुड़े एक संवेदनशील मामले में बैक-डेटेड यानी ऑन-फाइल ‘एक्स-पोस्ट फैक्टो’ (कार्योत्तर) मंजूरी देकर विभाग की गंभीर लापरवाहियों पर पर्दा डाल दिया गया है। मामला एनआईबी संख्या PAC/25-26/14 (दिनांक 16.02.2026) के तहत केमिकल खरीद का है, जिसमें एकमात्र बोलीदाता (सिंगल बिडर) मैसर्स ग्रेसिम इंडस्ट्रीज लिमिटेड, नागदा को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं।

लापरवाही या फिक्सिंग? बिना मंजूरी के ही खोल दिया टेंडर:-
इस पूरे मामले में विभाग के अधिकारियों का एकतरफा रवैया और ‘मेहरबानी’ साफ नजर आती है। मुख्य अभियंता (प्रशासन) ने खुद कमेटी के सामने स्वीकार किया कि निविदा प्रक्रिया में बहुत बड़ी प्रशासनिक चूक हुई है। नियमानुसार जब भी कोई सिंगल बिडर आता है, तो उसकी टेक्निकल बिड को पहले फाइनेंस कमेटी के सामने मंजूरी के लिए रखना होता है। लेकिन अधिकारियों ने कमेटी को अंधेरे में रखकर बिड इवैल्यूएशन कमेटी (BEC) के जरिए सीधे उसे ‘सही’ घोषित कर दिया और आनन-फानन में 18 मार्च 2026 को उसकी प्राइस बिड भी ओपन कर दी। इस प्रक्रियात्मक चूक (Procedural Lapse) पर कमेटी ने केवल कागजी चिंता जताई, लेकिन काम की तात्कालिकता का बहाना बनाकर इस बड़ी गलती को आसानी से माफ कर दिया गया।
बाजार से 12% से भी ज्यादा महंगे रेट, फिर भी कंपनी पर मेहरबानी:-
हैरानी की बात यह है कि ग्रेसिम इंडस्ट्रीज द्वारा कोट की गई दरें विभाग द्वारा तय की गई मौजूदा आकलन दरों (Assessed Rates) से बेहद अधिक हैं, जो सीधे तौर पर सरकारी खजाने को चूना लगाने जैसा है। कंपनी ने मीडियम बेसिसिटी पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड के लिए 11,286 रुपये प्रति मीट्रिक टन (बिना जीएसटी) की दर पेश की है, जो मौजूदा आकलन दर से 12.18% और पिछले स्वीकृत रेट से 8.00% अधिक है। वहीं, हाई बेसिसिटी पॉली एल्युमिनियम क्लोराइड के लिए कंपनी ने 11,729 रुपये प्रति मीट्रिक टन (बिना जीएसटी) का भाव मांगा है, जो आकलन दर से 12.54% और पुराने रेट से 7.99% अधिक है। इतनी महंगी दरें होने के बावजूद टेंडर निरस्त करने के बजाय अब मुख्य अभियंता को निर्देश दिए गए हैं कि वे कंपनी से नेगोशिएशन (मोलभाव) की औपचारिकता पूरी करें और बात न बनने पर ‘काउंटर ऑफर’ दें।
अधिकारियों की सुस्ती को मिला संरक्षण, पुराने कॉन्ट्रैक्ट की आड़ में खेल:-
अधिकारियों की सुस्ती और लेती-देती के कारण इस पूरी निविदा प्रक्रिया में भारी देरी हुई, जिसे बाद में आरटीपीपी नियमों के तहत चुपचाप ‘माफ’ (Condone) कर दिया गया। अब तर्क यह दिया जा रहा है कि गर्मियों में पानी साफ करने के लिए इस केमिकल की भारी जरूरत है और सप्लाई चेन न टूटे, इसलिए यह मंजूरी देना मजबूरी था। इसी तात्कालिकता की आड़ में, नए टेंडर के फाइनल होने तक 15.00 करोड़ रुपये की भारी-भरकम वित्तीय सीमा के भीतर मौजूदा रेट कॉन्ट्रैक्ट पर ही पुराने रेट से सप्लाई आर्डर जारी रखने की ‘पोस्ट फैक्टो’ अनुमति भी दे दी गई। साफ है कि अफसरों की गलती का खामियाजा अब विभाग को महंगी दरों और पुराने ठेकों को खींचकर भुगतना पड़ रहा है।
ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now