जयपुर। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों में घिरे राजस्थान के पूर्व मंत्री डॉ. महेश जोशी और रिटायर्ड आईएएस सुबोध अग्रवाल की ‘लक्जरी’ जिंदगी अब जयपुर सेंट्रल जेल की सलाखों के पीछे सिमट गई है। दशकों तक सत्ता के गलियारों में रसूख और सुख-सुविधाओं का आनंद लेने वाले ये दोनों वीआईपी अब जेल की फर्श पर रातें काटने को मजबूर हैं। जेल प्रशासन के कड़े नियमों के बीच उनकी दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है।
भीषण गर्मी और सुविधाओं का अभाव
राजस्थान में इन दिनों पारा 45-47 डिग्री सेल्सियस के करीब पहुँच रहा है। ऐसे में, जहां ये रसूखदार लोग पहले वातानुकूलित (AC) कमरों में रहा करते थे, अब उन्हें जेल की बैरक में केवल एक पुराने छत पंखे के सहारे दिन गुजारने पड़ रहे हैं। जेल के वार्डों में कूलर की कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे भीषण गर्मी में उनकी बेचैनी और बढ़ गई है।
फर्श पर बिस्तर और कंबल का तकिया
जेल के नियमों के अनुसार, किसी भी कैदी को पलंग, खाट या गद्दे उपलब्ध नहीं कराए जाते। पूर्व मंत्री महेश जोशी और सुबोध अग्रवाल को भी अन्य सामान्य कैदियों की तरह फर्श पर ही सोना पड़ रहा है।
- बिस्तर: सोने के लिए केवल जेल का कंबल दिया जाता है।
- जुगाड़: गद्दे और तकिये के अभाव में ये कैदी कंबल को ही बिछाने और उसी को मोड़कर तकिया बनाने को मजबूर हैं। चद्दर जैसी बुनियादी सुविधा भी वहां उपलब्ध नहीं है।
लाइन में लगकर भोजन और खुद धोने पड़ रहे बर्तन
जेल में ‘वीआईपी कल्चर’ को पूरी तरह खत्म करते हुए प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि वहां सभी कैदी समान हैं।
- भोजन: सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, दोनों को अपने बर्तन लेकर लाइन में खड़ा होना पड़ता है।
- घर के खाने पर रोक: जेल नियमों के तहत किसी को भी घर का खाना मंगवाने की अनुमति नहीं है; उन्हें वही भोजन करना पड़ता है जो जेल की रसोई में सबके लिए बनता है।
- स्वयं सेवा: खाना खाने के बाद अपने बर्तन खुद साफ करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं की है।
राजनीतिक और प्रशासनिक सफर से सलाखों तक
डॉ. महेश जोशी, जिन्होंने 45 साल पहले छात्र राजनीति से अपना सफर शुरू किया और सांसद व मंत्री पद तक पहुँचे, वे आज भ्रष्टाचार मामले में दूसरी बार जेल में हैं। वहीं, 1988 बैच के वरिष्ठ आईएएस रहे सुबोध अग्रवाल, जिन्होंने पूरे करियर में शीर्ष पदों पर काम किया, अब जेल की बैरक में सामान्य कैदियों के बीच समय काट रहे हैं। जेल की चारदीवारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून के सामने पद और प्रतिष्ठा का कोई विशेषाधिकार नहीं है।
