राजस्थान की ‘नागौरी पान मेथी’ को मिलेगी अंतरराष्ट्रीय पहचान, केंद्र सरकार ने दी बड़ी खुशखबरी

नागौर: राजस्थान के नागौर जिले की विशेष पहचान और जायके की जान मानी जाने वाली ‘नागौरी पान मेथी’ अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग और मजबूत ब्रांड वैल्यू बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। लंबे समय से चल रहे अनवरत प्रयासों के बाद, अब वह सुखद समय आ गया है जब इस पारंपरिक उपज को ‘जीआई टैग’ (Geographical Indication) का कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल द्वारा लिखे गए एक पत्र के अनुसार, इस टैग के लिए किए गए आवेदन का मूल्यांकन सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। मंत्री गोयल ने सांसद बेनीवाल को इस पूरी प्रक्रिया की अहम अपडेट देते हुए बताया है कि अब इसे औपचारिक रूप से GI जर्नल में प्रकाशित किया जाएगा।

क्या है ‘GI टैग’ और नागौर के लिए यह क्यों है इतना खास?

भौगोलिक संकेतक या जीआई टैग (GI Tag) मुख्य रूप से एक ऐसा प्रामाणिक प्रमाण पत्र है, जो यह सुनिश्चित करता है कि एक विशेष उत्पाद केवल एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र (जैसे नागौर) में ही पैदा होता है और उसके गुण पूरी तरह अद्वितीय हैं। नागौरी मेथी अपनी विशेष ‘कस्तूरी’ महक के कारण अन्य सभी क्षेत्रों की मेथी से बिल्कुल अलग होती है और इसी अद्वितीय पहचान को अब कानूनी सुरक्षा मिलने जा रही है। जीआई टैग मिलने के बाद कोई भी अन्य क्षेत्र या व्यापारी ‘नागौरी पान मेथी’ के नाम से अपना नकली उत्पाद नहीं बेच पाएगा, जिससे मिलावट और नकली ब्रांडिंग पर पूरी तरह से लगाम लगेगी।

किसानों के लिए ‘वरदान’: खुलेंगे निर्यात और अंतरराष्ट्रीय बाजार के द्वार

नागौर जिले के हजारों किसान परिवारों के लिए सरकार का यह फैसला एक बड़ी आर्थिक क्रांति लाने वाला साबित होगा। ब्रांडिंग के कानूनी रूप से मजबूत होने से किसानों को उनकी फसल का वर्तमान भाव से कहीं बेहतर और उचित दाम मिल सकेगा। यूरोपीय और खाड़ी देशों में नागौरी पान मेथी की पहले से ही भारी मांग है, लेकिन जीआई टैग मिलने से अब ‘एक्सपोर्ट’ (निर्यात) की प्रक्रिया बहुत आसान हो जाएगी। इससे अंतरराष्ट्रीय खरीदार बिचौलियों के बिना सीधे किसानों से जुड़ सकेंगे, जिससे नागौर की स्थानीय कृषि अर्थव्यवस्था को भारी मजबूती मिलेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के कई नए अवसर पैदा होंगे।

नागौर की रेतीली मिट्टी का जादू और आगे की प्रक्रिया

नागौर की विशिष्ट जलवायु और रेतीली मिट्टी ही इस मेथी को वह खास कड़वाहट और महक देती है, जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलती है, और इसी कारण इसे ‘कस्तूरी मेथी’ भी कहा जाता है। सूखे पत्तों के रूप में इसका उपयोग भारतीय रसोई के साथ-साथ आयुर्वेदिक दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों में भी बहुतायत से किया जाता है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के पत्र के मुताबिक, मूल्यांकन प्रक्रिया के बाद अब इसे ‘GI जर्नल’ में प्रकाशित किया जाएगा। इसके बाद एक निश्चित अवधि (आमतौर पर 3 से 4 महीने) के लिए सार्वजनिक आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं। यदि कोई ठोस आपत्ति नहीं आती है, तो नागौरी पान मेथी को आधिकारिक रूप से जीआई टैग का प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाएगा। यह बड़ी सफलता नागौर के किसानों, कृषि विशेषज्ञों और जनप्रतिनिधियों के उन साझा प्रयासों की जीत है, जो पिछले कई वर्षों से इस मांग को लेकर दिल्ली के गलियारों में दस्तक दे रहे थे।

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