Expose Now का महा-खुलासा: राजस्थान में सुरक्षित नहीं है महिलाएं! रोजाना 17 बलात्कार और 50 से ज्यादा महिलाओं पर अत्याचार

-सरकारी फाइलों में कैद खौफनाक सच—2 साल में 36,308 अपराध, क्या पुलिस बन चुकी है महज केस रफा-दफा करने की मशीन?

-12 हजार से ज्यादा दरिंदगी के मामले और 63 मासूमों की लाशें, कानून के रखवालों की नाक के नीचे पनपता बेखौफ जंगलराज!

-40% से अधिक मामलों में एफआर (FR) की आड़—क्या थानों की रैंकिंग चमकाने और अपराधियों को बचाने के लिए चल रहा है ‘क्लोजर सिंडिकेट’?

-दहेज लोभियों की भेंट चढ़ीं 761 बेटियां, 228 को खुदकुशी के लिए धकेला, थानों के चक्कर काटकर टूटती आधी आबादी की सांसें!

-जयपुर से लेकर सरहदी जिलों तक कानून-व्यवस्था वेंटिलेटर पर, गृह विभाग और सत्ता के गलियारों में छाई चुप्पी पर चुभते सवाल!

(Expose Now विशेष पड़ताल: सत्ता के ‘खोखले’ वादे और थानों की चौखट पर ‘दम’ तोड़ती चीखें)

जयपुर। राजस्थान की धरती पर जब सत्ता के मंचों से ‘नारी सम्मान’ और ‘महिला सुरक्षा’ के लंबे-चौड़े कसीदे पढ़े जाते हैं, तब उसी वक्त थानों के किसी कोने में एक लाचार बेटी न्याय की गुहार लगाते-लगाते व्यवस्था के पत्थर दिल रवैये से हार रही होती है। ‘Expose Now’ की यह विशेष इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट किसी राजनीतिक भाषण या औपचारिक बयानबाजी पर नहीं, बल्कि राजस्थान पुलिस और गृह विभाग के उन आंतरिक व अधिकृत आंकड़ों के कच्चे-चिट्ठे पर आधारित है जो सीधे सत्ता, पुलिस महकमे और प्रशासनिक संवेदनहीनता के मुंह पर करारा तमाचा जड़ते हैं।

गृह विभाग के अधिकृत दस्तावेजों से जो सच्चाई निकलकर सामने आई है, वह रूह कंपा देने वाली है। वर्ष 2024 और वर्ष 2025 के दो सालों के भीतर पूरे राजस्थान में महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों के कुल 36,308 प्रकरण दर्ज किए गए। यदि 730 दिनों के इस कालखंड का गणित लगाया जाए, तो तस्वीर साफ है कि प्रदेश में रोजाना औसतन 50 महिलाएं बर्बरता, दरिंदगी और घरेलू हिंसा का शिकार बनाई जा रही हैं।

उससे भी ज्यादा भयावह यह है कि प्रदेश में हर 24 घंटे के भीतर औसतन 17 महिलाओं और नाबालिग बच्चियों की अस्मत लूटी जा रही है। ‘सुरक्षित राजस्थान’ के सरकारी स्लोगन के पीछे यह वह कड़वी हकीकत है, जिसे खाकी और हुक्मरानों की चुप्पी ने अपनी लालफीताशाही की फाइलों में दबा रखा था।

क्या दरिंदों को बचाने और रिकॉर्ड सुधारने का चल रहा है ‘क्लोजर सिंडिकेट’?

‘Expose Now’ के इन्वेस्टिगेशन में पुलिस प्रशासन की कार्यशैली का जो सबसे स्याह पहलू उजागर हुआ है, वह है मामलों को बंद करने की अंधी दौड़। दस्तावेजों के मुताबिक, कुल 36,308 दर्ज मामलों में से पुलिस ने 14,711 प्रकरणों में एफआर (Final Report) लगा दी। यानी कुल दर्ज अपराधों के 40.5% मामलों को पुलिस ने सीधे फाइलों में दफन कर दिया।

वर्षएफआर (FR) का विवरण
-वर्ष 2024में दर्ज कुल 17,579 मामलों में से 7,496 मामलों में एफआर ठोकी गई।
-वर्ष 2025में दर्ज कुल 18,729 मामलों में से 7,215 मामलों में एफआर की मुहर लगाकर पल्ला झाड़ लिया गया।

यह केवल एक संख्या नहीं है, यह उन 14,711 चीखों का गला घोंटना है जो इंसाफ मांगने थाने पहुंची थीं। पुलिस महकमा अक्सर यह तर्क देकर पल्ला झाड़ लेता है कि शिकायतें “झूठी” या “आपसी रंजिश” से प्रेरित थीं। लेकिन ‘Expose Now’ सीधे सवाल दागता है:

-क्या 40% से अधिक महिलाएं थानों में सिर्फ झूठे मुकदमे दर्ज कराने के लिए अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को दांव पर लगाती हैं?

-क्या यह एफआर का खेल थानों की क्राइम रैंकिंग सुधारने और सत्ताधीशों को यह दिखाने के लिए नहीं खेला जा रहा कि प्रदेश में ‘अपराध नियंत्रण’ में है?

-पीड़ितों पर राजनीतिक, सामाजिक और पुलिसिया दबाव बनाकर मामलों में जबरन राजीनामा करवाने या एफआर लगवाने का जो गंदा खेल चलता है, उसकी जवाबदेही किस डीजीपी और किस गृह सचिव की होगी?

  1. महिलाओं के साथ बलात्कार: 12,084 दरिंदगी के मामले, हर दिन 17 आबरू तार-तार, 5,585 केसों में लगा दी FR:-

दस्तावेजों के अनुसार, 2 वर्षों में प्रदेश के अंदर बलात्कार के कुल 12,084 मामले दर्ज किए गए।

वर्षबलात्कार के प्रकरण जिनमें चालानएफआर (FR)पेंडिंग
वर्ष 20246,4823,2983,08896
वर्ष 20255,6022,8362,497269

इन दो वर्षों में बलात्कार के 12,084 मामलों में से 5,585 मामलों में पुलिस ने FR लगाकर जांच बंद कर दी। यानी लगभग 46% बलात्कार के मामलों को पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में खारिज कर दिया।

जिलेवार आंकड़ों को खंगालने पर खाकी की कार्यप्रणाली की धज्जियां उड़ जाती हैं:

-राजधानी जयपुर के हालात बेहद चिंताजनक हैं।

जिला / क्षेत्रवर्ष 2024 (कुल मामले)वर्ष 2024 (एफआर / अन्य विवरण)वर्ष 2025 (कुल मामले)वर्ष 2025 (एफआर / अन्य विवरण)
राजधानी जयपुर क्षेत्र (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण व ग्रामीण)1,500 से अधिक (दोनों वर्षों को मिलाकर कुल)–––
अलवर311155 मामलों में एफआर261161 मामलों में एफआर
श्रीगंगानगर274168 मामलों में एफआर235134 मामलों में एफआर
बीकानेर220–182–
सीकर207–185–
उदयपुर215–172–
भीलवाड़ा215–155–

जैसे जिलों में दरिंदगी के मामले लगातार सैकड़ों में दर्ज हो रहे हैं।

सवाल यह है कि जब थानों में अभय कमांड सेंटर और महिला डेस्क के नाम पर करोड़ों रुपये फूंके जा रहे हैं, तब प्रदेश की सड़कों और घरों में बेटियां सुरक्षित क्यों नहीं हैं?

  1. बलात्कार के बाद हत्या: हैवानियत की पराकाष्ठा, 63 मासूमों की आबरू लूटकर ले ली जान:-

जब वहशीपन सारी सीमाएं लांघ जाता है, तब हवस के भेड़िए सबूत मिटाने के लिए पीड़िता को मौत के घाट उतार देते हैं। ‘Expose Now’ के पास मौजूद दस्तावेजी प्रमाण बताते हैं कि राजस्थान में दो सालों में 63 महिलाओं और बालिकाओं के साथ बलात्कार कर उनकी नृशंस हत्या कर दी गई।

वर्षकुल दर्ज प्रकरणचालानएफआर (FR)पेंडिंग
वर्ष 20243825112
वर्ष 2025251942
कुल योग63–15–

सोचिए, जिस मामले में एक बेटी के साथ पहले दुष्कर्म हुआ और फिर उसकी जान ले ली गई, वैसे 63 मामलों में से भी पुलिस ने 15 मामलों में FR लगा दी।

वर्षजिले और दर्ज मामलों की संख्या
वर्ष 2024बाड़मेर (4), ब्यावर (2), बांसवाड़ा (2), दौसा (2), चुरू (2), जालौर (2), सवाई माधोपुर (2), सालुंबर (2), कोटपुतली-बहरोड़ (2), सीकर (2) जैसे जिलों में दरिंदगी के बाद लाशें मिलीं।
वर्ष 2025बीकानेर (3), जयपुर शहर पूर्व (2), करौली (2)

क्या पुलिस प्रशासन यह बताएगा कि बलात्कार के बाद मर्डर जैसे जघन्य अपराधों में भी एफआर लगाने की नौबत क्यों आई? क्या जांच अधिकारियों ने साक्ष्य जुटाने में लापरवाही बरती या फिर रसूखदार कातिलों को बचाने के लिए मेडिकल व फॉरेंसिक साक्ष्यों के साथ खिलवाड़ किया गया?

  1. ससुराल में जिंदा जलती और फंदों पर झूलती बहुएं, 2 साल में 761 हत्याएं, 253 मामलों में फाइलों पर धूल!

दहेज की लालसा में बहुओं को मार डालने की कुप्रथा पर कड़े कानूनों का ढोल पीटा जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत खून से सनी है। दो वर्षों में राजस्थान के अंदर कुल 761 विवाहिताओं को दहेज की खातिर मौत के घाट उतार दिया गया।

-वर्ष 2024: 386 मामले दर्ज हुए (245 में चालान, 137 में एफआर, 4 पेंडिंग)।

-वर्ष 2025: 375 मामले दर्ज हुए (221 में चालान, 116 में एफआर, 38 पेंडिंग)।

कुल 761 दहेज हत्या के मामलों में से 253 मामलों में पुलिस ने FR थमा दी। जब एक नवविवाहिता की अप्राकृतिक मौत होती है, तब पुलिस का पहला काम निष्पक्ष साक्ष्य संकलन होना चाहिए। लेकिन एक-तिहाई मामलों में FR लगना साबित करता है कि थाने स्तर पर कैसे दहेज लोभियों के साथ मिलीभगत कर “आत्महत्या” या “दुर्घटना” की झूठी पटकथाएं तैयार करवाई जाती हैं।

-धौलपुर जिला दहेज हत्याओं की राजधानी बन चुका है, जहां 2024 में 26 मामले और 2025 में भी 26 मामले दर्ज हुए। यानी अकेले धौलपुर में 52 बेटियों को मार दिया गया।

जिलावर्ष 2024 (दहेज हत्या के मामले)वर्ष 2025 (दहेज हत्या के मामले)कुल मामले (दो वर्षों में)
धौलपुर262652
भरतपुर251540
अलवर161733
सीकर161430
दौसा111324
करौली131225
नागौर91322
जालौर91221

इस सारणी (Table) में दर्ज आंकड़े खाकी की निष्क्रियता की गवाही दे रहे हैं।

  1. आत्महत्या का दुष्प्रेरण: घुट-घुट कर 288 महिलाओं ने दी जान, 118 मामलों में पुलिस ने आरोपियों को दी ‘क्लीन चिट’:-

जब ससुराल या समाज की प्रताड़ना असहनीय हो जाती है, तो महिलाएं मौत को गले लगाने पर मजबूर होती हैं। राजस्थान में दो वर्षों में आत्महत्या के लिए मजबूर करने (दुष्प्रेरण) के कुल 228 प्रकरण दर्ज किए गए।

-वर्ष 2024: 94 दर्ज मामले (मात्र 26 में चालान, 62 में FR, 6 पेंडिंग)।

-वर्ष 2025: 134 दर्ज मामले (मात्र 48 में चालान, 56 में FR, 30 पेंडिंग)।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि कुल 228 मामलों में से पुलिस मात्र 74 मामलों में ही अदालत में चालान पेश कर पाई, जबकि 118 मामलों में FR लगाकर आरोपियों को खुली राहत दे दी गई। वर्ष 2024 में तो 94 मामलों में से 62 में FR लगी, यानी 65% से ज्यादा मामलों में पुलिस ने जांच का अंत बिना किसी सजा के कर दिया।

-2024 में प्रतापगढ़ (7 दर्ज, 6 में FR), बीकानेर (7 दर्ज, 5 में FR), चित्तौड़गढ़ (5 दर्ज), भीलवाड़ा (4 दर्ज), सवाई माधोपुर (4 दर्ज, चारों में FR) और अजमेर (4 दर्ज) में मामले दर्ज हुए।

-2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 134 हो गया। इसमें कोटा शहर में 7 मामले, पाली में 7 मामले, भीलवाड़ा में 6 मामले, जालौर में 6 मामले, झालावाड़ में 6 मामले, बूंदी में 5 मामले, सवाई माधोपुर में 5 मामले और अजमेर में 5 मामले सामने आए।

जब एक महिला अपने सुसाइड नोट या बयानों में प्रताड़ना का दर्द छोड़ जाती है, तब भी पुलिस की जांच आरोपियों के प्रभाव में आकर दम क्यों तोड़ देती है?

  1. महिला उत्पीड़न (दहेज प्रताड़ना): चारदीवारी में 23,172 महिलाओं पर जुल्म, 8,740 मामलों में जांच का ‘द एंड’:-

प्रदेश के अंदर घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न (IPC 498A आदि) की स्थिति इस कदर विकराल हो चुकी है कि 2 सालों में कुल 23,172 मुकदमे दर्ज हुए।

-वर्ष 2024: 10,579 मामले (6,306 में चालान, 4,198 में FR, 75 पेंडिंग)।

-वर्ष 2025: 12,593 मामले (7,683 में चालान, 4,542 में FR, 368 पेंडिंग)।

एक ही साल के भीतर महिला उत्पीड़न के मामलों में 2,014 मामलों की भारी बढ़ोतरी हुई, जो यह साफ बताती है कि समाज और परिवारों में महिलाओं की सुरक्षा का ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है। इन दोनों वर्षों में उत्पीड़न के 8,740 मामलों में पुलिस ने FR लगाई है।

जिलेवार स्थिति की भयावहता:

जिला / क्षेत्रवर्ष 2024 (मामले)वर्ष 2025 (मामले)
श्रीगंगानगर450716
हनुमानगढ़363499
भीलवाड़ा411483
बीकानेर390483
अजमेर379450
सीकर395421
पाली361391
राजधानी जयपुर क्षेत्र (चारों कमिश्नरेट जोन व ग्रामीण)1,0661,368

-राजधानी जयपुर के चारों कमिश्नरेट जोन (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण) और जयपुर ग्रामीण को मिलाकर 2024 में 1,066 मामले तथा 2025 में 1,368 मामले दर्ज हुए।

सिस्टम से ‘Expose Now’ के 5 सीधे और तीखे सवाल:

-गृह विभाग का खुफिया और सुरक्षा तंत्र क्या सो रहा है? जब हर दिन 17 दुष्कर्म और 50 महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं, तो पेट्रोलिंग, निर्भया स्क्वॉड और महिला सुरक्षा प्रकोष्ट का बजट किस मद में खर्च हो रहा है?

-14,711 एफआर की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच क्यों नहीं? क्या सरकार इन 14,711 मामलों की किसी स्वतंत्र एजेंसी या रिटायर्ड जज की कमेटी से समीक्षा कराने की हिम्मत दिखाएगी, ताकि पता चल सके कि इनमें से कितनों में जांच अधिकारियों ने घूसखोरी या राजनीतिक दबाव में केस बंद किए?

-890 पेंडिंग मामलों में किसका इंतजार है? दो साल बीत जाने के बाद भी बलात्कार, मर्डर और दहेज हत्या जैसे संगीन अपराधों में 890 मामले अनुसंधान में क्यों लटके हुए हैं?

-थानाधिकारियों की एसीआर (ACR) में महिला अपराधों का पैमाना क्यों नहीं? जिस थाना क्षेत्र में बलात्कार और दहेज हत्या के मामले बढ़ते हैं, वहां के एसएचओ और वृत्ताधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?

-क्या सिर्फ कागजी विज्ञापनों से बचेगी आधी आबादी? सरकार सुरक्षा के नाम पर अखबारों और होर्डिंग्स में करोड़ों फूंकती है, लेकिन थानों में जब पीड़िता पहुंचती है तो उसे अपमान और टरकाने के सिवा कुछ क्यों नहीं मिलता?

संवेदनहीनता की इंतहा, अब केवल जुमलों से नहीं चलेगा काम:-

‘Expose Now’ का यह आधिकारिक खुलासा केवल पुलिस महकमे के आंकड़ों का संकलन नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बेबस मांओं, बहनों और बेटियों का दर्द है जिनकी चीखों को व्यवस्था की फाइलों में दबा दिया गया। जब राज्य की कानून व्यवस्था महिलाओं को उनके घर, कार्यस्थल और सड़कों पर न्यूनतम सुरक्षा देने में भी नाकाम साबित हो रही हो, तब सुशासन के तमाम दावे खोखले और बेमानी नजर आते हैं। 36,308 अपराध और 14,711 FR के ये आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि राजस्थान में महिला सुरक्षा व्यवस्था ICU में है। अगर सरकार, गृह विभाग और पुलिस के आला अफसरों ने अपनी आंखें नहीं खोलीं और थानों में FR के नाम पर चलने वाले खेल पर लगाम नहीं लगाई, तो जनता की अदालत में इस खामोशी को अपराधियों का संरक्षण ही माना जाएगा।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now


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