​कानूनी समाचार: सुप्रीम कोर्ट ने 156(3) के दुरुपयोग पर लगाया अंकुश

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने प्रियंका श्रीवास्तव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि अब मजिस्ट्रेट के सामने धारा 156(3) के तहत शिकायत दर्ज कराना इतना आसान नहीं होगा। कोर्ट ने माना कि इस प्रावधान का इस्तेमाल अक्सर बेगुनाह लोगों, खासकर बैंक अधिकारियों और लोक सेवकों को ब्लैकमेल करने के लिए किया जा रहा है

खबर के मुख्य बिंदु:

  • बिना हलफनामे (Affidavit) के अर्जी नहीं: कोर्ट ने आदेश दिया कि अब 156(3) की हर अर्जी के साथ आवेदक को एक शपथ पत्र देना होगा। अगर शिकायत झूठी निकली, तो शिकायतकर्ता पर जेल जाने की नौबत आ सकती है।
  • सीधे कोर्ट जाने पर रोक: अब कोई भी व्यक्ति सीधे मजिस्ट्रेट के पास नहीं भाग सकता। उसे पहले पुलिस स्टेशन (154-1) और फिर उच्च पुलिस अधिकारियों (154-3) के पास जाने का सबूत देना होगा।
  • मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी: कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि मजिस्ट्रेट को ‘मशीन’ की तरह आदेश साइन नहीं करने चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि मामला गंभीर है या सिर्फ आपसी रंजिश।

यह मामला चर्चा में क्यों आया?

​यह पूरा विवाद एक लोन रिकवरी से शुरू हुआ था। एक व्यक्ति ने कर्ज नहीं चुकाया और जब बैंक अधिकारियों (प्रियंका श्रीवास्तव) ने कानूनी कार्रवाई की, तो उसने अधिकारियों पर ही आपराधिक मामला दर्ज करवा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसे “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” बताया।

महत्वपूर्ण नोट: वर्तमान में नए कानून (BNSS) के तहत भी यह सिद्धांत लागू है। अब धारा 156(3) की जगह धारा 175(3) BNSS ने ले ली है, लेकिन शपथ पत्र की अनिवार्यता वैसी ही बनी हुई है।

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