JLF 2026: “इतिहास जाने बिना भविष्य समझना नामुमकिन”, सुधा मूर्ति ने बच्चों को बताया—क्यों जरूरी है विभाजन का दर्द समझना

जयपुर, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) के तीसरे दिन फ्रंट लॉन में आयोजित सत्र ‘द मैजिकल ऑफ द लॉस्ट ईयररिंग्स’ भावनाओं और इतिहास का एक अनूठा संगम रहा। प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति ने अपनी नई किताब के जरिए भारत-पाकिस्तान विभाजन की पीड़ा और आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने की अहमियत पर विस्तार से बात की। सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार मंदिरा नायर ने किया।

पोती ‘नॉनी’ के लिए लिखी यह दास्तां

सुधा मूर्ति ने बताया कि यह किताब उन्होंने अपनी पोती नॉनी के लिए लिखी है, जो लंदन में रहती है। उन्होंने साझा किया कि उनकी बेटी के ससुराल (ऋषि सुनक का परिवार) का जुड़ाव लाहौर और एबटाबाद से रहा है। विभाजन के समय उन्होंने दो बार अपना घर खोया—पहले पाकिस्तान से अफ्रीका और फिर लंदन। सुधा मूर्ति ने कहा, “आज की पीढ़ी आजादी और जमीन को बहुत सहज मान लेती है, लेकिन इसके पीछे पीढ़ियों का संघर्ष है। मैं चाहती थी कि मेरी पोती अपनी जड़ों को समझे।”

इतिहास और भविष्य का अटूट रिश्ता

सुधा मूर्ति ने जोर देकर कहा कि अगर हम अपना इतिहास नहीं जानते, तो भविष्य को कभी नहीं समझ सकते। उन्होंने इस पुस्तक के लिए अमृतसर, दिल्ली से लेकर लंदन के संग्रहालयों तक व्यापक शोध किया। उन्होंने कहा कि उनकी यह किताब केवल एक जोड़ी बालियों की कहानी नहीं है, बल्कि खोई हुई जमीन, संस्कृति और रिश्तों का प्रतीक है। ज़ैनब और सिमरन जैसे पात्रों के जरिए उन्होंने उस साझा संस्कृति को जीवंत किया है जहाँ ईद और दिवाली साथ मनाई जाती थी।

माता-पिता को संदेश: बच्चों को ‘संघर्ष’ सिखाएं

सत्र के दौरान सुधा मूर्ति ने आज के ‘न्यूक्लियर परिवारों’ और पेरेंटिंग पर भी कटाक्ष किया। उन्होंने कहा:

  • रेज़िलिएंस (Resilience): माता-पिता बच्चों को खिलौने और सुविधाएं तो दे देते हैं, लेकिन उन्हें संघर्ष सहने की क्षमता नहीं देते।
  • असफलता को स्वीकारना: आज के बच्चे छोटी बातों पर अवसाद (Depression) की बात करते हैं। उन्हें पिछली पीढ़ियों के बलिदानों से सीखना चाहिए कि असफलता को स्वीकार करना ही असली आत्मविश्वास है।

“एक गलत रेखा ने लाखों जिंदगियां बदल दीं”

विभाजन पर बात करते हुए उन्होंने इसे एक ऐसा गलत निर्णय बताया जिसने करोड़ों लोगों के दिलों पर घाव दिए। उन्होंने सिंधी समुदाय का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने न केवल अपनी जमीन, बल्कि अपनी भाषा और पहचान भी खो दी। सुधा मूर्ति ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के संस्मरण साझा करते हुए बताया कि रावलपिंडी के पुराने घरों में आज भी लोगों की आँखों में वह टीस दिखाई देती है।


सुधा मूर्ति की खास बातें:

  • किताब का मर्म: बालियां सिर्फ आभूषण नहीं, पंजाब की मिट्टी और दोस्ती की प्रतीक हैं।
  • लेखकों की जिम्मेदारी: दादा-दादी के संस्कारों की कमी अब कहानियों के जरिए पूरी करनी होगी।
  • सीख: आने वाली पीढ़ी को मातृभाषा और संस्कृति का महत्व समझाना अनिवार्य है।
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