जैसलमेर चादर महोत्सव: RSS प्रमुख मोहन भागवत ने किया शुभारंभ, कहा- दादागुरु की शिक्षा अपनाना आज जरूरी

871 साल बाद चादर का महाअभिषेक; दादागुरु पर विशेष Coin और Stamp का विमोचन, पद्मश्री डॉ. डी. आर. मेहता का हुआ सम्मान

By Admin

जैसलमेर | राजस्थान के जैसलमेर स्थित डेडानसर मैदान में तीन दिवसीय ऐतिहासिक चादर महोत्सव की भव्य शुरुआत हो गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सुरीश्वर महाराज की निश्रा में आयोजित इस विराट कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। कार्यक्रम के पहले दिन धर्मसभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक एकात्मता, सामाजिक सद्भाव और समरसता में दादागुरु परंपरा का एक बहुत अहम योगदान है। आज देश में मौजूद सैकड़ों दादाबाड़ियां धार्मिक अनुष्ठानों, परंपरा, लेखन, अध्यात्म और संस्कृति की प्रमुख वाहक बनी हुई हैं। मुख्य महोत्सव स्थल पर पहुंचने से पहले RSS प्रमुख ने जैसलमेर किले में जाकर दादा जिनदत्त सूरि की पवित्र चादर के दर्शन भी किए।

मंच पर 400 संतों का सान्निध्य और हस्तियों का सम्मान

इस विराट महोत्सव के स्वप्न दृष्टा आचार्य जिनमनोज्ञ सागर हैं और इसका आयोजन दादा गुरूदेव जिनदत्तसुरि चादर महोत्सव समिति के तत्वावधान में किया जा रहा है। कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा संस्थान और विद्या भारती सहित अनेक संस्थाएं सहभागी हैं। मंच पर RSS प्रमुख मोहन भागवत के साथ गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरि, आचार्य मनोज्ञ सागर सूरि, समिति के चेयरमैन (महाराष्ट्र सरकार के मंत्री) मंगल प्रभात लोढ़ा, जैसलमेर की पूर्व महारानी रासेश्वरी राज्य लक्ष्मी, राष्ट्रीय संयोजक तेजराज गोलेच्छा, समन्वयक प्रकाश चंद लोढ़ा और समायोजक महेंद्र भंसाली मौजूद रहे।

मंच के दोनों तरफ जैन और हिंदू संतों की उपस्थिति से कार्यक्रम को एक विशेष आध्यात्मिक गरिमा प्राप्त हुई। इस अवसर पर दादागुरु और चादर महोत्सव पर एक विशेष सिक्का (Coin) और डाक टिकट (Stamp) का विमोचन किया गया। साथ ही, समाजसेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए पद्मश्री डॉ. डी. आर. मेहता का विशेष सम्मान भी किया गया।

RSS प्रमुख का कड़ा संदेश: समाज से मिटे भेदभाव

धर्मसभा में अपने विस्तृत संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने कहा कि दादागुरु की परंपरा में दिखाई देने वाला चमत्कार दरअसल सनातन संस्कृति के उस भाव का प्रतीक है, जो पूरी सृष्टि में एकत्व का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि दादा जिनदत्त सूरि ने समाज में आपसी भेदभाव को मिटाने का कार्य किया और दुनिया को एकता का पाठ पढ़ाया। जैन दर्शन हमें सिखाता है कि जो जहाँ है, वहीं से आगे बढ़कर ईश्वर तक पहुँच सकता है।

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि आज दुनिया भर में हालात विकट हैं और महायुद्ध जैसी स्थितियों को टालने के प्रयास हो रहे हैं। दुनिया में झगड़े इसलिए होते हैं क्योंकि हम अपने वास्तविक एकत्व को नहीं पहचान पाते हैं। उन्होंने समाज से ऊंच-नीच और भेदभाव समाप्त करने का आह्वान करते हुए कहा कि जहाँ-जहाँ आप जाते हैं, वहाँ सभी प्रकार के हिंदुओं को एक ही परिवार मानें—जो सुख-दुख में साथ रहे, साथ बैठे और भोजन करे। अंत में उन्होंने कहा कि वर्तमान समय चुनौतीपूर्ण है, यदि देश के लिए जीने और आवश्यकता पड़े तो मरने का संकल्प समाज में जाए, तो हर संकट का सामना किया जा सकता है।

गुरुदेव का उद्बोधन और युवाओं को संदेश

धर्मसभा को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति जिनमणिप्रभ सूरि ने कहा कि विभिन्न हिंदू संतों की उपस्थिति से आयोजन की गरिमा और बढ़ गई है। यह आयोजन दादागुरु की महिमा को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम है और यह श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का परिणाम है। उन्होंने उपस्थित संत समाज से आह्वान किया कि वे देश के युवाओं को संस्कार, संयम और सदाचार का मार्ग दिखाएँ, क्योंकि युवाओं को सही दिशा देना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

नगर उद्घाटन और 1 करोड़ 8 लाख श्रद्धालुओं का महासंकल्प

धर्मसभा से पहले महोत्सव स्थल पर गच्छाधिपति, आचार्य, उपाध्याय, गणि और श्रमक-श्रमिणों का मंगल प्रवेश हुआ तथा लाभार्थी परिवारों ने नगर उद्घाटन किया। चादर महोत्सव समिति के चेयरमैन मंगल प्रभात लोढ़ा ने कहा कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का वैश्विक महाअभियान है।

दादागुरू इकतीसा समिति के राष्ट्रीय संयोजक ज्योति कोठारी ने बताया कि 7 मार्च को विश्वभर में एक साथ 1 करोड़ 8 लाख श्रद्धालु सामूहिक रूप से दादागुरु इकतीसा पाठ करेंगे। यह ऐतिहासिक पाठ विश्व हिंदू परिषद के संपूर्ण भारत के करीब 30 हजार मिलन एवं सत्संग केंद्रों, देशभर की सभी दादाबाड़ियों, विद्या भारती राजस्थान के 1000 स्कूलों और अनेक जैन व हिंदू मंदिरों में एक साथ किया जाएगा।

महोत्सव का आगामी कार्यक्रम: 871 साल बाद महाअभिषेक आयोजन समिति के सचिव पदम टाटिया ने बताया कि 7 मार्च को जैसलमेर किले से चादर का भव्य वरघोड़ा निकलेगा। दोपहर में 871 वर्षों के इतिहास में पहली बार इस पवित्र चादर का विधिवत महाअभिषेक और पूजा की जाएगी। शाम को सांस्कृतिक संध्या में प्रख्यात संगीतकार प्रस्तुति देंगे। इसके अलावा उपाध्याय मनितप्रभ सागर द्वारा लिखित पुस्तक ‘द यूनिवर्सल ट्रूथ’ और डॉ. विद्युत्प्रभा की पुस्तक ‘गुरुदेव’ का विमोचन होगा। 8 मार्च को उपाध्याय महेन्द्रसागर महाराज को आचार्य पद प्रदान किया जाएगा और गणिनी पद समारोह आयोजित होगा। इसी दिन चादर अभिषेक जल और वासक्षेप का वितरण किया जाएगा।

पवित्र चादर का अलौकिक चमत्कार और इतिहास

जैसलमेर जैन ट्रस्ट के अध्यक्ष महेंद्र सिंह भंसाली ने इस पवित्र चादर के इतिहास की जानकारी दी। 11वीं शताब्दी के महान आध्यात्मिक आचार्य, प्रथम दादागुरु जिनदत्त सूरी के अग्नि-संस्कार के समय एक अलौकिक घटना घटी थी। अजमेर में राजा अर्णोराज द्वारा दी गई भूमि पर हुए अग्नि-संस्कार में प्रचंड अग्नि के बावजूद उनकी चादर आग में नहीं जली थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व जैसलमेर के महारावल ने महामारी को रोकने के लिए यह चादर अनहिलपुर पाटन से मंगवाई थी। वर्तमान में यह चमत्कारी चादर जैसलमेर दुर्ग स्थित जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार में सुरक्षित है और पहली बार सार्वजनिक दर्शन के लिए यह महोत्सव आयोजित हो रहा है।

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