Expose Now का बड़ा खुलासा: तमिलनाडु में जिस ‘केल्ट्रॉन’ पर BJP ने उठाए गंभीर सवाल, राजस्थान में उसी पर 85 करोड़ की ‘बंपर’ मेहरबानी, आखिर ये कैसा दोहरा मापदंड?

-60:40 के पूर्व निर्धारित फॉर्मूले को रातों-रात बदलकर 80:20 का ‘स्मार्ट’ खेल: चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों की उड़ाई धज्जियां!

-ED की रडार पर रही ‘दागी’ कंपनी की पिछले दरवाजे से एंट्री: केल्ट्रॉन (KELTRON) के नाम के पीछे आखिर किस चहेती फर्म को उपकृत करने की है तैयारी?

-‘Expose Now’ की बिन्दुवार पड़ताल: क्या हाई पॉवर कमेटी ने किसी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुँचाने के लिए बदल दिए सारे नियम?

जयपुर। राजस्थान में भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करने वाले सिस्टम की एक बेहद हास्यास्पद और विरोधाभासी तस्वीर सामने आई है। ‘Expose Now’ की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि जिस ‘केल्ट्रॉन’ (KELTRON) कंपनी की कार्यप्रणाली और टेंडर आवंटन को लेकर तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का शीर्ष नेतृत्व भारी राजनीतिक बवाल काट चुका है, उसी कंपनी को राजस्थान में लाल कालीन बिछाकर करोड़ों का काम सौंपा जा रहा है। याद दिला दें कि जून 2024 में, तमिलनाडु भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने एमके स्टालिन सरकार को घेरते हुए कड़ा सवाल उठाया था कि अपनी स्टेट एजेंसी ‘एल्कॉट’ (ELCOT) को दरकिनार कर केरल सरकार के स्वामित्व वाली ‘केल्ट्रॉन’ को 1,000 करोड़ रुपये का स्मार्ट क्लासरूम टेंडर क्यों दिया गया? लेकिन सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि जिस कंपनी के खिलाफ तमिलनाडु में भाजपा मीडिया में मुखर होकर गंभीर सवाल खड़े करती है, उसी केल्ट्रॉन को राजस्थान में (जहां भाजपा की ही सरकार है) नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाकर 80 प्रतिशत काम (लगभग 85 करोड़ रुपये) थाली में सजाकर परोस दिया जाता है। इसके लिए बाकायदा पूर्व निर्धारित कार्य-अनुपात तक को रातों-रात बदल दिया गया। ऐसे में ‘Expose Now’ सिस्टम में बैठे रसूखदारों से सीधा सवाल पूछता है कि एक चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए आखिर यह कैसा दोहरा मापदंड अपनाया जा रहा है?

यह पूरा मामला राजस्थान के राजकीय विद्यालयों में ‘स्मार्ट क्लासरूम’ (Smart Classrooms) स्थापित करने से जुड़ा हुआ है। शिक्षा के डिजिटलीकरण के नाम पर पर्दे के पीछे जो खेल खेला जा रहा है, वह किसी बड़े घोटाले से कम प्रतीत नहीं होता। ‘Expose Now’ के पास मौजूद पुख्ता जानकारी और आरोपों के अनुसार, करोड़ों रुपये के इस टेंडर में पारदर्शिता को ताक पर रखकर मनमाने ढंग से बंदरबांट की गई है।

चहेती फर्म के लिए ऐसे बदली गई टेंडर की पूरी रूपरेखा:-

‘Expose Now’ की पड़ताल में यह सनसनीखेज तथ्य उभर कर आया है कि राजस्थान स्कूल शिक्षा परिषद (RCSCE) द्वारा जारी एक कार्य आदेश के तहत केरल स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KELTRON – केल्ट्रॉन) को राज्य में 7,195 स्मार्ट क्लासरूम की सप्लाई, इंस्टालेशन और कमीशनिंग का भारी-भरकम काम सौंप दिया गया है। इस पूरे कार्य की स्वीकृत लागत लगभग 85 करोड़ 65 लाख 50 हजार 360 रुपये (85,65,50,360/-) आंकी गई है। सतही तौर पर देखने पर यह एक सरकारी उपक्रम (PSU) को दिया गया सामान्य कार्य लग सकता है, लेकिन ‘Expose Now’ जब इस फैसले की गहराई में गया, तो धांधली की परतें एक-एक कर उखड़ने लगीं। दरअसल, राजस्थान में कुल 8,994 स्मार्ट क्लासरूम बनाए जाने थे। आरोपों के अनुसार, पूर्व में तत्कालीन शासन सचिव महोदय के स्तर पर यह स्पष्ट निर्णय लिया गया था कि इस पूरे काम को दो सरकारी उपक्रमों— केल्ट्रॉन (KELTRON) और सीईएल (CEL)— के बीच 60:40 के अनुपात में बांटा जाएगा।

सरकारी खरीद के नियमों (RTTP/ GFR दिशा निर्देशों) का सामान्य तकाजा भी यही कहता है कि जोखिम को कम करने और कार्य में प्रतिस्पर्धा व गुणवत्ता बनाए रखने के लिए किसी भी कार्य का विभाजन 50:30:20, 60:40 या 40:30:20:10 के पारदर्शी अनुपात में ही किया जाना चाहिए। लेकिन ‘Expose Now’ को मिली जानकारी के मुताबिक, अचानक किसी ‘अदृश्य दबाव’ या ‘विशेष मेहरबानी’ के चलते इस 60:40 की पूर्व निर्धारित व्यवस्था को रातों-रात बदलकर लगभग 80:20 के बेतरतीब और अस्वाभाविक अनुपात में तब्दील कर दिया गया।

64 करोड़ रुपये का अतिरिक्त ‘उपहार’ और खेल की शुरुआत:-

इस नए और मनमाने 80:20 के फॉर्मूले के तहत, कुल 8,994 स्मार्ट क्लासरूम में से 7,195 (लगभग 80% कार्य) अकेले केल्ट्रॉन को थमा दिए गए, जिसकी लागत 85,65,50,360/- है। वहीं, दूसरी एजेंसी CEL को मात्र 1,799 स्मार्ट क्लासरूम (केवल 20% कार्य) दिए गए, जिसकी लागत 21,41,67,352/- तय की गई। ‘Expose Now’ का सीधा सवाल यह है कि यह बदलाव केवल एक ‘प्रशासनिक समायोजन’ कैसे हो सकता है? इस एक छोटे से बदलाव से केल्ट्रॉन की झोली में सीधे तौर पर 64 करोड़ रुपये से अधिक के कार्य का अतिरिक्त वित्तीय भार (या यूं कहें कि लाभ) चला गया।
जब एक बार 60:40 का पारदर्शी निर्णय लिया जा चुका था, तो उसे 80:20 में बदलने का निर्णय किस स्तर पर, किन कारणों से और किस सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति से किया गया?। क्या नई हाई पॉवर कमेटी ने किसी व्यक्ति विशेष या किसी निजी चहेती फर्म को सीधा आर्थिक लाभ पहुँचाने की बदनीयती से इस पूरे कार्य विभाजन को ही पलट कर रख दिया?।

पीएसयू (PSU) का मुखौटा, पीछे काम कर रही है ‘दागी’ निजी कंपनी:-

भ्रष्टाचार के इस खेल में सबसे बड़ी और खतरनाक चाल यही होती है कि काम तो किसी सरकारी उपक्रम (PSU) के नाम पर लिया जाता है, लेकिन धरातल पर उसकी मलाई कोई और ही निजी कंपनी काट रही होती है। ‘Expose Now’ की छानबीन में यह बात प्रमुखता से सामने आई है कि केल्ट्रॉन (KELTRON) अक्सर अपने कार्यों को अंजाम देने के लिए सब-कॉन्ट्रैक्टिंग का सहारा लेती है। आरोपों के हवाले से जो सबसे बड़ी जानकारी निकलकर सामने आ रही है, वह यह है कि केल्ट्रॉन द्वारा अपने विभिन्न कार्यों के क्रियान्वयन के लिए चेन्नई स्थित एक फर्म ‘केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड’ (KS Smart Solutions Pvt Ltd) से संबद्ध संस्था के साथ काम किया जाता रहा है। केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस, जो कि केएस स्मार्ट टेक्नोलॉजीज लिमिटेड की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी है, मुख्य रूप से केल्ट्रॉन द्वारा प्राप्त सरकारी अनुबंधों के लिए प्रौद्योगिकी और अवसंरचना विक्रेता के रूप में काम करती है। उदाहरण के तौर पर, तमिलनाडु के आंगनवाड़ी केंद्रों में 2,233 सैमसंग एलईडी अल्ट्रा एचडी टीवी की आपूर्ति और स्थापना का 4.38 करोड़ रुपये का ऑर्डर भी केएस स्मार्ट ने केल्ट्रॉन के जरिए ही हासिल किया था। इसी तरह गुजरात सरकार की आईसीडीएस परियोजना के तहत 83.51 करोड़ का अनुबंध भी केल्ट्रॉन की आड़ में इसी कंपनी ने हासिल किया।

ऐसे में ‘Expose Now’ यह सवाल उठाता है कि राजस्थान के 85 करोड़ रुपये से अधिक के इस महा-प्रोजेक्ट में केल्ट्रॉन ने कार्यान्वयन एजेंसी (Implementing Agency) के रूप में किसे चुना है? क्या वह फिर से उसी चहेती ‘केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस’ को यह काम देने जा रही है? और सबसे महत्वपूर्ण बात, क्या शिक्षा विभाग ने इतने बड़े पैमाने पर काम सौंपने से पहले इस कार्यान्वयन एजेंसी का कोई विस्तृत और गहन सत्यापन (Due Diligence) किया है?।

ईडी (ED) की रेड, मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप और राजस्थान में ‘वेलकम’:-

चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने की यह कहानी तब और भी खौफनाक हो जाती है जब हम इस कथित कार्यान्वयन एजेंसी का इतिहास खंगालते हैं। एक्सपोज नाउ की डेस्क पर मौजूद दस्तावेजों और 18 मई 2025 को ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ (The New Indian Express) में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने तमिलनाडु में चल रही कथित TASMAC मनी लॉन्ड्रिंग जांच के दौरान केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस (KS Smart Solutions) से जुड़े परिसरों पर सघन तलाशी अभियान चलाया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, तमिलनाडु राज्य विपणन निगम (TASMAC) से जुड़े 950-1000 करोड़ रुपये के इस भारी-भरकम शराब घोटाले की व्यापक जांच के तहत, ईडी ने चेन्नई के टेयनमपेट स्थित केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस के कार्यालय सहित कई परिसरों पर छापेमारी की थी। इस आईटी कंपनी पर तमिलनाडु सरकार से करोड़ों रुपये के स्वचालन और सेवा अनुबंध हासिल करने और कथित शराब अनियमितताओं में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत जांच की आंच आ चुकी है।

‘Expose Now’ का शासन और प्रशासन से कड़ा सवाल है कि जिस कंपनी के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसी (ED) जैसी संस्था आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रही हो, उस कंपनी या उससे जुड़ी किसी भी एजेंसी को राजस्थान के हजारों स्कूलों में बच्चों के भविष्य से जुड़े प्रोजेक्ट का जिम्मा कैसे सौंपा जा सकता है?। क्या विभाग ने यह सुनिश्चित किया कि एजेंसी के विरुद्ध चल रही क्रिमिनल या इकोनॉमिक इन्वेस्टिगेशन की जानकारी का सत्यापन किया गया हो?। क्या राजस्थान शिक्षा विभाग जानबूझकर अपनी आंखें मूंदे बैठा है, ताकि चहेती फर्म आराम से 85 करोड़ रुपये के टेंडर में अपना हिस्सा वसूल सके?

तमिलनाडु में बवाल, राजस्थान में बिछ रहा लाल कालीन:

इस फर्म और केल्ट्रॉन की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल सिर्फ राजस्थान में नहीं उठ रहे हैं। ‘Expose Now’ आपको याद दिलाना चाहता है कि यह वही केल्ट्रॉन है जिसके कार्य आवंटन पर तमिलनाडु में भी भारी राजनीतिक बवाल मच चुका है। जून 2024 में, तमिलनाडु भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई (K. Annamalai) ने सार्वजनिक रूप से एमके स्टालिन सरकार को घेरते हुए सवाल उठाया था कि आखिर तमिलनाडु सरकार की अपनी एजेंसी ‘एल्कॉट’ (ELCOT) को दरकिनार करके केरल सरकार के स्वामित्व वाली ‘केल्ट्रॉन’ को 1,000 करोड़ रुपये का स्मार्ट क्लासरूम टेंडर क्यों दिया गया?।

यह एक बेहद हास्यास्पद और विरोधाभासी स्थिति है। जिस केल्ट्रॉन के खिलाफ तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व टेंडर आवंटन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है, मीडिया में बयान देता है, उसी केल्ट्रॉन को राजस्थान में (जहां भाजपा की ही सरकार है) नियमों की धज्जियां उड़ाकर, अपना पूर्व निर्धारित अनुपात बदलकर 80 प्रतिशत काम (लगभग 85 करोड़ रुपये) थाली में सजाकर परोस दिया जाता है। ‘Expose Now’ पूछता है कि आखिर यह कैसा दोहरा मापदंड है?

पूर्व के कामों की लीपापोती: एटीएल लैब (ATL Lab) का क्या हुआ?

चहेती फर्म पर मेहरबानी का यह कोई पहला मामला नहीं है। एक्सपोज नाउ की टीम ने जब कड़ियां जोड़नी शुरू कीं, तो पता चला कि इस फर्म का राजस्थान शिक्षा विभाग से पुराना और गहरा नाता रहा है। प्राप्त जानकारी और आरोपों के अनुसार, पिछले वर्ष इसी केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड ने ‘केंद्रीय भंडार’ (Kendriya Bhandar) के माध्यम से राजस्थान शिक्षा विभाग से एटीएल लैब (ATL Lab) से संबंधित एक बड़ा कार्य भी प्राप्त किया था।

अब नियम यह कहता है कि किसी भी एजेंसी को नया करोड़ों का काम देने से पहले उसके पुराने कार्यों का ‘परफॉर्मेंस वेरिफिकेशन’ (Performance Verification) होना चाहिए। ‘Expose Now’ विभाग से सीधे पूछना चाहता है कि क्या उस पुरानी एटीएल लैब के कार्य का भौतिक सत्यापन हुआ? क्या सभी निर्धारित स्थानों पर इंस्टॉलेशन का काम पूरा हो चुका है?। क्या PDI (Pre-Dispatch Inspection) और कंप्लीशन सर्टिफिकेट (Acceptance/Completion Certificate) की औपचारिकताएं पूरी की गईं?। क्या वारंटी और आफ्टर-सेल्स सर्विस (AMC) की शर्तें पूरी तरह से निभाई जा रही हैं?।

आरोप है कि पुराने कामों में कई खामियां होने के बावजूद, उन पर लीपापोती करके पर्दा डाल दिया गया है। बिना पिछली कमियों (Deficiency report) का आकलन किए, उसी एजेंसी या उससे जुड़ी संस्थाओं को हजारों नए स्मार्ट क्लासरूम का टेंडर परोसने की यह हड़बड़ी किस ओर इशारा करती है?।

‘Expose Now’ की बिन्दुवार पड़ताल: कंपनी और विभाग पर उठते गंभीर सवाल:-

चहेती फर्म का फायदा पहुंचाने के लिए अपनाई गई इस पूरी संदिग्ध प्रक्रिया को लेकर ‘एक्सपोज नाउ’ शिक्षा विभाग और चयन समिति के सामने आरोपों के आधार पर निम्नलिखित सीधे और तीखे सवाल खड़े कर रहा है:

-अनुपात बदलने का असली मास्टरमाइंड कौन? जब तत्कालीन शासन सचिव के स्तर पर यह तय हो चुका था कि केल्ट्रॉन और सीईएल के बीच काम 60:40 के अनुपात में बंटेगा, तो उसे अचानक 80:20 कर केल्ट्रॉन को 64 करोड़ का अतिरिक्त फायदा पहुंचाने का निर्णय किस अधिकारी के दबाव में लिया गया?।

-पीढ़ी दर पीढ़ी ठेकेदारी का खेल: केल्ट्रॉन खुद काम न करके यदि किसी निजी वेंडर (जैसे केएस स्मार्ट सॉल्यूशंस) से काम करवाती है, तो क्या राजस्थान सरकार ने इस सब-कॉन्ट्रैक्टिंग या कार्यान्वयन एजेंसी की नियुक्ति को अपनी लिखित मंजूरी दी है?।

-ईडी की छापेमारी को क्यों नजरअंदाज किया गया? जिस निजी कंपनी (केएस स्मार्ट) पर मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) जैसे गंभीर आरोप हों और तमिलनाडु में TASMAC घोटाले को लेकर ईडी ने उनके ठिकानों पर छापेमारी की हो, उसे राजस्थान के 7,195 स्कूलों में घुसने की अनुमति कैसे दी जा रही है? क्या विभाग ने कोई ड्यू डिलिजेंस (Due Diligence) रिपोर्ट मंगवाई?।

-पीएसयू (PSU) की आड़ में निजी लूट: क्या किसी पीएसयू का चयन केवल उसके ‘पीएसयू स्टेटस’ के आधार पर कर लिया गया, या राजस्थान के हित में उसकी तकनीकी क्षमता (Technical Capability), एग्जीक्यूशन ट्रैक रिकॉर्ड और वैल्यू फॉर मनी का भी कोई पारदर्शी आकलन किया गया था?।

-पुराने काम का हिसाब कौन देगा? एटीएल लैब (ATL Lab) के जिस प्रोजेक्ट को इसी कंपनी ने पूर्व में लिया था, क्या उसकी PDI और प्रदर्शन मूल्यांकन (Performance Evaluation) रिपोर्ट सकारात्मक आई है? यदि पुराना काम अधूरा है, तो नया 85 करोड़ का ठेका क्यों?।

-भविष्य के विवाद का जिम्मेदार कौन? यदि केल्ट्रॉन द्वारा यह कार्य भविष्य में ऐसी निजी संस्था को दे दिया जाता है जिस पर पहले से इनकम टैक्स (Income Tax) या ईडी (ED) की जांच चल रही है, तो इससे सरकार की छवि खराब होने पर क्या शिक्षा विभाग के अधिकारी इसकी जिम्मेदारी लेंगे?।

मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार के विरूद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ की शिक्षा विभाग में उड़ी धज्जियां:-

राजस्थान में वर्तमान में भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भरने वाली सरकार बैठी है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा यह 85.66 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट सीधे तौर पर राजस्थान के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा है। यदि नींव में ही भ्रष्टाचार और चहेती फर्मों को फायदा पहुंचाने की मंशा छुपी हो, तो उन स्कूलों में स्थापित होने वाले ‘स्मार्ट क्लासरूम’ कितने दिन चल पाएंगे, यह समझना मुश्किल नहीं है। Expose Now का स्पष्ट मानना है कि यह केवल एक पीएसयू या निजी संस्था का मामला नहीं है, बल्कि यह जनता की गाढ़ी कमाई के 100 करोड़ से अधिक (कुल प्रोजेक्ट) के बजट का मामला है। यदि कार्यान्वयन एजेंसी का पूर्व ट्रैक रिकॉर्ड दागी रहा है और उस पर आर्थिक अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं, तो ऐसे अनुबंधों को तत्काल प्रभाव से रोककर उनकी उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

जब तक इस पूरे खेल में शामिल सफेदपोश चेहरों और पर्दे के पीछे से इस 80:20 के अनुपात को संचालित करने वाले रसूखदारों की असलियत सामने नहीं आ जाती, एक्सपोज नाउ इस मुद्दे को लगातार पूरी बेबाकी के साथ उठाता रहेगा। राजस्थान की जनता यह जानने का अधिकार रखती है कि उनके बच्चों के लिए आबंटित पैसे का असली ‘स्मार्ट’ उपयोग कौन सी कंपनी और कौन से अधिकारी मिलकर कर रहे हैं। अंत में, आपको बता दें कि ‘Expose Now’ की इस दमदार और पुख्ता पड़ताल के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया है।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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