‘ब्रिटिश साम्राज्य की हिंसा कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित तंत्र था’: JLF में पुलित्जर विजेता कैरोलिन एल्किन्स

जयपुर, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2026 के अंतिम दिन ‘The Legacy of Violence’ सत्र में इतिहास के स्याह पन्नों को पलटते हुए पुलित्जर पुरस्कार विजेता और हार्वर्ड प्रोफेसर कैरोलिन एल्किन्स ने ब्रिटिश हुकूमत के वास्तविक चेहरे को बेनकाब किया। विलियम डैलरिम्पल के साथ संवाद करते हुए एल्किन्स ने बताया कि ब्रिटिश साम्राज्य में राज्य-प्रेरित हिंसा महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक संस्थागत पैटर्न था।

केन्या केस: जब बुजुर्गों ने ब्रिटिश सत्ता को कोर्ट में घसीटा

एल्किन्स ने अपने शोध के सबसे बड़े ऐतिहासिक मोड़ का जिक्र किया, जब मध्य केन्या के पांच बुजुर्गों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लंदन हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

  • चुनौती: अदालत में यह साबित करना था कि हत्या, यातना और यौन उत्पीड़न की घटनाएं व्यक्तिगत नहीं थीं, बल्कि सरकार के सर्वोच्च स्तर की जानकारी में एक सुनियोजित प्रणाली के तहत हो रही थीं।
  • न्याय की जीत: अंततः 2013 में ब्रिटिश सरकार ने 2,000 पीड़ितों के लिए 20 मिलियन पाउंड के मुआवज़े पर सहमति जताई और पहली बार आधिकारिक रूप से स्वीकार किया कि साम्राज्य के दौरान यातना का प्रयोग किया गया था।

साढ़े तीन टन दस्तावेजों का विनाश और ‘गुमशुदा’ इतिहास

प्रोफेसर एल्किन्स ने बताया कि ब्रिटिश सरकार ने सच्चाई को दबाने के लिए बड़े पैमाने पर साक्ष्यों को नष्ट किया।

  • दस्तावेजों का सफाया: केस के दौरान खुलासा हुआ कि लगभग साढ़े तीन टन दस्तावेज जला दिए गए या नष्ट कर दिए गए।
  • बरामदगी: कानूनी दबाव के बाद 300 ऐसे बॉक्स सामने आए जो कभी सार्वजनिक नहीं किए गए थे। इनमें 36 अन्य उपनिवेशों से जुड़ी लगभग 8,000 फाइलें मिलीं, जिन्हें आजादी के समय छिपा दिया गया था।
  • सत्ता की भाषा: एल्किन्स के अनुसार, फाइलों के लिए ‘गुम हो जाना’ या ‘गलत जगह रखना’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल सत्ता को जवाबदेही से बचाने का एक तरीका मात्र था।

‘लीगलाइज्ड लॉलेसनेस’: कानून बनाकर की गई गैरकानूनी हिंसा

एल्किन्स ने ब्रिटिश शासन के एक खतरनाक पहलू ‘स्टेट ऑफ एक्सेप्शन’ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि आपातकाल के नाम पर सामान्य कानूनों को निलंबित कर दिया जाता था और कार्यपालिका को असीमित शक्तियां दी जाती थीं।

  • उन्होंने इसे ‘लीगलाइज्ड लॉलेसनेस’ (कानूनी अराजकता) कहा, जहां नए कानून बनाकर दमन को वैध ठहराया जाता था।
  • उन्होंने बताया कि 1930 के दशक का फिलिस्तीन वह स्थान था जहाँ से इन दमनकारी ढांचों की शुरुआत हुई।

आज भी जारी है औपनिवेशिक विरासत

एल्किन्स ने चेतावनी दी कि यह इतिहास केवल अतीत का हिस्सा नहीं है। प्रशासनिक हिरासत और प्रेस सेंसरशिप जैसे कानून, जो औपनिवेशिक दौर में बने थे, आज भी विश्व के कई हिस्सों में किसी न किसी रूप में लागू हैं। हिंसा की ये व्यवस्थाएं समय के साथ समाप्त नहीं हुईं, बल्कि उन्होंने नए रूप धारण कर लिए हैं।

Share This Article
Leave a Comment
error: Content is protected !!