Expose Now Special बाड़मेर में 595 करोड़ के मेगा वाटर प्रोजेक्ट में बड़ा खेल: बिना जमीन कब्जे के मंजूर किए 3.53 करोड़, अब पाप छुपाने के लिए काम ही गायब करने की तैयारी !

-9 साल बाद भी योजना से जुड़े कई गांव प्यासे, 2017 में जारी हुआ था 595.34 करोड़ का वर्क ऑर्डर, 2020 की डेडलाइन बीतने के बाद भी जनता बूंद-बूंद पानी को तरसी

-तकनीकी खामियों और SDO कोर्ट में चल रहे विवाद को छुपाकर ठेकेदार को ‘एक्जिट रूट’ देने की कोशिश, टेक्निकल कमेटी ने एजेंडा किया डेफर (Defer)

-बाड़मेर पेयजल परियोजना (BLWSP Ph.-II) में बड़ा प्रशासनिक ब्लंडर

बाड़मेर/जयपुर। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHED) के दावों और धरातल की कड़वी हकीकत के बीच कितना बड़ा फासला है, इसका एक और सनसनीखेज और पुख्ता सबूत ‘Expose Now’ के हाथ लगा है। बाड़मेर जिले के शिव-भदखा क्षेत्र में जनता के हलक की प्यास बुझाने के नाम पर शुरू की गई 595.34 करोड़ की महत्वाकांक्षी “BLWSP Ph.-II पार्ट C KKD” पेयजल परियोजना सरकारी फाइलों के मकड़जाल और अफसरों की घोर लापरवाही की भेंट चढ़ चुकी है।

2017 का टेंडर, 2026 तक अधर में:-

विशेष दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि इस मेगा प्रोजेक्ट का वर्क ऑर्डर चीफ इंजीनियर (P) जोधपुर द्वारा आज से करीब 9 साल पहले 24 जनवरी 2017 को ही मेसर्स VPRPL-WABAG JV को जारी कर दिया गया था। इसमें 550.34 करोड़ कंस्ट्रक्शन और 45 करोड़ 10 साल के रख-रखाव (O&M) के लिए तय थे। विभागीय लेट-लतीफी के कारण काम की समय-सीमा बार-बार बढ़ाई गई, लेकिन करोड़ों रुपये फूंकने के बाद भी यह योजना आज तक पूरी नहीं हो सकी।

बिना जमीन के कैसे पास हुआ करोड़ों का बजट?

इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘सैंसियों का तला’ गांव में बनने वाले उच्च जलाशय (OHSR) से जुड़ा है। विभाग ने इस एक टंकी और उससे जुड़े काम के लिए 3.53 करोड़ का बजट मंजूर कर दिया। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि अफसरों ने टेंडर जारी करने से पहले यह तक चेक नहीं किया कि जिस जमीन पर टंकी बननी है, उसका मालिकाना हक किसके पास है। आज स्थिति यह है कि जमीन पूरी तरह विवादित है, मामला एसडीएम (SDO) कोर्ट बाड़मेर में विचाराधीन है और विभाग के पास जमीन का भौतिक कब्जा तक नहीं है। मार्च 2021 से ठेकेदार विभाग को याद दिलाता रहा, लेकिन अधिकारी सोते रहे।

चोरी पकड़ी गई, ठेकेदार को फायदा पहुंचाने की कोशिश?

जब अफसरों को लगा कि उनकी गर्दन फंस सकती है, तो उन्होंने एक नया रास्ता निकाला। 27 अप्रैल 2026 को हुई फायनेंस समिति की बैठक (FC-917) में जोधपुर के चीफ इंजीनियर ने प्रस्ताव रखा कि इस 3.53 करोड़ के काम को प्रोजेक्ट के दायरे से ही हटा दिया जाए (De-scope कर दिया जाए) और ठेकेदार को कंप्लीशन सर्टिफिकेट देकर कांट्रैक्ट क्लोज कर दिया जाए।

लेकिन फायनेंस समिति की बैठक में इस ‘फाइली खेल’ की पोल खुल गई। समिति ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि अगर यह टंकी नहीं बनेगी, तो इससे जुड़े दर्जनों गांवों के ग्रामीणों को पानी कैसे मिलेगा? राइजिंग पाइपलाइन और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का क्या होगा? चूंकि इस एजेंडा नोट में जनता के नुकसान पर पूरी तरह चुप्पी साधी गई थी, इसलिए कमेटी ने सर्वसम्मति से इस प्रस्ताव को डेफर (Defer) कर दिया और पहले टेक्निकल रिव्यू करने के सख्त आदेश दिए।

अब देखना ये है कि जलदाय विभाग की टेक्निकल कमेटी इस प्रकरण में गांव के लोगों की प्यास बुझाने के प्रयासों पर सोचती है या फिर ठेका कंपनी को फायदा पहुंचाने का काम करती है। बड़ा सवाल ये है कि इस प्रोजेक्ट में किस पीएचईडी इंजीनियर की लापरवाही से यह प्रोजेक्ट विवादों में आया और 7 साल बाद भी अधूरा होने के चलते कई गांवों को पानी नहीं मिल सका। क्या टेक्निकल कमेटी इसके लिए जिम्मेदार इंजीनियर के खिलाफ कार्रवाई का सुझाव देगी या फिर हर बार की तरह इस मामले में भी लीपापोती कर दी जाएगी।

ब्यूरो रिपोर्ट, Expose Now

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