जयपुर पर ‘लेपर्ड’ का पहरा: पॉश कॉलोनियों से सिनेमा हॉल तक दहशत, सिस्टम के सारे दावे फेल!

By Admin

खास रिपोर्ट: ‘Expose Now’ इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो

जयपुर। गुलाबी नगरी अब धीरे-धीरे ‘लेपर्ड सिटी’ में तब्दील होती जा रही है। पिछले एक साल के सरकारी आंकड़े और जमीनी हकीकत चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि जयपुर का कोई भी कोना अब सुरक्षित नहीं है। Expose Now की विशेष पड़ताल में खुलासा हुआ है कि जंगल की सीमाएं लांघकर लेपर्ड अब इंसानी बस्तियों के ‘स्थायी निवासी’ बनते जा रहे हैं। जगतपुरा के बेडरूम से लेकर चांदपोल के सिनेमा हॉल तक, साक्षात मौत का साया घूम रहा है।

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विधानसभा में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 12 महीनों में लेपर्ड ने शहर के चैन और सुकून को पूरी तरह से तहस-नहस कर दिया है:

हरि नगर, जगतपुरा (7 फरवरी): एक मादा लेपर्ड रिहायशी घर के अंदर घुस गई। रेस्क्यू टीम ने घंटों की मशक्कत के बाद उसे ट्रेंकुलाइज किया। सोचिए, अपनों के बीच मौत को पाकर उस परिवार पर क्या गुजरी होगी?

सिलवन पार्क (9 अप्रैल): यहाँ एक मादा शावक लावारिस मिला। अफसोस की बात यह है कि विभाग के दावों के बावजूद इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। क्या यह मेडिकल फेलियर नहीं है?

गोपालपुरा पुलिया (24 अगस्त): शहर की लाइफलाइन माने जाने वाली गोपालपुरा पुलिया और NBC फैक्ट्री के पास नर लेपर्ड की मौजूदगी ने हजारों राहगीरों की जान जोखिम में डाल दी।

MNIT कैंपस, मालवीय नगर (24 अगस्त): शिक्षा के मंदिर में लेपर्ड का मूवमेंट हफ्तों तक रहा। छात्र कमरों में कैद रहे। विभाग ने पिंजरा तो लगाया, लेकिन दहशत का समाधान नहीं कर पाया।

सिविल लाइन्स (20 नवंबर): सबसे चौंकाने वाली घटना मुख्यमंत्री और मंत्रियों के निवास वाले ‘हाई सिक्योरिटी जोन’ सिविल लाइन्स में हुई। यहाँ से नर लेपर्ड का रेस्क्यू किया जाना सिस्टम की विफलता की पराकाष्ठा है।

चांदपोल, सरोज सिनेमा (28 नवंबर): पुराने शहर की घनी आबादी वाले इलाके में लेपर्ड का पहुँचना यह बताता है कि वन्यजीव अब जंगल भूल चुके हैं। सिनेमा हॉल के पास लेपर्ड की खबर ने पूरे परकोटे में सन्नाटा पसरवा दिया।

आगरा रोड(06 फरवरी 2026): आगरा रोड स्थित सूर्या सिटी कॉलोनी के पार्किंग क्षेत्र में रात को पैंथर घूमता नजर आया। सीसीटीवी फुटेज में यह नजारा देखने के बाद सुबह क्षेत्र में सन्नाटा पसर गया और लोगों ने वनविभाग को इसकी सूचना दी।

गुर्जर घाटी (15 नवंबर): यहाँ एक लेपर्ड की संदिग्ध मौत हुई। पोस्टमार्टम में शरीर पर चोट के निशान मिले। सवाल यह है कि क्या वन विभाग अपने क्षेत्र में भी लेपर्ड को सुरक्षा नहीं दे पा रहा?

Expose Now का तीखा सवाल: फाइलों में इंतज़ाम, सड़कों पर लेपर्ड!

विभाग का दावा है कि 2 दिसंबर 2024 से दो QRT टीमें तैनात हैं और 60 कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं। लेकिन Expose Now पूछता है:

कागजी दावे, जो जमीनी हकीकत से कोसों दूर: वन विभाग की ओर से जंगली जानवरों भोजन की मात्रा बढ़ाने के लिए चीतल (Prey-base) छोड़ने की बात कहीं जा रही है, लेकिन हकीकत यह कि भोजन की कमीं के चलते लगातार जंगली जानकारी आबादी क्षेत्रों में घुस रहे हैं।

खानापूर्ति की ट्रेनिंग: रणथंभौर के ट्रैकर्स से ट्रेनिंग दिलाने के बाद भी रिहायशी इलाकों में मूवमेंट कम क्यों नहीं हुआ?

वॉटरहोल का सच: जंगल में 6 नए वॉटरहोल बनाने का दावा किया गया है, फिर भी पानी की तलाश में लेपर्ड शहर की तरफ क्यों भाग रहे हैं?

विशेषज्ञों की राय: ‘मैन-एनिमल कॉन्फ्लिक्ट’ की ओर बढ़ता जयपुर

जानकारों का मानना है कि जब तक झालाना और आमागढ़ के जंगलों में लेपर्ड के लिए भोजन और पानी की पुख्ता व्यवस्था नहीं होगी, तब तक वे शहर का रुख करते रहेंगे। विभाग केवल लेपर्ड को पकड़कर दूसरे जंगल में छोड़ने की खानापूर्ति कर रहा है, जबकि समस्या की जड़ पर वार नहीं किया जा रहा।

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