जयपुर, राज्य निर्वाचन आयोग ने आगामी पंचायती राज चुनावों के दौरान मीडिया कवरेज के लिए अब तक के सबसे सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। 23 जनवरी 2026 को जारी इन आदेशों ने डिजिटल युग में रिपोर्टिंग के तौर-तरीकों पर कड़ा अंकुश लगा दिया है। आयोग का तर्क है कि ये कदम ‘मतों की गोपनीयता’ और ‘निष्पक्ष चुनाव’ सुनिश्चित करने के लिए उठाए गए हैं, लेकिन पत्रकारिता जगत में इसे सूचना के प्रवाह पर ‘सेंसरशिप’ की तरह देखा जा रहा है।
कैमरा और मोबाइल पर पूर्ण प्रतिबंध
आयोग के नए नियमों के मुताबिक, अब मतदान केंद्रों और मतगणना स्थलों पर मीडिया की उपस्थिति तो होगी, लेकिन वे केवल ‘दर्शक’ बनकर रह जाएंगे।
- फोटोग्राफी निषेध: मतदान बूथ के भीतर किसी भी प्रकार की फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।
- मोबाइल बैन: मीडिया कर्मी अपने साथ मोबाइल फोन नहीं ले जा सकेंगे। यह नियम मतगणना केंद्रों पर भी समान रूप से लागू रहेगा।
- सीमित प्रवेश पत्र: एक समाचार संस्थान से केवल एक रिपोर्टर और एक फोटोग्राफर को ही प्रवेश की अनुमति मिलेगी, जिसके लिए 15 दिन पहले आवेदन करना अनिवार्य है।
अधिकारियों को मिले ‘विशेषाधिकार’
आदेश में सबसे विवादास्पद पहलू अधिकारियों को दी गई असीमित शक्तियां हैं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 131 का हवाला देते हुए आयोग ने निर्देश दिए हैं कि:
- पीठासीन अधिकारियों की पावर: यदि कोई अधिकारी चाहे, तो वह वैध प्रवेश पत्र वाले मीडिया कर्मी को भी केंद्र से बाहर निकाल सकता है।
- गोपनीयता का हवाला: रिटर्निंग ऑफिसर (RO) को मतगणना कक्ष में ‘गोपनीयता’ के नाम पर मीडिया के प्रवेश को पूरी तरह रोकने की छूट दी गई है।
- पंचायत मुख्यालय पर नो एंट्री: पंचायत मुख्यालयों पर होने वाली मतगणना में पत्रकारों के प्रवेश पर पूरी तरह पाबंदी रहेगी।
क्यों उठ रहे हैं सवाल?
आयोग के इस फैसले पर स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक संगठनों ने आपत्ति जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल रिपोर्टिंग के दौर में कैमरे और मोबाइल पर प्रतिबंध लगाने से चुनावी प्रक्रिया की वास्तविक ‘निगरानी’ प्रभावित होगी। बिना विजुअल साक्ष्यों के, किसी भी गड़बड़ी की रिपोर्टिंग करना पत्रकारों के लिए कठिन होगा।
“मतदान की गोपनीयता जरूरी है, लेकिन पूरी प्रक्रिया को मीडिया की नजरों से दूर रखना पारदर्शिता के सिद्धांतों के खिलाफ है।” — स्थानीय पत्रकार संघ
