Expose Now स्पेशल रिपोर्ट: PHED में ‘मेहरबानी’ का एक और खेल नाकाम, चहेती कंपनियों को फायदा पहुंचाने का प्रस्ताव फाइनेंस कमेटी ने किया खारिज

PHED Rajasthan, Exclusive

-200 लाख की अतिरिक्त वित्तीय प्रतिबद्धता (Commitment) बढ़ाकर पुराने ठेकेदारों को उपकृत करने की थी तैयारी

-कमेटी ने पकड़ी अफसरों की चालाकी— बिना वास्तविक जरूरत के आकलन (Actual Assessment) के ही भेज दिया एक्सटेंशन का प्रस्ताव

-स्लुइस वाल्व खरीद का मामला टला; नियमों को ताक पर रख 3 महीने की मियाद बढ़ाने की कोशिशों पर फाइनेंस कमेटी ने फेरा पानी

जयपुर। पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट (PHED) में चहेते ठेकेदारों और कंपनियों पर मेहरबानी करने तथा बिना जरूरत के सरकारी खजाने पर बोझ डालने का एक और बड़ा खेल नाकाम हो गया है। फाइनेंस कमेटी (FC) की 917वीं बैठक में आईएसआई मार्क स्लुइस वाल्व (Sluice Valve) की खरीद से जुड़े एक संवेदनशील प्रस्ताव को कमेटी ने सिरे से खारिज (Deferred) कर दिया है। मामला एनआईबी संख्या Sluice Valve / 2024-25 /11 से जुड़ा है, जिसके तहत अधिकारी बिना किसी वास्तविक मांग के पुराने ठेकेदारों की वित्तीय प्रतिबद्धता को 400 लाख रुपये से बढ़ाकर सीधे 600 लाख रुपये (50 प्रतिशत अतिरिक्त) करने और टेंडर की अवधि को 3 महीने आगे बढ़ाने की जुगत में थे।

5 कंपनियों को उपकृत करने का था प्लान, पर ऐन वक्त पर पकड़ा गया खेल:-

विभाग के अधिकारियों ने मैसर्स हरि इंडस्ट्रीज (जयपुर), मैसर्स पारस वाल्व्स (जालंधर), मैसर्स सुनील इंडस्ट्रीज (जयपुर), मैसर्स बीकानेर इंजीनियरिंग वर्क्स (जयपुर) और मैसर्स आरको मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (जालंधर) जैसी चहेती फर्मों को उपकृत करने के लिए तगड़ी बिसात बिछाई थी। मुख्य अभियंता (प्रशासन) ने दलील दी कि मौजूदा रेट कॉन्ट्रैक्ट में बड़े आकार के वाल्वों (250mm से 600mm) की दरें नए टेंडर की तुलना में 5% से 10% तक कम हैं, इसलिए इसी पुराने कॉन्ट्रैक्ट की अवधि को 14 मई 2026 से बढ़ाकर 13 अगस्त 2026 कर दिया जाए। इसके साथ ही फर्मों की वित्तीय सीमा में भी 200 लाख रुपये का भारी-भरकम इजाफा करने की सिफारिश कर दी गई।

कमेटी की सख्ती— बिना ‘एक्चुअल असेसमेंट’ के अफसरों ने हवा में बना दिया प्रस्ताव:-

जब इस एजेंडे पर गहन विचार-विमर्श हुआ, तो फाइनेंस कमेटी ने अधिकारियों की इस मनमानी और चालाकी को पकड़ लिया। कमेटी ने साफ शब्दों में नाराजगी जताते हुए कहा कि अधिकारियों ने इस एक्सटेंशन को जायज ठहराने के लिए जमीनी स्तर पर कोई ‘नीड बेस्ड एक्चुअल असेसमेंट’ (वास्तविक आवश्यकता का आकलन) किया ही नहीं। अफसरों ने केवल पुरानी स्वीकृत दरों और पुराने रेट कॉन्ट्रैक्ट का हवाला देकर आंखें मूंदकर यह प्रस्ताव तैयार कर दिया, जो कि वित्तीय नियमों के तहत बिल्कुल भी तर्कसंगत और न्यायसंगत नहीं है।

“कमेटी ने पाया कि बिना जरूरत का वास्तविक आकलन किए केवल पुराने रेट्स को आधार बनाकर ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी। इसलिए इस प्रस्ताव को तुरंत स्थगित कर दिया गया है।”
— फाइनेंस कमेटी के विचार

गेंद फिर मुख्य अभियंता के पाले में, अब देना होगा पाई-पाई का हिसाब:-

फाइनेंस कमेटी के इस कड़े रुख के बाद अधिकारियों की ‘मेहरबानी का खेल’ पूरी तरह पलट गया है। कमेटी ने इस पूरे प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डालते हुए निर्देश दिए हैं कि विभाग पहले जमीन पर जाकर स्लुइस वाल्व की वास्तविक जरूरत का दोबारा बारीकी से परीक्षण (Re-examine) करे। अब मुख्य अभियंता (प्रशासन) को वास्तविक मांग और सटीक आंकड़ों के आधार पर ही नया प्रस्ताव तैयार कर कमेटी के सामने पेश करना होगा। तब तक पुराने ठेकेदारों की मियाद बढ़ाने और उन्हें करोड़ों रुपये का अतिरिक्त काम सौंपने के मंसूबों पर पूरी तरह से पानी फिर गया है।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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