राजस्थान शिक्षा परिषद में ‘टेंडर का खेल’! 9 महीने पहले जो कंपनियां थीं ‘भ्रष्ट’, रातों-रात कैसे हो गईं ‘दूध की धुली’?

By Admin

जयपुर | EXPOSE NOW INVESTIGATIVE DESK

राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद के गलियारों में इन दिनों एक ऐसा ‘गड़बड़झाला’ पक रहा है, जिसकी बू अब पूरे प्रशासनिक तंत्र में आने लगी है। सवाल सीधा और बेहद गंभीर है—क्या सरकारी सिस्टम इतना लाचार हो चुका है कि जिन कंपनियों पर भ्रष्टाचार की मुहर खुद शिक्षा मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर लगाई थी, उन्हीं के स्वागत में आज फिर ‘लाल कालीन’ बिछा दिया गया है? ‘Expose Now’ आज शिक्षा विभाग के उस खेल का पर्दाफाश कर रहा है, जहाँ नियमों, शुचिता और पारदर्शिता की धज्जियां खुलेआम उड़ाई जा रही हैं।

9 महीने का ‘जादुई’ बदलाव: भ्रष्टाचार से वफादारी तक का सफर

मामला प्रदेश के सरकारी स्कूलों में दी जाने वाली व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education) से जुड़ा हुआ है। करीब 9 महीने पहले, इन सेवाओं के लिए कुछ चुनिंदा कंपनियों को टेंडर जारी किए गए थे, लेकिन उस वक्त धांधली और अनियमितताओं की शिकायतों का ऐसा अंबार लगा कि विभाग में हड़कंप मच गया था।

तत्कालीन जांच में धांधली इतनी स्पष्ट थी कि खुद शिक्षा मंत्री ने उन कंपनियों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार की शिकायतों को सही पाया था। उस समय सरकार ने कड़ा रुख दिखाते हुए न केवल टेंडर निरस्त किए थे, बल्कि उन दागी कंपनियों के विभाग में काम करने पर भी रोक लगा दी गई थी। लेकिन अब महज 9 महीनों में पूरा मंजर बदल गया है और वही बदनाम कंपनियां फिर से बड़े टेंडर हथियाकर विभाग के भीतर अपनी पैठ जमा चुकी हैं।

राजस्थान शिक्षा परिषद में ‘टेंडर का खेल’!

Expose Now के तीखे सवाल: जवाब कौन देगा?

इस पूरे प्रकरण ने विभाग की कार्यप्रणाली पर कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं जिनका जवाब देना अब अनिवार्य हो गया है:

  1. पापों की ‘सफाई’ का राज क्या है? महज 9 महीने के अल्प समय में इन कंपनियों के सारे ‘पाप’ कैसे धुल गए? ऐसी कौन सी जांच रिपोर्ट या ‘गंगा’ है जिसमें डुबकी लगाकर ये कंपनियां फिर से व्यावसायिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए योग्य बन गईं?
  2. दागी चेहरों पर फिर मेहरबानी क्यों? जब पूर्व में टेंडर भ्रष्टाचार की वजह से निरस्त हुए थे, तो उन्हीं चेहरों को दोबारा मौका देना प्रदेश के लाखों छात्रों के भविष्य के साथ सीधे तौर पर खिलवाड़ है। क्या विभाग को पूरे देश में कोई भी अन्य साफ-सुथरी छवि वाली कंपनी नहीं मिली?
  3. बड़े मगरमच्छों का खेल? क्या माननीय शिक्षा मंत्री जी को इस चौंकाने वाले ‘यू-टर्न’ की जानकारी नहीं है? या फिर विभाग के भीतर बैठे कुछ ‘बड़े मगरमच्छों’ और रसूखदार अधिकारियों ने मंत्री जी की नाक के नीचे से यह विवादास्पद फाइल चुपचाप पास करा ली है?

शिक्षा मंत्री की साख और विभाग के भीतर की ‘सेटिंग’

यह पूरा मामला इसलिए भी तूल पकड़ रहा है क्योंकि शिक्षा मंत्री ने खुद सार्वजनिक मंचों से इन कंपनियों के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए थे। अब उन्हीं के विभाग द्वारा इन दागी कंपनियों को दोबारा टेंडर जारी होना कई तरह के गहरे संदेह पैदा करता है।

‘Expose Now’ की पड़ताल में यह ‘अंदर की खबर’ सामने आई है कि इन 9 महीनों के सन्नाटे में टेंडर की शर्तों और तकनीकी मापदंडों में ‘बड़े स्तर’ पर हेरफेर किया गया है। चर्चा है कि यह पूरी सेटिंग सिर्फ इसलिए की गई ताकि पुरानी दागी कंपनियों को कागजों पर ‘क्लीन चिट’ दिलवाई जा सके और उनकी पिछले दरवाजे से एंट्री सुनिश्चित हो सके।

क्या भ्रष्टाचार की नींव पर बनेगा छात्रों का भविष्य?

व्यावसायिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों को हुनरमंद बनाकर उन्हें रोजगार के काबिल बनाना है। लेकिन अगर इस योजना की नींव ही भ्रष्टाचार की ईंटों और दागी कंपनियों के भरोसे रखी जाएगी, तो इसका परिणाम क्या होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है।

‘Expose Now’ पुरजोर मांग करता है कि इस पूरी टेंडर प्रक्रिया की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। साथ ही, उन पर्दा पीछे बैठे अधिकारियों के नाम भी सामने आने चाहिए जिन्होंने दागी कंपनियों को फिर से ‘जीवनदान’ देकर सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को चुनौती दी है।

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