जयपुर: राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग द्वारा हाल ही में लिए गए एक निर्णय ने प्रदेश के निजी चिकित्सा क्षेत्र में एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। विभाग ने सरकारी योजनाओं (जैसे आयुष्मान भारत-राजस्थान मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य योजना) के पैनल में शामिल होने के लिए निजी अस्पतालों के पास ‘कॉमर्शियल टाइटल’ (Commercial Title) होना अनिवार्य कर दिया है। सरकार के इस कदम से हजारों अस्पतालों के संचालन और उनके पैनल से बाहर होने का खतरा पैदा हो गया है।
क्या है विरोधाभास?
इस नए नियम के कारण स्वास्थ्य विभाग और नगरीय विकास (UDH) विभाग के बीच समन्वय की भारी कमी उजागर हुई है। वर्तमान में, राजस्थान के लगभग 90 प्रतिशत निजी अस्पताल ‘संस्थानिक’ (Institutional) श्रेणी के तहत पंजीकृत और संचालित हैं। जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) और अन्य स्थानीय निकायों के नियमों के मुताबिक, अस्पतालों को हमेशा से इसी श्रेणी में रखा गया है और उनसे टैक्स व अन्य शुल्क भी इसी आधार पर लिए जाते रहे हैं।
90% अस्पतालों के पास नहीं है ‘कॉमर्शियल टाइटल’
सर्वेक्षण और एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश के अधिकांश अस्पतालों के पास कॉमर्शियल टाइटल नहीं है। अस्पताल संचालकों का तर्क है कि जब निकाय और जेडीए उन्हें ‘संस्थानिक’ मानकर टैक्स वसूल रहे हैं, तो स्वास्थ्य विभाग अचानक ‘कॉमर्शियल’ होने की शर्त कैसे थोप सकता है। यदि यह नियम सख्ती से लागू हुआ, तो अधिकांश अस्पताल सरकारी योजनाओं के पैनल से बाहर हो जाएंगे, जिससे आम जनता को मिलने वाले निशुल्क इलाज पर सीधा और गहरा असर पड़ेगा।
PHANA ने बताया ‘अव्यावहारिक’ फैसला
प्राइवेट हॉस्पिटल्स एंड नर्सिंग होम्स एसोसिएशन (PHANA) के अध्यक्ष डॉ. विजय कपूर ने इस आदेश का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने इसे पूरी तरह से ‘अव्यावहारिक और अपरिपक्व’ निर्णय बताया है। डॉ. कपूर का कहना है कि यह सरकारी विभागों के आपसी विरोधाभास को दर्शाता है और इससे केवल चिकित्सा व्यवस्था में अस्थिरता पैदा होगी।
