लोहागढ़ में पिघली रिश्तों की बर्फ: 5 साल बाद गले मिले विश्वेंद्र सिंह और अनिरुद्ध , साथ दिखे ‘महाराज और युवराज’

भरतपुर। लोहागढ़ की रियासत और भरतपुर के पूर्व राजपरिवार से एक बड़ी और सुखद खबर सामने आई है। पिछले पाँच वर्षों से पिता, पुत्र और पत्नी के बीच चल रहा कड़वाहट भरा विवाद आखिरकार सुलझता नजर आ रहा है। पूर्व कैबिनेट मंत्री विश्वेंद्र सिंह और उनके पुत्र युवराज अनिरुद्ध सिंह के बीच मंगलवार को जवाहर रिसोर्ट में मुलाकात हुई, जिसके बाद खुद विश्वेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर बेटे के साथ फोटो साझा कर इस सुलह पर मुहर लगा दी है।

सोशल मीडिया पर पिता का भावुक संदेश

विश्वेंद्र सिंह ने फेसबुक और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर फोटो पोस्ट करते हुए लिखा, “आज जवाहर रिजॉर्ट में बहुत दिनों बाद मेरे बेटे युवराज अनिरुद्ध सिंह से सुखद मुलाकात हुई।” इस तस्वीर के सामने आते ही भरतपुर और जाट सरदारी में खुशी की लहर दौड़ गई है। लंबे समय से आक्रामक बयानबाजी करने वाले अनिरुद्ध सिंह भी इस दौरान शांत और सहज नजर आए।

झंडे के विवाद पर था ‘आर-पार’ का ऐलान

यह सुलह इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि महज 10 दिन पहले 29 जनवरी को विश्वेंद्र सिंह ने बेहद सख्त तेवर दिखाए थे। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर मोती महल पर रियासतकालीन झंडा नहीं लगाया गया, तो वे 13 फरवरी (महाराजा सूरजमल जयंती) को खुद जाकर झंडा फहराएंगे। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि “किसी में हिम्मत है तो रोक के दिखा देना”। अब 13 फरवरी से पहले ही पिता-पुत्र का साथ आना बड़े विवाद को टालने के संकेत दे रहा है।

क्या था पूरा विवाद? (एक नजर में)

भरतपुर राजपरिवार में विवाद की जड़ें काफी गहरी थीं:

  • प्रॉपर्टी और भरण-पोषण: विश्वेंद्र सिंह ने अपनी पत्नी पूर्व सांसद दिव्या सिंह और बेटे पर भरण-पोषण अधिनियम के तहत केस किया था।
  • आभूषणों की चोरी का आरोप: जून 2024 में विश्वेंद्र सिंह ने पत्नी और बेटे पर बिना अनुमति लॉकर से करोड़ों के जेवर निकालने का मामला दर्ज कराया था।
  • मोती महल और तिरंगा: अगस्त 2025 में महल से रियासत का झंडा हटाने पर विवाद हुआ। अनिरुद्ध सिंह ने वहां तिरंगा फहरा दिया था, जिसका विश्वेंद्र सिंह ने विरोध किया था। इसके बाद जाट नेताओं द्वारा महल का गेट तोड़ने की घटना भी हुई थी।

सुलह के मायने

राजघराने के जानकारों का मानना है कि बसंत पंचमी और महाराजा सूरजमल जयंती से ठीक पहले हुई यह मुलाकात भरतपुर की राजनीति और सामाजिक समीकरणों को भी प्रभावित करेगी। पिछले काफी समय से जाट सरदारी भी इस पारिवारिक कलह को खत्म करने का दबाव बना रही थी।

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