जयपुर। राजस्थान विश्वविद्यालय के इतिहास एवं भारतीय संस्कृति विभाग तथा संग्रहालय विज्ञान एवं संरक्षण केंद्र द्वारा राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं प्राचीन प्रागैतिहासिक औज़ार परंपरा” विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला का आज विधिवत शुभारंभ किया गया।
डॉ. पंकज धरेंद्र का संबोधन: पुरातत्व और वैज्ञानिक दृष्टि
कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में राजस्थान पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के निदेशक डॉ. पंकज धरेंद्र ने प्रतिभागियों को संबोधित किया। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की प्राचीनता और उसकी वैज्ञानिक प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन औजारों का अध्ययन हमें तत्कालीन समाज की तकनीकी समझ और जीवन शैली को समझने का आधार प्रदान करता है। डॉ. धर्मेंद्र ने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की कार्यशालाएं युवा शोधकर्ताओं को इतिहास के साथ-साथ प्रयोगात्मक पुरातत्व (Experimental Archaeology) से जोड़ने में सहायक सिद्ध होंगी।
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का तकनीकी सत्र
निदेशक डॉ. पंकज धरेंद्र एवं डॉ. निकी चतुर्वेदी के अनुसार, इस कार्यशाला में दक्षिण कोरिया से आए दो प्रसिद्ध पुरातत्वविद विद्यार्थियों को प्रागैतिहासिक औज़ार बनाने की विशेष तकनीकी बारीकियां सिखा रहे हैं। प्रतिभागियों को विशेष रूप से चर्ट पत्थर (Chert Stone) का उपयोग कर भारतीय ज्ञान परंपरा के उन प्रारंभिक औजारों का निर्माण करना सिखाया गया, जिनका उपयोग मानव इतिहास के शुरुआती चरणों में किया गया था।
आगामी कार्यक्रम
कार्यशाला के संयोजक डॉ. तमेघ पंवार ने बताया कि आने वाले दो दिनों में:
- दूसरे दिन: प्राचीन पद्धति से भाला (Spear) बनाने की कला का प्रदर्शन होगा।
- तीसरे दिन: तीर-कमान पद्धति (Bow and Arrow technique) के निर्माण और उसके उपयोग की ऐतिहासिक चर्चा की जाएगी।
इस आयोजन में देशभर से आए 40 से अधिक प्रतिभागी पुरातत्व की इन प्राचीन कलाओं को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास कर रहे हैं।
