Expose Now का ऑपरेशन ‘महाघोटाला’: करौली चिकित्सा विभाग में भ्रष्टाचार का ‘दीमक’, जिसने नियमों को कुचलकर सरकारी खजाने में लगाई 33 लाख की सेंध; JD बोले- ‘बख्शा नहीं जाएगा’

By Admin

करौली:  राजस्थान की माटी वीरों की कहानियों के लिए जानी जाती है, लेकिन करौली जिले का चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग इन दिनों भ्रष्टाचार की एक ऐसी काली कहानी लिख रहा है, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले को शर्मसार कर दिया है। यह कहानी किसी एक दिन की नहीं, बल्कि उस दीमक की है जो सालों से सिस्टम को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है। Expose Now की टीम ने जब गुढ़ाचंद्रजी (Gudhachandraji) ब्लॉक में चल रही धांधलियों की परतें उधेड़ना शुरू किया, तो सामने आया एक ऐसा सच जो न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि सरकारी खजाने की सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न भी है।

हाथ लगे एक्सक्लूसिव दस्तावेजों, कोटा जोन की ऑडिट रिपोर्ट और अंदरूनी सूत्रों की गवाही ने यह साबित कर दिया है कि यहाँ ‘नियम’ नहीं, बल्कि ‘रसूख’ चलता है। यह 33 लाख रुपये के गबन का मामला मात्र एक बानगी भर है, असल खेल तो इससे कहीं ज्यादा गहरा और पुराना है।

महाघोटाले की ‘जेनेसिस’: पूर्व CMHO दिनेश मीणा के कार्यकाल से शुरू हुआ ‘खेल’

किसी भी अपराध की जड़ें अचानक नहीं पनपतीं, उन्हें सींचा जाता है। गुढ़ाचंद्रजी ब्लॉक में चल रहे इस भ्रष्टाचार के खेल की पटकथा आज की नहीं है। Expose Now की गहरी छानबीन और विभाग के पुराने सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस अव्यवस्था और मनमानी की नींव पूर्व मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) दिनेश मीणा के कार्यकाल में ही रख दी गई थी।

जानकार बताते हैं कि पूर्व CMHO दिनेश मीणा के समय से ही विभाग में एक ऐसा सिस्टम विकसित हो गया था, जहाँ नियमों को ताक पर रखकर चहेते अधिकारियों को मलाईदार पदों पर बैठाया जाने लगा। आरोप है कि उसी दौर में वित्तीय अनियमितताओं को नजरअंदाज करने और प्रशासनिक आदेशों को ‘मैनेज’ करने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उसने आज एक विकराल रूप धारण कर लिया है। उस समय बोए गए भ्रष्टाचार के बीज अब वटवृक्ष बन चुके हैं, जिसकी छांव में डॉ. जगराम मीणा जैसे अधिकारी नियमों की धज्जियां उड़ाने का साहस कर पा रहे हैं। यह एक ऐसा ‘नेक्सस’ (Nexus) है जो अधिकारी बदलने के बाद भी नहीं टूटता, बल्कि और मजबूत होता चला जाता है।

ऑडिट रिपोर्ट का ‘पोस्टमार्टम’: 33 लाख की डकैती का सच

कोटा जोन के आंतरिक जांच दल (Internal Audit Team) द्वारा हाल ही में की गई ऑडिट ने इस पूरे घोटाले की कलई खोलकर रख दी है। सहायक लेखाधिकारी प्रथम राकेश कुमार सिंघल और रामचरण मीणा ने अपनी रिपोर्ट में जो लिखा है, वह किसी थ्रिलर फिल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। रिपोर्ट के पन्ने-पन्ने पर सरकारी धन की लूट की गवाही दर्ज है।

कोटा जोन के आंतरिक जांच दल (Internal Audit Team) की रिपोर्ट

1. आचार संहिता का खुला मखौल और ‘जबरन’ कब्जा

लोकतंत्र में चुनाव आयोग और आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) का स्थान सर्वोपरि होता है। लेकिन गुढ़ाचंद्रजी के तत्कालीन बीसीएमओ डॉ. जगराम मीणा (मूल पद: कनिष्ठ विशेषज्ञ, दंत) के लिए शायद ये नियम कोई मायने नहीं रखते।

ऑडिट रिपोर्ट के अनुच्छेद संख्या 04 में स्पष्ट उल्लेख है कि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान, जब पूरा देश आचार संहिता के दायरे में था, डॉ. जगराम मीणा ने 05.04.2024 को स्वेच्छा से, बिना किसी सक्षम अधिकारी की अनुमति के, बीसीएमओ कार्यालय का पदभार ग्रहण कर लिया । उन्होंने इसके लिए मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) गंगापुर सिटी की न तो कोई टिप्पणी ली और न ही अनुमति का इंतजार किया ।

यह कृत्य सीधे तौर पर अनुशासनहीनता और राजद्रोह जैसा है। जिला निर्वाचन अधिकारी (कलेक्टर) करौली ने इसे गंभीरता से लेते हुए 18.04.2024 को नोटिस (क्रमांक 579-83) जारी किया और इसे “दुराचरण” (Misconduct) माना । लेकिन सवाल यह है कि नोटिस के बावजूद डॉ. मीणा कुर्सी पर कैसे जमे रहे? उन्हें किसका संरक्षण प्राप्त था?

2. बिना ‘पावर’ सरकारी खजाने में सेंधमारी (Financial Fraud)

इस घोटाले का सबसे गंभीर पहलू वित्तीय गबन है। सरकारी नियमों (GF&AR) के अनुसार, बिना ‘आहरण एवं वितरण अधिकारी’ (DDO) की शक्तियों के सरकारी खजाने से एक रुपया भी नहीं निकाला जा सकता।

ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, 16.04.2024 से 05.07.2024 की अवधि के बीच, डॉ. जगराम मीणा के पास निदेशालय से वित्तीय शक्तियां प्राप्त होने का कोई आदेश नहीं था । इसके बावजूद, उन्होंने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) मद से 32,14,182 रुपये (बत्तीस लाख चौदह हजार एक सौ बयासी रुपये) का भुगतान कर दिया ।

ऑडिट टीम ने अपनी टिप्पणी में साफ लिखा है कि, “खंड मुख्य चिकित्सा अधिकारी गुढ़ाचंद्रजी के ध्यान में लाया जाता है कि उक्त अवधि में किये गये समस्त भुगतान अनियमितता की श्रेणी में आते हैं”

यह भुगतान कैसे संभव हुआ? क्या उपकोषाधिकारी (Sub-Treasury Officer) और बैंक मैनेजर ने बिना वैध आदेशों की जांच किए भुगतान पास कर दिया? स्टिंग ऑपरेशन में सामने आया है कि डॉ. जगराम ने ट्रेजरी में अपने हस्ताक्षर अपडेट करवा लिए थे, जबकि उनके पास सक्षम आदेश नहीं थे। यह एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है जिसमें बैंक और ट्रेजरी के कर्मचारी भी शामिल हो सकते हैं।

3. ‘हवा’ में दौड़ती गाड़ियां और बंद मीटर का रहस्य

भ्रष्टाचार का सबसे सुरक्षित तरीका होता है—गाड़ियों के फर्जी बिल बनाना। गुढ़ाचंद्रजी ब्लॉक में भी यही पुराना हथकंडा अपनाया गया, लेकिन इस बार ऑडिट ने उन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया। रिपोर्ट के अनुच्छेद 07 में वाहनों के संचालन में भारी फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है।

  • प्राइवेट वाहनों का खेल: नियमों के मुताबिक, सरकारी उपयोग के लिए किराए पर लिए जाने वाले वाहनों का कमर्शियल (टैक्सी) परमिट होना अनिवार्य है। लेकिन यहाँ किराए पर लिए गए लगभग सभी वाहन ‘प्राइवेट’ थे । यह न केवल वित्त विभाग के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है।
  • बंद मीटर (Closed Milometer): सबसे हास्यास्पद और चौंकाने वाली बात यह है कि डॉ. जगराम मीणा द्वारा की गई यात्राओं में वाहनों के माईलोमीटर (Milometer) बंद दर्शाए गए हैं । अब सवाल यह उठता है कि जब मीटर ही बंद था, तो यह कैसे पता चला कि गाड़ी 10 किलोमीटर चली या 100 किलोमीटर? या फिर गाड़ी चली ही नहीं, सिर्फ बिल बना दिए गए?
  • फर्जी लॉगशीट: लॉगशीट (Logsheet), जो किसी भी यात्रा का सबूत होती है, उसमें न तो आगमन-प्रस्थान का समय था और न ही ड्राइवर के हस्ताक्षर । इससे साफ होता है कि यात्राएं सिर्फ कागजों पर हुईं और लाखों रुपये का डीजल-पेट्रोल अधिकारियों की जेब में चला गया।
  • बिना बिल भुगतान: अंधेरगर्दी की हद तो तब हो गई जब कार्यालय ने बिना बिल (Invoice) प्राप्त किए, केवल अधूरी लॉगशीट के आधार पर ही वाहन मालिकों को भुगतान कर दिया ।

4. डॉक्टरों की ‘लॉंड्री’ का खर्च भी सरकार पर

भ्रष्टाचार सिर्फ लाखों में नहीं, बल्कि छोटी-छोटी रकमों में भी दिखाई देता है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुच्छेद 05 ने डॉक्टरों की एक शर्मनाक हरकत को उजागर किया है।

नियमों के अनुसार, ‘वर्दी धुलाई भत्ता’ (Laundry Allowance) केवल नर्सिंग कर्मियों और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को मिलता है, क्योंकि उन्हें ड्यूटी के दौरान वर्दी पहननी होती है। लेकिन गुढ़ाचंद्रजी के चिकित्सकों ने भी बहती गंगा में हाथ धो लिए।

  • डॉ. शिवराज मीना
  • डॉ. पूरण मल मीना
  • डॉ. मनोज मीना

इन सभी ने नियमों के विरुद्ध वर्दी धुलाई भत्ता उठाया । ऑडिट टीम ने इसे अवैध मानते हुए 3,019 रुपये की वसूली के आदेश दिए हैं । रकम भले ही छोटी हो, लेकिन यह उस मानसिकता को दर्शाती है कि जहाँ मौका मिले, सरकारी पैसे को नोच लो।

5. PHC रायसना: बिना टेंडर लाखों की खरीद (RTPP उल्लंघन)

घोटाले की आंच सिर्फ ब्लॉक कार्यालय तक ही नहीं रुकी, बल्कि इसके अधीन आने वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) रायसना तक भी पहुंची। ऑडिट रिपोर्ट के अनुच्छेद 08 में यहाँ भी वित्तीय अनियमितताओं का अंबार मिला है।

राजस्थान लोक उपापन में पारदर्शिता अधिनियम (RTPP Act) 2012 और नियम 2013 सरकारी खरीद में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बनाए गए हैं। नियम 39 के तहत 10,000 रुपये से अधिक और 1 लाख रुपये से कम की खरीद के लिए कम से कम तीन फर्मों से कोटेशन/निविदा लेनी अनिवार्य है ।

लेकिन PHC रायसना में 1,79,641 रुपये की सामग्री की खरीद बिना किसी निविदा प्रक्रिया के, चहेती फर्मों से सीधे कर ली गई:

  • ओजस एंटरप्राइजेज: 19,000 रुपये (एचपी प्रिंटर)
  • बीएस बैटरीज: 28,400 रुपये (बैटरी)
  • कृष्णा ग्लास हाउस: 60,725 रुपये (केबिन रिपेयर)
  • एम के कंप्यूटर: 34,840 रुपये (सीसीटीवी कैमरा)

यह सीधा इशारा करता है कि इन फर्मों से ‘कमीशन’ का खेल खेला गया और सरकारी नियमों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।

स्टिंग ऑपरेशन: ‘इनसाइडर’ ने खोले गहरे राज

Expose Now के पास मौजूद एक्सक्लूसिव बातचीत (Transcripts) ने इस घोटाले की परतों को और गहराई से खोल दिया है। जब हमारे रिपोर्टर ने मामले के जानकार डॉ. महेंद्र (परिवर्तित नाम) और तत्कालीन बीसीएमओ डॉ. राजेश मीणा से जुड़े सूत्रों से बात की, तो ‘सिस्टम’ की असलियत सामने आई।

1. अकाउंटेंट रवि कुमार शर्मा की भूमिका:

इस खेल में डॉ. जगराम अकेले नहीं थे। कार्यालय के सहायक लेखाकार रवि कुमार शर्मा (जो NHM से लगे हैं) ने इसमें ‘चाणक्य’ की भूमिका निभाई। सूत्र बताते हैं:

“बीसीएमओ बस इसने रवि कुमार शर्मा के साथ मिलकर एनएचएम शाखा के जो फाइनेंशियल काम है… वो इन्होंने अपनी मनमर्जी से किया… यह सीधे तौर पर फाइनेंशियल गबन है।”

यह बाबू (Clerk) ही वह कड़ी है जिसने फाइलों को गलत तरीके से तैयार किया और अवैध भुगतान का रास्ता साफ किया।

2. बीपीएम पर दबाव और मजबूरी:

ब्लॉक प्रोग्राम मैनेजर (BPM) प्रदीप चंद गोयल पर भी गलत तरीके से भुगतान वेरिफाई करने का भारी दबाव बनाया गया।

“उन्होंने मजबूरन तीन दिन का ऑर्डर बाबूजी करवा लिया… जब मेरे से बिना नॉलेज के पेमेंट कर दिए गए तो मैं क्यों करूं साइन? वो बहुत परेशान रहे।”

3. ‘सीएमएचओ ने पहनाई माला’:

‘सीएमएचओ ने पहनाई माला’

बातचीत से एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है। सूत्र बताते हैं कि बीसीएमओ को सीएमएचओ द्वारा माला पहनाकर स्वागत किया गया, जबकि उन पर कार्रवाई होनी चाहिए थी।

“बीसीएमओ को एक सीएमएचओ माला पहना रहा है, स्वागत कर रहा है… जगराम जी ने जयंतीलाल जी को आकर ये चीज बोली कि सर ये तो रामकपाल जी तो कब के हार मान के बैठ जाते।”

यह स्पष्ट करता है कि डॉ. जगराम मीणा को ऊपर से ‘अभयदान’ प्राप्त था। यह नेक्सस पूर्व CMHO दिनेश मीणा के समय से शुरू होकर आज भी बदस्तूर जारी है।

जांच अधिकारी (Auditor) का कबूलनामा

इस पूरे मामले की सबसे अहम कड़ी हैं जांच अधिकारी रामचरण मीणा (सहायक लेखाधिकारी, कोटा जोन)। जब Expose Now ने उनसे सीधे सवाल पूछे, तो उन्होंने दबी जुबान में स्वीकार किया कि मामला गंभीर है।

रिपोर्टर: “तेत्तीस लाख रुपए का जो घोटाला हुआ है… इस पर आपका क्या कहना है?”

रामचरण मीणा (ऑडिटर): “कागज डिटेल से पता लगता है… डीडी पावर तो नहीं थे उनके पास, वहां के लेटर नहीं था जयपुर का। बिना लेते के उठाया गया था… अनियमित भुगतान हुआ है।”

ऑडिटर ने यह भी माना कि इसमें ट्रेजरी (कोषागार) और बैंक की भी घोर लापरवाही है।

रामचरण मीणा: “ट्रेजरी वाले ने भी तो देखना चाहिए ना… बैंक वालों को भी देखना चाहिए कि इनके पास (Power) नहीं था तो सारे आ रहे हैं इसमें तो।”

यह बयान साबित करता है कि 33 लाख का यह घोटाला केवल एक व्यक्ति की करतूत नहीं है, बल्कि यह एक ‘सिस्टमैटिक फेलियर’ (Systemic Failure) है, जहाँ चेक और बैलेंस का पूरा तंत्र ही विफल हो गया।

राजनीतिक रसूख: सिफारिशी पत्रों का खेल

इस प्रशासनिक भ्रष्टाचार में राजनीति का तड़का भी भरपूर है। दस्तावेज दिखाते हैं कि कैसे नेताओं ने नियमों के विपरीत अधिकारियों के ट्रांसफर/पोस्टिंग में हस्तक्षेप किया। भाजपा प्रत्याशी (टोडाभीम) रामनिवास मीना ने 03.11.2025 को चिकित्सा मंत्री गजेंद्र खींवसर को पत्र (क्रमांक 2025/257) लिखकर डॉ. राजेश मीणा की अनुशंसा की थी । हालांकि, यह पत्र एक सामान्य सिफारिश हो सकती है, लेकिन यह दर्शाता है कि गुढ़ाचंद्रजी की सीट पर कब्जा जमाने के लिए किस कदर राजनीतिक खींचतान (Political Tug-of-war) चल रही थी। भ्रष्ट अधिकारियों ने इसी राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर अपनी जेबें भरीं।

प्रशासनिक हड़कंप: JD भरतपुर ने दिए सख्त कार्रवाई के संकेत

Expose Now द्वारा इस महाघोटाले को प्रमुखता से उजागर करने और लगातार सवाल पूछने के बाद अब चिकित्सा विभाग के उच्च अधिकारियों की नींद टूट गई है। मामले की गंभीरता और मीडिया के दबाव को देखते हुए भरतपुर जोन के संयुक्त निदेशक (Joint Director – JD) ने कड़ा रुख अपनाया है।

जेडी भरतपुर ने मामले पर संज्ञान लेते हुए एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“मामला मेरे संज्ञान में आया है और यह बेहद गंभीर प्रकृति का है। हम पूरी फाइल तलब करवा रहे हैं। तत्काल प्रभाव से एक ‘जांच कमेटी’ (Investigation Committee) गठित की जा रही है जो इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करेगी। जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, चाहे वह कितना भी रसूखदार अधिकारी या कर्मचारी क्यों न हो, उसे बख्शा नहीं जाएगा। सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने वालों पर सख्त अनुशासनात्मक और कानूनी कार्रवाई होगी।”

Expose Now के सवाल: अब आगे क्या?

यह 33 लाख रुपये का घोटाला तो सिर्फ वह है जो ऑडिट टीम की पकड़ में आया है। जिस तरह से डॉ. जगराम मीणा और उनके सहयोगियों ने सालों तक मनमानी की है, यदि उसकी गहराई से फोरेंसिक जांच हो तो यह आंकड़ा करोड़ों में जा सकता है।

Expose Now प्रशासन और सरकार से सीधे सवाल पूछता है:

  1. FIR में देरी क्यों? जब ऑडिट रिपोर्ट में यह साबित हो चुका है कि डॉ. जगराम मीणा ने बिना DDO पावर के 32 लाख रुपये सरकारी खजाने से निकाले, तो उन पर गबन, धोखाधड़ी और सरकारी पद के दुरुपयोग की FIR अभी तक दर्ज क्यों नहीं हुई?
  2. रिकवरी कब होगी? अवैध रूप से भुगतान की गई राशि, वाहन घोटाले की रकम और चिकित्सकों द्वारा लिए गए धुलाई भत्ते की वसूली 18% ब्याज सहित कब की जाएगी?
  3. ट्रेजरी अधिकारियों पर गाज कब? जिन ट्रेजरी और बैंक अधिकारियों ने बिना वैध आदेश के डॉ. जगराम के हस्ताक्षर पास किए और सरकारी धन निकलने दिया, उनकी जवाबदेही कब तय होगी?
  4. रवि कुमार शर्मा पर एक्शन कब? सहायक लेखाकार रवि कुमार शर्मा, जिन्होंने इस वित्तीय अनियमितता में सक्रिय भूमिका निभाई और फाइलों को पास करवाया, उन्हें अभी तक निलंबित क्यों नहीं किया गया?
  5. नेक्सस का पर्दाफाश: पूर्व CMHO दिनेश मीणा के समय से चले आ रहे इस सिंडिकेट की जांच कब होगी?

हमारी मांग:

राज्य सरकार और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। गुढ़ाचंद्रजी ब्लॉक के पिछले 5 से 7 सालों के सभी वित्तीय लेन-देन, टेंडर और भुगतानों की विशेष ऑडिट (Special Audit) करवाई जानी चाहिए। जनता के टैक्स के पैसे को लूटने वाले इन ‘सफेदपोश लुटेरों’ को सलाखों के पीछे होना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई अधिकारी नियमों को खिलौना समझने की भूल न करे।

Expose Now इस खबर पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए हुए है। जैसे ही जांच कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंपेगी या जयपुर मुख्यालय से कोई कार्रवाई होगी, हम सबसे पहले आपको अपडेट करेंगे।

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