मृतक भी बना मनरेगा मजदूर! कागज़ों में काम, खाते में भुगतान; करौली के सपोटरा में बड़ा घोटाला

करौली/सपोटरा। गरीब और बेरोज़गार ग्रामीणों को रोज़गार देने के उद्देश्य से चलाई जा रही केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘मनरेगा’ (MNREGA) अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नज़र आ रही है। ताज़ा और चौंकाने वाला मामला राजस्थान के करौली जिले की पंचायत समिति सपोटरा की ग्राम पंचायत भरतून से सामने आया है। यहां भ्रष्टाचार की हदें पार करते हुए एक मृत व्यक्ति को भी मनरेगा में काम करते हुए दिखा दिया गया और हैरानी की बात यह है कि मजदूरी की रकम सीधे उसके बैंक खाते में डाल दी गई।

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर मरा हुआ आदमी काम कैसे कर सकता है? लेकिन यह सच है… और इस सच्चाई ने पूरे प्रशासनिक सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या है पूरा मामला? हम आपको ले चलते हैं ग्राम पंचायत भरतून, जहां मनरेगा योजना के तहत चल रही मस्टर रोल में मृत व्यक्ति को श्रमिक दिखाया गया। हमारी टीम ने जब इस पूरे घटनाक्रम की तहकीकात की, तो सामने आया कि यह घोटाला ‘पुरानी तलाई से गाद (गीली मिट्टी) निकालने’ के कार्य के नाम पर किया गया।

फर्जीवाड़े का तरीका:

  • ग्रामीणों का आरोप है कि मृत व्यक्ति की हाजिरी मेट द्वारा रजिस्टर में भरी गई।
  • इतना ही नहीं, फोटो खींचकर फर्जी उपस्थिति भी दर्ज की गई।
  • कार्य के बदले मृतक चिरंजी के बैंक खाते में 3358 रुपये का भुगतान कर दिया गया।

शुरुआत में यह बात अविश्वसनीय लगी, लेकिन जब ग्रामीणों ने मृत व्यक्ति से जुड़े पुख्ता दस्तावेज़ और सबूत सामने रखे, तो पूरा मामला साफ हो गया।

मृत्यु प्रमाण पत्र

अधिकारियों की मिलीभगत का आरोप ग्रामीणों ने इस घोटाले में ऊपर से नीचे तक मिलीभगत का सीधा आरोप लगाया है। उनका कहना है कि सरपंच, ग्राम विकास अधिकारी (VDO), मेट और पंचायत समिति सपोटरा के विकास अधिकारी (BDO) बृजलाल बैरवा की आपसी मिलीभगत से मनरेगा में यह फर्जीवाड़ा अंजाम दिया गया।

ग्रामीणों के गंभीर आरोप: ग्रामीणों ने सिस्टम की पोल खोलते हुए बताया कि:

  1. पात्र लोगों की उपेक्षा: गांव के गरीब और पात्र श्रमिकों को जानबूझकर रोजगार नहीं दिया जाता।
  2. कागजी काम: केवल कागजों में ही विकास कार्य दिखाए जाते हैं और मस्टर रोल में फर्जी हाजिरी भरी जाती है।
  3. कमीशन खोरी: जो व्यक्ति काम करना चाहता है, उससे मजदूरी का आधा हिस्सा (50%) कमीशन के रूप में मांगा जाता है। यदि कोई कमीशन देने से इनकार करता है, तो उसे रोजगार से वंचित कर दिया जाता है।

जिम्मेदारों की चुप्पी पर सवाल ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि मामला उजागर होने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी कानाफूसी कर मामले को दबाने में जुटे हुए हैं, जिससे भ्रष्टाचार करने वालों के हौसले और बुलंद हो गए हैं।

बृजलाल बैरवा
विकास अधिकारी पंचायत समिति सपोटरा का बयान।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि:

  • क्या मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना में हो रहे इस गंभीर घोटाले की उच्च अधिकारी निष्पक्ष जांच करवाएंगे?
  • क्या दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई होगी?
  • या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?

देखना यह होगा कि सरकार की मंशा पर पानी फेरने वालों पर प्रशासन कब और कैसे शिकंजा कसता है।

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