चाइल्ड मेंटल हेल्थ: कहीं डिप्रेशन में तो नहीं आपका लाडला ?

अक्सर समाज में यह धारणा रहती है कि डिप्रेशन केवल वयस्कों या करियर के तनाव से जूझ रहे लोगों की समस्या है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। आज के दौर में छोटे बच्चे भी अवसाद की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि बच्चों में डिप्रेशन बड़ों की तरह ‘लगातार उदासी’ के रूप में प्रकट नहीं होता, बल्कि उनके व्यवहार और शारीरिक बदलावों के पीछे छिपा होता है, जिसे अक्सर माता-पिता ‘बचपना’ या ‘बदतमीजी’ समझकर नजरअंदाज कर देते हैं।


1. बच्चों में डिप्रेशन के लक्षण: जिन्हें पहचानना जरूरी है

डॉ. ने बच्चों में अवसाद को पहचानने के लिए कुछ प्रमुख श्रेणियों में लक्षणों को विभाजित किया है:

  • व्यवहार और स्वभाव में बदलाव: चूँकि छोटे बच्चे अपनी मानसिक पीड़ा को शब्दों में पिरोने में सक्षम नहीं होते, इसलिए उनका व्यवहार ही उनका आईना होता है। यदि बच्चा अचानक गुमसुम रहने लगे, छोटी-छोटी बात पर चिड़चिड़ा हो जाए, बार-बार रोने लगे या अपनी सबसे पसंदीदा एक्टिविटी (जैसे साइकिल चलाना या वीडियो गेम) से दूरी बना ले, तो यह खतरे की घंटी है।
  • शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: डिप्रेशन का असर केवल दिमाग पर नहीं, शरीर पर भी दिखता है। बिना किसी बीमारी के बार-बार पेट दर्द या सिरदर्द की शिकायत करना, अत्यधिक थकान महसूस करना, भूख का एकदम मर जाना या बहुत ज्यादा खाना और नींद न आना इसके स्पष्ट संकेत हैं।
  • शैक्षणिक प्रदर्शन और एकाग्रता: यदि कोई होनहार बच्चा अचानक पढ़ाई में पिछड़ने लगे, स्कूल जाने के नाम से ही तनाव में आ जाए या क्लास में ध्यान केंद्रित न कर पाए, तो इसे केवल आलस न समझें। यह मानसिक अस्थिरता का परिणाम हो सकता है।
  • आत्म-सम्मान की कमी: डिप्रेशन से जूझते बच्चे अक्सर खुद को ‘बुरा’ या ‘नाकारा’ समझने लगते हैं। वे ऐसी बातें कर सकते हैं जैसे- “मुझे कोई प्यार नहीं करता” या “मैं किसी काम का नहीं हूँ”।

2. बच्चों में अवसाद के मुख्य कारण

डॉ. के अनुसार, बच्चों के डिप्रेशन के पीछे कई सामाजिक और पारिवारिक कारण हो सकते हैं:

  • पारिवारिक कलह: माता-पिता के बीच झगड़े या घर का अशांत माहौल।
  • बुलिंग (Bullying): स्कूल में साथियों द्वारा चिढ़ाया जाना या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना।
  • अकादमिक दबाव: हर समय पढ़ाई और अव्वल आने का भारी बोझ।
  • सोशल मीडिया और तुलना: खुद को दूसरों से कमतर आंकने की डिजिटल होड़।

3. माता-पिता क्या करें? (डॉक्टर की सलाह)

डॉ. का कहना है कि डिप्रेशन से उबरने में 15 से 19 वर्ष का आयु वर्ग सबसे संवेदनशील है। यदि समय पर पहचान कर ली जाए, तो मेडिकल काउंसिलिंग और थेरेपी के जरिए बच्चा पूरी तरह स्वस्थ हो सकता है। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे को जज करने के बजाय उसे सुनें, उसकी भावनाओं का सम्मान करें और जरूरत पड़ने पर तुरंत किसी क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट या साइकियाट्रिस्ट से संपर्क करें।

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