नहर या गटर? करौली के शेखपुरा में सिंचाई विभाग की बड़ी लापरवाही आई सामने

करौली, करौली जिले के नींदर बांध से सिंचाई विभाग द्वारा बनाई जा रही मंडरायल माईनर नहर भ्रष्टाचार और लापरवाही का नमूना बनती जा रही है। करीब 2 करोड़ रुपये की लागत से बन रही इस नहर में न केवल घटिया सामग्री का उपयोग हो रहा है, बल्कि अधिकारियों और अतिक्रमणकारियों की मिलीभगत से नहर के स्वरूप को ही बिगाड़ दिया गया है।

आबादी क्षेत्र में नियमों की धज्जियां: गायब हुई 10 फुट की पटरी

नहर निर्माण के नियमों के अनुसार, नहर के एक तरफ 13 फुट और दूसरी तरफ 10 फुट चौड़ी पटरी बनाई जानी अनिवार्य है।

  • भेदभावपूर्ण निर्माण: माईनर पर करीब एक किलोमीटर तक पटरी सही बनाई गई, लेकिन शेखपुरा आबादी क्षेत्र में पहुँचते ही खेल बदल गया। यहाँ एक तरफ की 10 फुट की पटरी को ‘शून्य’ कर दिया गया है।
  • अतिक्रमण को संरक्षण: रसूखदार अतिक्रमणकारियों के मकानों और दीवारों को हटाने के बजाय विभाग ने पटरी का निर्माण ही नहीं किया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक दबाव या मिलीभगत के कारण सरकारी जमीन पर बने अवैध मकानों पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

सिंचाई नहर या गटर का नाला?

मामला केवल निर्माण तक सीमित नहीं है। अधिकारियों की मौजूदगी में ही आबादी क्षेत्र के लोगों ने अपने घरों के गटर और गंदे पानी के पाइप सीधे नहर में डाल दिए हैं।

  • गंदगी का अंबार: करोड़ों की लागत से बन रही इस कैनाल में अब खेतों तक पानी पहुँचने से पहले ही गंदा पानी और कचरा भर रहा है।
  • अधिकारियों के बेतुके तर्क: जब कनिष्ठ अभियंता (JEN) अनिल मीणा से इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि तहसील में शिकायत की गई थी, लेकिन अधिकारियों ने कहा कि “पानी जाने के लिए जगह नहीं है तो नहर में ही जाएगा” जैसे गैर-जिम्मेदाराना जवाब सामने आ रहे हैं।

घटिया निर्माण सामग्री और अधिकारियों की चुप्पी

मौके पर मौजूद लोगों ने वीडियो फुटेज के जरिए दिखाया कि नहर में हल्की गुणवत्ता की टाइल्स लगाकर लीपापोती की जा रही है। अधिकारियों की ‘अनभिज्ञता’ पर सवाल उठाते हुए ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उनके खेतों से ली गई जमीन पर भेदभाव हुआ और पटरी नहीं बनी, तो वे अपने स्तर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।

विभागीय पक्ष: सहायक अभियंता लालाराम मीणा का कहना है कि मामला संज्ञान में है और अतिक्रमणकारियों को नोटिस जारी किया जाएगा। साथ ही नगरपालिका प्रशासन को पत्र लिखकर गंदे पानी को रुकवाने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, सवाल यह उठता है कि निर्माण शुरू होने से पहले ही यह कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

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