जयपुर, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2026 के ‘आइडियाज ऑफ जस्टिस’ सत्र में भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका, सामाजिक बदलाव और व्यक्तिगत अनुभवों पर बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जज किसी दूसरे ग्रह से नहीं बल्कि इसी समाज से आते हैं जहाँ भ्रष्टाचार मौजूद है, लेकिन उनसे हमेशा उच्च मानक की अपेक्षा की जाती है।
“जमानत नियम है, जेल अपवाद”
उमर खालिद और विचाराधीन कैदियों के मुद्दे पर बात करते हुए न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने “निर्दोषता की धारणा” (Presumption of Innocence) पर जोर दिया। उन्होंने कहा:
“अगर कोई व्यक्ति 5-7 साल जेल में बिताने के बाद निर्दोष बरी होता है, तो उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई कोई नहीं कर सकता। प्री-ट्रायल जमानत को सजा के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।”
उन्होंने जेल भेजने के केवल तीन आधार बताए:
- अपराध दोहराने की आशंका।
- सबूतों से छेड़छाड़ का खतरा।
- ट्रायल से भागने का डर।
जिला अदालतों में ‘डर का माहौल’
पूर्व CJI ने इस बात पर चिंता जताई कि जिला अदालतों के जज जमानत देने से कतराते हैं क्योंकि उन्हें डर रहता है कि उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए जाएंगे। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट पर केसों का बोझ बढ़ रहा है, जहाँ हर साल लगभग 70 हजार मामले पहुँच रहे हैं।
Gen-Z और निजी अनुभव
चंद्रचूड़ ने अपनी निजी जिंदगी का उदाहरण देते हुए संस्थानों को बदलने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उनकी दो बेटियाँ ‘स्पेशल नीड्स’ वाली हैं और Gen-Z पीढ़ी से हैं। उनसे जुड़ने के लिए उन्हें खुद को बदलना पड़ा। उन्होंने कहा, “संस्थानों को भी प्रासंगिक बने रहने के लिए वक्त के साथ बदलाव को समझना होगा।”
भ्रष्टाचार और जवाबदेही
भ्रष्टाचार के सवाल पर उन्होंने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि हर गलत फैसले को करप्शन नहीं कहना चाहिए, बल्कि सच तक पहुँचने के लिए जवाबदेही तय करने वाला एक कुशल (Efficient) सिस्टम विकसित करने की जरूरत है।
