अलवर | राजस्थान लिपिक भर्ती-2017 में भ्रष्टाचार और नियमों की अनदेखी का एक और गंभीर मामला सामने आया है। अलवर जिला परिषद के अधिकारियों ने सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन को दरकिनार करते हुए, अपनी ओर से एक ‘नया नियम’ जोड़कर पांच अपात्र अभ्यर्थियों को क्लर्क के पद पर नियुक्त कर दिया। इस सनसनीखेज खुलासे के बाद अब पूरे मामले की फाइल राज्य जांच टीम को भेज दी गई है।
नियमों में कैसे हुई हेरफेर?
जिला परिषद ने 7 दिसंबर 2017 को 63 लिपिकों की नियुक्ति सूची जारी की थी। चौंकाने वाली बात यह है कि इससे ठीक 3 महीने पहले (सितंबर 2017) हुई भर्तियों में केवल 21 शर्तें थीं। लेकिन दिसंबर की सूची में ‘क्रमांक 22’ पर एक नई शर्त जोड़ी गई। इस शर्त में लिखा गया कि सूची में शामिल क्रम संख्या 7, 18, 22, 25 और 36 के अभ्यर्थियों की नियुक्ति केवल उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों, शपथ पत्रों और स्वयं की घोषणा के आधार पर दी जा रही है।
सत्यापन के बिना दी गई नौकरी
सरकारी नियमों के विपरीत, इन पांचों अभ्यर्थियों की कंप्यूटर योग्यता का सत्यापन विश्वविद्यालय से कराए बिना ही उन्हें ‘सत्यापन के अधीन’ मानकर जॉइनिंग दे दी गई। ताज्जुब की बात यह है कि आज तक इनका सत्यापन नहीं कराया गया है।
अभ्यर्थियों के रिकॉर्ड में मिलीं ये गंभीर खामियां:
- केस 1: एक अभ्यर्थी ने NIMS यूनिवर्सिटी (जयपुर) से दूरस्थ शिक्षा की डिग्री लगाई। जबकि पंचायती राज विभाग ने 4 अगस्त 2017 को ही ऐसी डिग्रियों को अमान्य कर पूर्व में नियुक्त कर्मियों को बर्खास्त करने के आदेश दिए थे।
- केस 2: एक अभ्यर्थी जिसकी नियुक्ति 2013 में तत्कालीन सीईओ ने कंप्यूटर डिग्री के अभाव में खारिज कर दी थी, उसे 2017 में ‘चेकलिस्ट’ बदलकर नियुक्ति दे दी गई।
- केस 3: अभ्यर्थी के पास मेघालय की यूनिवर्सिटी की डिग्री थी। जून 2013 के सरकारी आदेशानुसार सिक्किम, मेघालय और नागालैंड की डिग्रियों का सत्यापन अनिवार्य था, जिसे अनदेखा किया गया।
- केस 4: अभ्यर्थी ने जनार्दन राय नागर यूनिवर्सिटी (उदयपुर) का प्रमाण पत्र लगाया, जिसका भौतिक सत्यापन नहीं कराया गया।
- केस 5: अभ्यर्थी ने आवेदन फॉर्म में स्वयं को RS-CIT में केवल ‘एपियर’ (प्रवेशित) बताया था, फिर भी उसे पूर्ण योग्य मानकर नियुक्ति दे दी गई।
अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
जानकारों का कहना है कि जिला परिषद की भर्ती शाखा के अधिकारियों ने भविष्य में कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए जानबूझकर ‘शर्त संख्या 22’ जोड़ी थी। एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि सत्यापन प्रक्रियाओं को ही बदल दिया गया।
अधिकारी का पक्ष: “यह मामला फिलहाल मेरे संज्ञान में नहीं आया है। चूंकि भर्ती मामले की जांच राज्य स्तर पर चल रही है, इसलिए विस्तृत रिपोर्ट के बाद ही कार्रवाई संभव है।” — सालुखे गौरव रविंद्र, सीईओ, जिला परिषद अलवर
