जैसलमेर | स्वर्णनगरी जैसलमेर में आयोजित तीन दिवसीय दादागुरुदेव चादर महोत्सव के अंतर्गत शुक्रवार को आस्था, श्रद्धा और भक्ति से ओतप्रोत ऐतिहासिक भव्य वरघोड़ा (Procession) निकाला गया। इस अवसर पर लगभग 150 वर्षों बाद सोनार दुर्ग स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर के ज्ञान भंडार से दादागुरुदेव जिनदत्तसूरी महाराज की 871 वर्ष से भी अधिक प्राचीन पवित्र चादर को विधिवत पूजन-अर्चना के साथ बाहर लाया गया। जैन समाज में इस चादर का अत्यंत धार्मिक महत्व (अग्नि-संस्कार में न जलने का अलौकिक चमत्कार) और इसे गहन श्रद्धा का प्रतीक माना जाता। वरघोड़ा महोत्सव स्थल पहुंच कर धर्मसभा में तब्दील हो गया, जहां पवित्र चादर का वासक्षेप सहित गंगोत्री और मानसरोवर से लाए गए जल से अभिषेक संपन्न हुआ।
मंच पर 400 संतों और दिग्गजों का जमावड़ा
दादा गुरुदेव जिनदत्त सूरि चादर समिति के तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम के मंच पर गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि, आचार्य मनोज्ञ सागर सूरि, वसन्त विजय, महोत्सव समिति के अध्यक्ष मंगल प्रभात लोढ़ा, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, विधायक महंत प्रतापपुरी, छोटू सिंह भाटी और रविंद्र सिंह भाटी मौजूद रहे। इसके अलावा राष्ट्रीय संयोजक तेजराज गोलेच्छा, राष्ट्रीय सचिव पद्म टाटिया, समन्वयक प्रकाश चंद लोढ़ा और समायोजक महेंद्र भंसाली उपस्थित रहे। मंच के दोनों तरफ जैन एवं हिंदू संतों के सान्निध्य में कार्यक्रम को आध्यात्मिक गरिमा प्राप्त हुई।

आचार्य का उद्बोधन और म्यूजियम की मांग
गच्छाधिपति आचार्य जिनप्रभमणि सूरीश्वर महाराज ने अमरसागर जैन मंदिर की स्थापना का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि उस समय चादर की पेटी नहीं खोली गई थी और इसे प्रतिष्ठा स्थल पर ही विराजित किया गया था। इसे अत्यंत गौरव और सौभाग्य का क्षण बताते हुए उन्होंने पूज्य वृद्धिचंद्र महाराज के भावों को नमन किया, जो लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व इस पवित्र चादर को पाटन से जैसलमेर लेकर आए थे। जैसलमेर जैन ट्रस्ट और प्रवासी परिवारों का इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने पर आभार व्यक्त किया गया। जैसलमेर में 36 कौमों के संगम को देखते हुए आचार्य ने जैन धर्म की विरासत, इतिहास, सिद्धांतों और संस्कृति के व्यापक प्रचार-प्रसार तथा संरक्षण हेतु एक विशेष संग्रहालय (Museum) की स्थापना की मांग रखी।
सोनार किले से निकला भव्य वरघोड़ा
चादर महोत्सव समिति के राष्ट्रीय सचिव पदम टाटिया के अनुसार, आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि और जैन मुनियों के सानिध्य में पवित्र चादर को सोनार किले से गड़सीसर सर्किल तक लाया गया। यहां इसे विशेष रूप से तैयार पानी के जहाज के आकार वाले भव्य रथ में विराजित किया गया। आचार्य जिनप्रभमणि सूरीश्वर और मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने हरी झंडी दिखाकर विशाल वरघोड़ा शोभायात्रा प्रारंभ की। पूरे रास्ते सर्वसमाज ने पुष्प वर्षा कर पवित्र चादर का स्वागत किया।

शोभायात्रा में 21 सजे-धजे घोड़े, 21 ऊंट, 2 हाथी, 20 नासिक ढोल की टीमें, कच्ची घोड़ी नृत्य दल और विभिन्न प्रांतों से आए लोक कलाकार आकर्षण का केंद्र बने। ड्रोन की मदद से पुष्प वर्षा हुई, जिससे पूरा वातावरण भक्ति और उल्लास से सराबोर हो उठा। गड़सीसर सर्किल से निकला यह वरघोड़ा नगर परिषद, एयरफोर्स सर्किल, नीरज सर्किल, हनुमान सर्किल और गीता आश्रम मार्ग से होते हुए डेडानसर मेला ग्राउंड स्थित महोत्सव स्थल पहुंचा। रास्ते भर हजारों श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ अपनी श्रद्धा व्यक्त की।
लाभार्थी परिवारों ने किया महाअभिषेक
महोत्सव स्थल पर परंपरानुसार पवित्र चादर को विशेष कांच के पात्र में विराजित किया गया। दीप प्रज्वलन और मंत्रोच्चारण के साथ चादर का विधिवत अभिषेक एवं पूजन संपन्न हुआ। इस पावन अवसर पर चादर के लाभार्थी गौतमचंद पुत्र पन्नालाल कवाड़ (तमिलनाडु) रहे। वहीं पहले अभिषेक का सौभाग्य फलौदी निवासी रविंद्र कुमार बंसावट को मिला। जैन मुनियों के सानिध्य में लाभार्थी परिवार ने विधिवत पूजा-अर्चना की।
1 करोड़ 8 लाख लोगों ने रचा इतिहास
महोत्सव के दौरान विश्वभर के जैन श्रद्धालुओं ने एक साथ 1 करोड़ 8 लाख दादागुरुदेव इकतीसा पाठ कर एक ऐतिहासिक आध्यात्मिक कीर्तिमान स्थापित किया। गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि ने घोषणा की कि अब से प्रतिवर्ष 7 मार्च को विश्वभर में दादागुरु के भक्त यह इकतीसा पाठ करेंगे।
केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इस अवसर पर कहा कि चादर महोत्सव समिति और जैन ट्रस्ट के प्रयासों से लाखों श्रद्धालु उस पवित्र चादर के दर्शन कर सकेंगे, जिसने एक समय जैसलमेर को भयंकर महामारी से बचाया था। वहीं मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने इतनी बड़ी संख्या में उमड़े भक्तों को देखकर इसे एक भावुक करने वाला पल बताया। आयोजन को लेकर प्रशासन और आयोजन समिति ने सुरक्षा व व्यवस्थाओं के व्यापक इंतजाम किए।
